रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 26 अगस्त 2015

लब्बोलुआबः

पिछले दिनों हमने तकनीकी माध्यमों के सकारात्मक इस्तेमाल की एक अच्छी पहल (#सेल्फीविदडॉटर) को न सिर्फ बेवजह के विवाद में फंसते देखा है बल्कि हम उस अप्रिय अनुभव से भी गुजरे हैं जो सिद्ध करता है कि महिलाओं का सम्मान करने की बात कहने में जितनी अच्छी लगती है, असलियत में उतनी आसान नहीं है।

#सेल्फीविदडॉटर का बवाल और हमारी इंटरनेट नासमझी

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

लगता है सोशल मीडिया पर पिछले एक सप्ताह से चल रहा तूफान आखिरकार अपनी अप्रिय छाप छोड़कर गुजर गया है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कुछ सप्ताह, दिन या घंटे में फिर कोई चक्रवात भारतीय सोशल मीडिया को आरोप-प्रत्यारोप, अपशब्द-अपमान और प्रचार-दुष्प्रचार के हरहराते झोंकों के बीच चकरघिन्नी नहीं बना डालेगा। पिछले दिनों हमने तकनीकी माध्यमों के सकारात्मक इस्तेमाल की एक अच्छी पहल (#सेल्फीविदडॉटर) को न सिर्फ बेवजह के विवाद में फंसते देखा है बल्कि हम उस अप्रिय अनुभव से भी गुजरे हैं जो सिद्ध करता है कि महिलाओं का सम्मान करने की बात कहने में जितनी अच्छी लगती है, असलियत में उतनी आसान नहीं है। इस घटना ने अभिव्यक्ति की आज़ादी से लेकर इंटरनेट जैसे खुले माध्यम के दुरुपयोग तक से जुड़ी अनेक चिंताएँ पुनर्जीवित कर दी हैं।

बात हरियाणा के बीबीपुर गांव के सुनील जगलान की तरफ से सोशल मीडिया पर शुरू की गई एक शानदार पहल से जुड़ी है, जिसका नाम है- सेल्फी विद डॉटर (बिटिया के साथ चित्र)। जगलान ने हरियाणा (और देश) में लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव और पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की लगातार घटती संख्या (1000 बनाम 841 का अनुपात) के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए एक दिलचस्प अभियान शुरू किया, जिसके तहत आम लोगों को अपनी बेटियों के साथ सेल्फी खींचकर उन्हें भेजनी थी और वे सबसे अच्छी सेल्फी को इनाम देने वाले थे। बात अच्छी थी, मकसद अच्छा था और इसने युवा पीढ़ी तो तुरंत अपील किया। देखते ही देखते सैंकड़ों, हजारों और लाखों की संख्या में पिताओं ने अपनी बेटियों के साथ सेल्फी खींचकर फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप और दूसरे सोशल नेटवर्किंग माध्यमों पर डालना शुरू कर दिया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस मुहिम से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इसकी तारीफ करते हुए लोगों से अपील की कि वे भी अपनी बेटियों के साथ चित्र सोशल मीडिया पर पोस्ट करें। इस मुहिम ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी प्रभावित किया और वहाँ पर इससे प्रेरित खबरें, इंटरव्यू और अभियान देखने को मिले। अगर सुनील जगलान का उद्देश्य बेटियों को बचाने के मुद्दे पर जागरूकता पैदा करना था तो वे अपने मकसद में कामयाब रहे। सामाजिक परिवर्तन के लिए सोशल मीडिया का यह बड़ा रचनात्मक और प्रशंसनीय प्रयोग था।

आप पूछेंगे कि इसमें अभिव्यक्ति की आजादी का विवाद और इंटरनेट से जुड़ी चिंताएँ कहाँ से उठ गईं? हुआ यह कि एक बॉलीवुड अभिनेत्री और रियलिटी शोज की एंकर श्रुति सेठ ने 28 जून को इस अभियान के प्रति अपनी असहमति जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री को संबोधित एक ट्वीट में कहा कि "मिस्टर पीएम, एक सेल्फी (समाज में) बदलाव का माध्यम नहीं बन सकती। सुधारों को आजमाइए।" उन्होंने इस ट्वीट के साथ #सेल्फीऑब्सेस्डपीएम (सेल्फी के प्रति दीवानगी युक्त प्रधानमंत्री) हैशटैग भी जोड़ दिया। सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने भी प्रधानमंत्री को लैमडकपीएम (नाम मात्र के प्रधानमंत्री) के रूप में संबोधित करते हुए इस अभियान के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका तो अपना रिकॉर्ड लड़कियों का पीछा करने का रहा है।

#सेल्फीविदडॉटर अभियान के बारे में अभिनेत्री श्रुति सेठ की टिप्पणी नकारात्मक थी लेकिन वह अशिष्टतापूर्ण नहीं थी। बहरहाल, इसके बाद इंटरनेट पर मौजूद एक वर्ग ने श्रुति सेठ और कविता कृष्णन के खिलाफ अपशब्दों भरी टिप्पणियों का जो सिलसिला चलाया वह हर उस शख्स को आईना दिखाने के लिए काफी था जो मानता है कि भारतीय समाज इंटरनेट का परिपक्वता के साथ इस्तेमाल करना सीख गया है।

टिप्पणी खराब, प्रतिक्रिया बदतर

दोनों महिलाओं की टिप्पणियाँ एक जैसी नहीं नहीं हैं। जहाँ श्रुति सेठ की टिप्पणी अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में रहते हुए अपनी निजी राय की बेबाक अभिव्यक्ति मानी जाएगी, वहीं कविता कृष्णन की टिप्पणी अशोभनीय प्रतीत होती है। देश के चुने हुए प्रधानमंत्री के प्रति आपकी भावनाएँ बदलें या न बदलें, पद की गरिमा के लिहाज से शब्दों का चयन ज़रूर बदल जाना चाहिए। बहरहाल, दोनों महिलाओं को अपनी-अपनी राय रखने का हक अवश्य है और जब तक यह मानहानि के दायरे में नहीं आता, उनके खिलाफ (कम से कम अब जबकि सुप्रीम कोर्ट आईटी कानून की धारा 66 ए को निरस्त कर चुका है) किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती।

लेकिन सरकार को उनके खिलाफ कार्रवाई करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। इंटरनेट पर मौजूद एक वर्ग ने श्रुति सेठ और कविता कृष्णन के खिलाफ अपशब्दों भरी टिप्पणियों का जो सिलसिला चलाया वह हर उस शख्स को आईना दिखाने के लिए काफी था जो मानता है कि भारतीय समाज इंटरनेट का परिपक्वता के साथ इस्तेमाल करना सीख गया है। श्रुति को अपनी टिप्पणी के लिए क्या-क्या नहीं कहा गया! उन्हें नाकाम अभिनेत्री बताते हुए उनके मुस्लिम पति पर सवाल उठाए गए। पूछा गया कि क्या वे अपने असली पिता का नाम जानती हैं और यह कि कहीं बचपन में (पिता ने) उनका यौन शोषण तो नहीं किया था जिसकी वजह से वे अपने पिता के साथ सेल्फी के पक्ष में नहीं हैं। बात यहीं तक नहीं रुकी- श्रुति को वेश्या तक कहा गया और पूछा गया कि क्या वे अपनी बेटी से भी यही काम कराएंगी। बॉलीवुड के ज्यादातर लोग उनके पक्ष में आगे आए लेकिन बहुत अधिक संस्कारी होने के लिए खुद ट्विटर पर चर्चित रहे एक अभिनेता ने टिप्पणी की कि "उसने लक्ष्मण रेखा पार कर दी है। इस कुतिया को जेल भेजो।"

तो यह है #सेल्फीविदडॉटर के नाम पर फख़्र से फोटो खिंचवाकर महिला जाति के प्रति सम्मान का दावा करने वाले हमारे समाज की असलियत। ऐसे लोग, जिन्हें एकतरफ़ा, पक्षपातपूर्ण, अपशब्द भरी टिप्पणियों की बाढ़ लगाने में महारत के कारण 'ट्रॉल' के नाम से संबोधित किया जाता है, आज सोशल मीडिया की एक दुःखद सच्चाई हैं। जिस तरह अंधेरे में कोई किसी को पत्थर मारकर अपनी पहचान छोड़े बिना फरार हो जाता है, उसी तरह सोशल मीडिया के ठिकानों पर अपना असली नाम बताए बिना किसी के भी खिलाफ अपमानजनक व अश्लील टिप्पणियाँ और गालियाँ तक देकर ऐसे ट्रॉल उस व्यक्ति को दबा डालने की कोशिश करते हैं। ज्यादातर मौकों पर इस तरह का हमला किसी भी व्यक्ति को बुरी तरह हतोत्साहित करने और तोड़ डालने के लिए काफी होता है। यहाँ कोई एकाध व्यक्ति आपकी मानहानि या बदनामी नहीं करता बल्कि मानहानि और अपमान का यह सिलसिला किसी तूफान की तरह आता है। जैसे यकायक कहीं पर बादल फट जाएँ! श्रुति और कविता कृष्णन, जिन्होंने यकीनन एक अच्छे काम के प्रति नकारात्मक टिप्पणियाँ की थीं, इस तरह के बर्ताव की अधिकारी नहीं थीं क्योंकि इंटरनेट का मतलब किसी एक पक्ष, एक राय या एक मत की प्रधानता कायम करना नहीं है। वह कोई युद्ध का मैदान नहीं है बल्कि अपनी बात कहने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है। वहाँ शोर की ताकत रखने वालों को ऐसा कोई हक नहीं है कि वे चुप या गुमसुम रहने वालों को बौद्धिक या सामाजिक दृष्टि से खत्म कर दें। लेकिन अफसोस कि ऐसा खूब हो रहा है। हमने पिछले दिनों नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सोशल मीडिया पर 'ट्रॉलिंग' का शिकार होते देखा है।

विरोध की आजादी है लोकतंत्र की पहचान

श्रुति ने इस चौतरफा हमले के विरोध में प्रधानमंत्री के नाम खुला खत लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि वे उनके खिलाफ नफ़रत उगलने वाले इन हजारों लोगों की निंदा करें। उन्होंने कहा है कि क्या इस हमले से मेरी वही बात सही सिद्ध नहीं हुई है कि एक फोटो से यह समाज और उसकी मानसिकता बदलने वाली नहीं है। ज़रूरत सुधारों का दौर चलाने की है।

श्रुति की तरफ से #सेल्फीविदडॉटर अभियान को अर्थहीन बताया जाना यकीनन वास्तविकता से परे है। इस तरह के अभियान आम आदमी के मानस को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर तब जब सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सरकारें एक ही पक्ष में खड़े हों। आखिरकार पिछले चुनावों में हमने मीडिया की ताकत को सत्ता बदलते देखा है। लेकिन श्रुति और कविता को उनकी असहमति की सजा नहीं दी जा सकती क्योंकि हम सोलहवीं सदी के समाज से यही कोई पाँच सदी आगे आ चुके हैं और तथाकथित समावेशी लोकतंत्र के नागरिक हैं जिसका स्वाभाविक लक्षण अपने साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना भी है। एक बात जो मेरी समझ से बाहर है, वह यह कि जो लोग इंटरनेट पर खुद को प्रधानमंत्री के सबसे बड़े भक्त सिद्ध करने पर तुले हैं और उन्हें इंटरनेट का सर्वाधिक लोकप्रिय व्यक्तित्व मानते हैं, उनकी आस्था इतनी कमजोर क्यों है कि दो महिलाओं की असहमति की टिप्पणियों मात्र से धराशायी हो जाती है? आखिर उनका विरोध करने वाले हर एक शख्स को इस तरह खलनायकत्व का चोगा पहनाया जाना ज़रूरी क्यों है?

थियोडोर रूजवेल्ट ने कहा था- लोगों को इस बात के लिए मजबूर करना कि कोई भी राष्ट्रपति की आलोचना न करे तथा हर अच्छे या बुरे फैसले में उनका साथ दे, न सिर्फ अपने नागरिकों के प्रति गैर-वफ़ादारी कहलाएगा, बल्कि नैतिक रूप से देशद्रोह के समान होगा।

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