रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 26 अगस्त 2015

लब्बोलुआबः

क्या सचमुच इतना निवेश होगा? पिछले अनुभव क्या कहते हैं? गुजरात में सन् 2003 से चल रहे 'वाइब्रेंड गुजरात' सम्मेलनों के दौरान अब तक करीब 94 लाख करोड़ के विदेशी निवेश के वायदे किए गए। यह रकम समूचे भारत के सकल घरेलू उत्पाद से जरा सी कम है।

आंकड़ों का खेल बनकर न रह जाए 'डिजिटल इंडिया'

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

आखिरकार डिटिजल इंडिया की शुरूआत हो गई। भव्य समारोह, विशाल उपस्थिति, अभूतपूर्व प्रचार अभियान और पहले ही दिन करीब साढ़े चार लाख करोड़ के कुल निवेश के वायदे.. यदि यह प्रभावशाली नहीं है तो फिर और क्या होगा? केंद्र सरकार ने इस परियोजना के प्रति उत्साह जगाने की जैसी कोशिश की है वैसी पहले नहीं देखी गई। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले आयोजनों को भी पीछे छोड़ देने वाला आयोजन था यह। उद्योगपतियों की प्रतिक्रियाएँ जाहिरा तौर पर सकारात्मक और 'गद्गद्' किस्म की हैं। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार विभाग के मंत्री रविशंकर प्रसाद के चेहरे पर खिली मुस्कान में साढ़े चार लाख करोड़ के भारी-भरकम निजी निवेश के वायदों से जगी उम्मीदें झलक रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर दिखता आत्मविश्वास भी तसल्ली देता है कि 'डिजिटल इंडिया' भारत की तसवीर बदलने जा रहा है।

डिजिटल इंडिया के तहत देश में बड़े पैमाने पर डिजिटल ढाँचागत विकास होने की उम्मीद ज़रूर है। यह नए दौर की ज़रूरतों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करता है। हर नागरिक के प्रयोग के लिए डिजिटल आधारभूत सुविधाओं का विकास, सरकारी सेवाओं को इंटरनेट तथा मोबाइल के जरिए आम आदमी तक पहुँचाने का तंत्र निर्मित करने और नागरिकों को डिजिटल माध्यमों से सक्षम बनाने के बुनियादी उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं। यदि हम इस तरह का डिजिटल ढांचा खड़ा करने में सफल रहते हैं तो सेवाओं की डिलीवरी को सुगम और सस्ता बनाना संभव होगा तथा उस अदृश्य तथा अभेद्य सरकारी दीवार को ध्वस्त किया जा सकेगा जो अमूमन नागरिकों को सरकारी तंत्र तथा उसकी सूचनाओं से दूर रखती है। आधारभूत ढाँचे के विकास से अर्थव्यवस्था को गति भी मिलेगी और नए बाजारों, नए रोजगारों का सृजन हो सकेगा। दूरगामी लक्ष्य भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में तब्दील करना है।

क्या सचमुच इतना निवेश होगा? पिछले अनुभव क्या कहते हैं? गुजरात में सन् 2003 से चल रहे 'वाइब्रेंड गुजरात' सम्मेलनों के दौरान अब तक करीब 94 लाख करोड़ के विदेशी निवेश के वायदे किए गए। यह रकम समूचे भारत के सकल घरेलू उत्पाद से जरा सी कम है। लेकिन भारत के राज्यों की आर्थिक स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट 2013 बताती है कि वास्तविक निवेश इसका महज 6 फीसदी हुआ।

सो, उम्मीदें बहुत हैं लेकिन डिजिटल इंडिया के ताजा लांच ने जितना प्रभावित किया, उतने ही सवाल भी खड़े किए हैं। डिजिटल इंडिया सप्ताह के पहले दिन जितनी धूमधाम रही, वह बाकी दिनों में दिखाई नहीं दी। उससे आशंका पैदा होती है कि इस योजना का हश्र भी कहीं 'स्वच्छ भारत अभियान' जैसा न हो। नेताओं और सेलिब्रिटीज के सफाई अभियानों में दिखा शुरूआती उत्साह, जोश और जुनून आज पूरी तरह नदारद है। 'मेक इन इंडिया' का लांच भी क्या कम प्रभावशाली था? पहल वह भी बहुत अच्छी, महत्वपूर्ण और सामयिक थी। देश-विदेश से कितने बयानों की झड़ी लगी उसके पक्ष में! लेकिन जमीनी स्तर पर कितना बदलाव हुआ? कितनी विनिर्माण परियोजनाएँ शुरू हो चुकी हैं या शुरू होने जा रही हैं? शायद कुछ दर्जन। डर है कि केंद्र सरकार कहीं इतनी अधिक पहलें न कर दे और इतने अधिक अभियान न छेड़ बैठे कि उनका प्रबंधन ही अपने आप में एक समस्या बन जाए। खासकर उस नौकरशाही के लिए जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रफ्तार और दृष्टिकोण के अनुरूप तेजी दिखाने की आदत नहीं है। जो यथास्थिति बरकरार रखने में अधिक दिलचस्पी रखती है।

विशाल वायदे और जमीनी हकीकतें

डिजिटल इंडिया सप्ताह के पहले दिन औद्योगिक घरानों द्वारा किए गए निवेश के वायदों को प्रधानमंत्री की सराहना मिली। रविशंकर प्रसाद तो गद्गद् थे। किंतु क्या सचमुच इतना निवेश होगा? पिछले अनुभव क्या कहते हैं? गुजरात में सन् 2003 से चल रहे 'वाइब्रेंड गुजरात' सम्मेलनों के दौरान अब तक करीब 94 लाख करोड़ के विदेशी निवेश के वायदे किए गए। यह रकम समूचे भारत के सकल घरेलू उत्पाद से जरा सी कम है। लेकिन भारत के राज्यों की आर्थिक स्वतंत्रता संबंधी रिपोर्ट 2013 बताती है कि वास्तविक निवेश इसका महज 6 फीसदी हुआ। अब कंपनियों द्वारा किए जाने वाले निवेश संबंधी वायदों पर एक नजर डालें। औद्योगिक नीति और प्रोत्साहन विभाग के अगस्त 1991 से मार्च 2014 तक के आंकड़ों के अनुसार इन वर्षों के दौरान भारत में कुल 94,000 निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए जिनमें 102 लाख करोड़ से ज्यादा की रकम का निवेश होना था और नतीजे में करीब 2.3 करोड़ नई नौकरियाँ सृजित होनी थीं। लेकिन वास्तविक निवेश हुआ 5.1 लाख करोड़ रुपए का, जिससे सिर्फ 20.1 लाख नौकरियाँ पैदा हुईं। यह निवेश वायदे की तुलना में 5 फीसदी बैठता है।

निवेश को लेकर शंकाएँ और भी हैं। सबसे अधिक निवेश (ढाई लाख करोड़) का वायदा मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस ने किया है। श्री अंबानी, जिन्होंने उद्योगों की तुलना में अधिक तेजी से आगे बढ़ने के लिए मोदी सरकार की सराहना की, ने अपने निवेश की समय-सीमा नहीं बताई है। समझा जा रहा है कि रिलायंस का यह निवेश मोटे तौर पर इस समूह की दूरसंचार कंपनी रिलायंस जियो इन्फोकॉम की परियोजनाओं पर केंद्रित है जिसे देश भर में 4जी सेवाएँ उपलब्ध कराने का लाइसेंस मिला है। यह कंपनी दिसंबर-जनवरी में अपनी सेवाएँ लांच करने जा रही है और उसके लिए पिछले साल भर से देश भर में ढाँचागत सुविधाओं के विकास और निर्माण में जुटी है। प्रश्न उठता है कि रिलायंस जियो की परियोजनाओं का डिजिटल इंडिया से कैसे संबंध है? कंपनी इस काम में पहले से ही जुटी है। टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज ने वायदा किया है कि वह तकनीकी क्षेत्र में 60 हजार नई नौकरियाँ सृजित करेगी। अब जरा टीसीएस के पिछले साल के भर्ती के आंकड़ों को देखिए। कंपनी ने सन् 2014 में 55 हजार नई भर्तियाँ की थीं जब डिजिटल इंडिया का अस्तित्व नहीं था। भारती एअरटेल भी इन दिनों 4जी का तंत्र खड़ा करने में जुटी है, जिसका जिक्र सुनील भारती मित्तल ने सम्मेलन में किया। यह शंका उठनी स्वाभाविक है कि क्या कंपनियाँ अपनी सामान्य गतिविधि को डिजिटल इंडिया के साथ जोड़कर तो पेश नहीं कर रही है?

वही जाने-पहचाने चेहरे

एक सवाल जो थोड़ी उलझन पैदा करता है, वह यह कि केंद्र सरकार चाहे किसी भी क्षेत्र में निवेश करे, उनके लिए होने वाले सम्मेलनों में वही जाने-पहचाने औद्योगिक घराने, वही पुराने चेहरे क्यों दिखाई देते हैं? क्या अलग-अलग क्षेत्रों के कारोबारी नेता अलग-अलग नहीं हैं? माना कि इन्फोसिस और विप्रो का शीर्ष नेतृत्व भी सम्मेलन में मौजूद था, लेकिन अग्रणी रहे रिलायंस समूह के दोनों धड़े, बिरला समूह, टाटा समूह और भारती एअरटेल। ज्यादा अच्छा होता यदि सत्य नडेला (माइक्रोसॉफ्ट), विनोद धाम (पेन्टियम माइक्रोप्रोसेसर के पिता), सुंदर पिचई (गूगल), विनोद खोसला (सन माइक्रोसिस्टम्स के सह-संस्थापक) जैसे तकनीकी दुनिया के जाने-माने भारतीय चेहरे अग्रणी भूमिका निभाते। आखिरकार वे माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, इन्टेल और (पूर्व) सन माइक्रोसिस्टम्स जैसी दुनिया की श्रेष्ठतम आईटी कंपनियों का दायित्व संभाल रहे हैं।

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