रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 26 अगस्त 2015

लब्बोलुआबः

अब तक ललित मोदी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी और उन्हें भारतीय कानून का सामना करने के लिए स्वदेश क्यों नहीं लाया जा सका? भारतीय राजनीति और व्यवस्था की कमजोरियों से हम अपरिचित नहीं हैं।

किस पार्टी की सरकार में असुरक्षित हैं ललित मोदी?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

ललित मोदी का हर ट्वीट एक नया नाम सामने लाता है और ऐसे हर ट्वीट के साथ उन्हें कानून के सिकंजे में लाए जाने की संभावना पहले से कहीं और अधिक मुश्किल महसूस होने लगती है। देश हो या विदेश, सत्ताधारी हों या विपक्षी, अफसरशाही हो या न्यायपालिका, पुलिस हो या इंटरपोल, ललित मोदी के शुभचिंतकों की कहीं कमी नहीं दिखाई दे रही। जिस अंदाज में यह 'लाजवाब तिकड़मबाज' चुन-चुन कर अपनी सूची से नाम निकाल रहा है, उसे देखते हुए कहा नहीं जा सकता कि अभी कितने शुभचिंतकों का रहस्योद्घाटन होना बाकी है। निरंतर लंबी होती यह सूची शायद इस बात का जवाब भी है कि अब तक ललित मोदी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी और उन्हें भारतीय कानून का सामना करने के लिए स्वदेश क्यों नहीं लाया जा सका। भारतीय राजनीति और व्यवस्था की कमजोरियों से हम अपरिचित नहीं हैं।

केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, ब्रिटिश सांसद कीथ वाज, ब्रिटिश राज परिवार, इंटरपोल के पूर्व प्रमुख रोनाल्ड के नोबल, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला, राकांपा प्रमुख शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश, मुंबई के पुलिस आयुक्त राकेश मारिया, और अब रॉबर्ट व प्रियंका वडरा और कपिल सिब्बल... खेल की दुनिया की अनगिनत हस्तियाँ, दर्जनों बॉलीवुड अभिनेता-अभिनेत्रियाँ, हॉलीवुड की हस्तियाँ और मॉडल तथा बहुत से बड़े कारोबारी व्यक्तित्व.. श्री मोदी के विरोधियों की सूची भी इतनी ही प्रभावशाली है। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर, पूर्व बीसीसीआई प्रमुख एन श्रीनिवासन, न्यूज कॉरपोरेशन के प्रमुख रूपर्ट मरडॉक, टाइम्स समूह और इसके प्रबंध निदेशक विनीत जैन, भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर आदि आदि को वे किसी न किसी रूप में अपना विरोधी घोषित कर चुके है।

हालाँकि ललितगेट का ज्यादातर नुकसान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को हुआ है, लेकिन अगर श्री मोदी से संबंध रखना, लाभ पहुँचाना या हानि से बचाना कोई जुर्म है तो फिर ऐसा करने वाले 'अपराधियों' की कमी नहीं। और शायद यही वजह है कि आज भले ही कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल भाजपाई नेताओं के खिलाफ हंगामा खड़ा करने में जुटे हों, यह मामला आगे चलकर खाना-पूरी से आगे नहीं बढने वाला है। यहाँ हमारा सामना एक ऐसे आर्थिक अभियुक्त के साथ है जो किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं है। वह भारत के सर्वाधिक प्रतिष्ठित, धनाढ्य और प्रभावशाली परिवारों में से एक का उत्तराधिकारी है। इस व्यक्ति का राजनैतिक प्रभाव विस्मयकारी है और चतुर तथा प्रतिभाशाली तो वह है ही। पहले उद्योगपति और फिर इंडियन प्रीमियर लीग के संस्थापक चेयरमैन के रूप में ललित मोदी ने न जाने कितने असरदार लोगों की किस-किस रूप में सेवा की है, लाभ पहुँचाया है और उनके कितने ही संवेदनशील राज वे जानते हैं। वह न जाने किस-किस के खिलाफ साम-दाम-दंड-भेद की शक्ति का प्रयोग करने में सक्षम है। वह भारत की सीमा से बाहर है, सुरक्षित है और भारतीय कानून की गिरफ्त से लगभग मुक्त है। ऐसे में ललित मोदी से जुड़े हर प्रभावशाली व्यक्ति की खैर इसी बात में है कि वह चुप्पी साधे रहे और बर्र के छत्ते में हाथ डालने की कोशिश न करे।

मुद्दा यह कि ललित मोदी के पास जो सूचनाएँ हैं उन्हें कब और कैसे इस्तेमाल करना है, यह बात वे अच्छी तरह जानते हैं। दूसरे, वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को दिए इंटरव्यू में वे खुलकर कह चुके हैं कि उनके संबंध सत्ता पक्ष और विपक्ष में भी बहुत से लोगों से हैं जो इस बात का द्योतक है कि सरकारें बदलने से ललित मोदी जैसे रसूखदार व्यक्तियों के दबदबे में कोई विशेष बदलाव नहीं आता।

वसुंधरा राजे का उदाहरण सामने है। श्रीमती राजे से ललित मोदी के परिवार के पुराने संबंध रहे हैं, इस बात से न वसुंधरा राजे को इंकार है और न ही ललित मोदी को। लेकिन राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के संचालन के मामले में पिछले तीन साल से दोनों के बीच टकराव रहा है। ललित मोदी का मानना है कि वसुंधरा राजे ने उन्हें राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के पद से हटवाने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। आपको याद होगा कि तमाम कानूनी लड़ाइयां लड़ने के बाद ललित मोदी हाईकोर्ट के फैसले के बाद इस पद पर विधिवत् काबिज हुए थे। लेकिन नौ मार्च 2015 को एसोसिएशन की विशेष आम बैठक में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कर उन्हें हटा दिया गया और उनकी जगह पर वसुंधरा राजे के विश्वस्त माने जाने वाले अमीन पठान को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। तब ललित मोदी ने ट्वीट किया था कि "वसुंधरा राजे ने पक्षपातपूर्ण मतदान सुनिश्चित कर पहला हमला कर दिया है। मेरे अगले कदम का इंतजार कीजिए। मैं भी मिसाइलें दाग सकता हूँ।"

जिन लोगों को ताज्जुब हो रहा था कि आखिरकार अपने ही पक्ष में हलफनामे पर दस्तखत करने और अपनी बीमार पत्नी से मिलने के लिए विदेश तक जाने वाली जिन वसुंधरा राजे के साथ ललित मोदी के पारिवारिक संबंध हैं, उन्हीं को नुकसान करने वाला रहस्योद्घाटन करने की गलती ललित मोदी ने क्यों की, उन्हें राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की पृष्ठभूमि के मद्देनजर यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि श्री मोदी किसी मंजे हुए राजनीतिज्ञ से कम नहीं हैं। उन्होंने श्रीमती राजे के साथ अपने संबंधों का कच्चा-चिट्ठा उनकी प्रशंसा करने के लिए नहीं खोला है बल्कि यहाँ एक पुराना हिसाब बराबर किया जा रहा है। इसी संदर्भ में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का भी जिक्र करना प्रासंगिक होगा। ललित मोदी की ही तरह अरुण जेटली का भी भारत में क्रिकेट की संचालन संस्थाओं से गहरा संबंध रहा है। जब आईपीएल में वित्तीय धांधलियों की खबरें सामने आईं तब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने ललित मोदी के खिलाफ लगे 11 आरोपों की जाँच के लिए जो विशेष समिति गठित की थी उसमें अरुण जेटली भी थे। समिति ने मोदी के खिलाफ आठ आरोपों को सत्य पाया था और इसके बाद 25 सितंबर 2013 को बीसीसीआई ने ललित मोदी को अपनी सदस्यता से आजीवन निष्कासित कर दिया था। बाद में राजस्थान के विधानसभा चुनावों के दौरान ललित मोदी ने श्री जेटली पर वसुंधरा राजे को गुमराह करने और श्री जेटली के कथित विश्वस्तों द्वारा भाजपा के चुनाव टिकटों की बिक्री किए जाने जैसे आरोप लगाए थे।

मुद्दा यह कि ललित मोदी के पास जो सूचनाएँ हैं उन्हें कब और कैसे इस्तेमाल करना है, यह बात वे अच्छी तरह जानते हैं। दूसरे, वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को दिए इंटरव्यू में वे खुलकर कह चुके हैं कि उनके संबंध सत्ता पक्ष और विपक्ष में भी बहुत से लोगों से हैं जो इस बात का द्योतक है कि सरकारें बदलने से ललित मोदी जैसे रसूखदार व्यक्तियों के दबदबे में कोई विशेष बदलाव नहीं आता। शुरूआती दिनों में थोड़ा-बहुत एडजस्टमेंट करने से अधिक असुविधा उन्हें नहीं होती। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके शुभचिंतक और विरोधी दोनों थे। मौजूदा सरकार में भी दोनों हैं। यह कोई बहुत अस्वाभाविक बात भी नहीं है। उनका परिवार आजादी की लड़ाई के दिनों से ही देश के राजनैतिक-आर्थिक परिदृश्य में अहम स्थान रखता आया है। खुद श्री मोदी ही तो बता रहे हैं कि संप्रग सरकार के दिनों में भी कुछ मंत्रियों ने उन्हें भारत न लौटने की सलाह दी थी। कहा यह भी गया है कि ऐसे ही प्रभावशाली व्यक्तित्वों ने उनका विदेश जाना संभव भी बनाया। उसके बाद उनकी भारत वापसी सुनिश्चित करने के लिए भी विशेष प्रयास किए गए हों, ऐसा नहीं लगता। हाँ, पूर्व वित्त मंत्रियों पी चिदंबरम और प्रणव मुखर्जी पर अवश्य श्री मोदी अपनी जिंदगी दुष्कर बनाने के आरोप लगाते रहे हैं। और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार आने के बाद भी स्थिति लगभग अपरिवर्तित है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर ललित मोदी के यात्रा दस्तावेजों की प्रक्रियाओं में मदद का आरोप है और इसी तरह की बात ललित मोदी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार और राजीव शुक्ला के बारे में कही है।

भारत में बड़े औद्योगिक घराने प्रतिद्वंद्वी राजनैतिक दलों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखने की कला में माहिर हैं। थोड़ी सी नजर डालेंगे तो ऐसे कई प्रभावशाली उद्योगपति और कारोबारी व्यक्तित्व आपको दिखाई दे जाएंगे जो पिछली सरकार के दिनों में भी प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा पर जाते थे और उनके द्वारा नियुक्त समितियों का अनिवार्य हिस्सा होते थे तथा आज भी लगभग समान या बेहतर स्थिति में हैं। एक उदाहरण उत्तर प्रदेश के पोंटी चड्ढा का है। मायावती सरकार के दिनों में आबकारी क्षेत्र में पोंटी चड्ढा का विशेषाधिकार था। समाजवादी पार्टी के नेतृत्व में विपक्षी दल इसका जमकर विरोध करते रहे। लेकिन जब उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार आई तब भी पोंटी चड्ढा के समूह की स्थिति नहीं बदली। ललित मोदी तो फिर ललित मोदी हैं।

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