रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 26 अगस्त 2015

लब्बोलुआबः

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के पहले अलग-अलग खेमों के लोगों ने योग की धार्मिकता को लेकर बेवजह का विवाद खड़ा कर दिया है जबकि योग हमारे धर्म से अधिक हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा है।

न धार्मिक, न राजनैतिक, योग तो वैश्विक धरोहर है!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के पहले अलग-अलग खेमों के लोगों ने योग की धार्मिकता को लेकर बेवजह का विवाद खड़ा कर दिया है जबकि योग हमारे धर्म से अधिक हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा है। भारत की संस्कृति से उद्भूत है तो स्वाभाविक रूप से यह हिंदू धर्म से किसी न किसी रूप में जुड़ा होगा चूँकि भारत मूल रूप से सनातन धर्म की भूमि है। किंतु योग कोई धार्मिक प्रथा, रीति या बाध्यता नहीं है, बल्कि वह तो स्वस्थ, शांत, तनावमुक्त और सकारात्मक जीवनशैली का सूत्र है। जिस तरह हिंदुओं के लिए योगासन करना ज़रूरी नहीं है उसी तरह दूसरे धर्म के लोगों को योग के प्रयोग से मनाही नहीं है। सवाल निजी पसंद-नापसंद का है। लगभग उसी तरह, जैसे हमारा पहनावा, भोजन या मनोरंजन। पुरुष पश्चिमी पैंट-शर्ट पहन सकते हैं, लड़कियां मुस्लिम संस्कृति से ग्रहण की गई सलवार-कुर्ती पहन सकती हैं, बांग्लादेश की मुस्लिम और श्रीलंका की बौद्ध महिलाएँ साड़ी पहन सकती हैं। ठीक उसी तरह आप चाहें तो योग को अपना सकते हैं और चाहें तो छोड़ सकते हैं।

योग का अर्थ किसी पर अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू धर्म को थोपना नहीं है। वास्तव में योग हमें अपने अतीत से मिला वह उत्कृष्ट उपहार है जिसे बहुधा गलत समझा गया है। आज की बहस का मुद्दा सिर्फ योग की धार्मिकता है, लेकिन अतीत में योगासनों को कामुक क्रियाओं से भी जोड़कर देखा जा चुका है। कुछ वर्ष पहले अमेरिका में किसी ने विवाद खड़ा कर दिया था कि कामसूत्र की भूमि से आए योग के तमाम आसन भी विभिन्न प्रकार की काम-क्रीड़ाओं को ही अभिव्यक्त करते हैं। जिसकी जितनी बुद्धि, उतनी उसकी समझ! कोई इसकी कैसी व्याख्या करता है, इसे आप कैसे नियंत्रित करेंगे? बेहतर हो कि जिन्हें योग से शिकायत है उन्हें इसके लाभों से वंचित रहने का अधिकार दिया जाए।

योग किसी औपचारिक मान्यता का मोहताज नहीं है। अपने गुणों और लाभों के कारण वह स्वतः लोकप्रिय हो रहा है। किंतु संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रारंभ होना इसकी लोकप्रियता को निस्संदेह बढ़ाएगा। सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह मानव मात्र को स्वस्थ और सबल बनाने के उस पवित्र लक्ष्य में योगदान देगा जो किसी एक जाति, धर्म या संप्रदाय मात्र का लक्ष्य नहीं है।

इसके विपरीत, योग की बहुत सुंदर और तर्कसंगत व्याख्याएं भी मिलती हैं। योग का अर्थ व्यायाम, सूर्य नमस्कार, ध्यान, प्राणायाम आदि मात्र नहीं है। योग (जोड़ना) का अर्थ है अपने आपको प्रकृति, पर्यावरण, आसपास के वातावरण, लोगों, परिस्थितियों, वस्तुओं आदि के साथ जोड़कर देखना। अपने आपको समग्र प्रकृति का एक हिस्सा मानकर चलना। समग्र ब्रह्मांड में मौजूद सभी अवयवों के बीच प्रकृति ने सामंजस्य और संतुलन सुनिश्चित किया है। सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने इस संतुलन का रुचिकर उदाहरण दिया है। वे इस सामंजस्य का एक बेहतरीन उदाहरण देते हैं- इंसान सांस छोड़ते हैं तो पेड़ इसे ग्रहण करते हैं। पेड़ जिस वायु को छोड़ते हैं उसे इंसान ग्रहण करते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब हम प्रकृति के द्वारा प्रदत्त इस सामंजस्य को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। तब प्रदूषण का निर्माण होता है, अस्वच्छता पैदा होती है, ग्लोबल वार्मिंग पैदा होती है। योग हमें इसी विचलन से मुक्त कर पुनः प्रकृति के साथ जोड़ने का उपक्रम करता है। वह हमें फिर से उस जीवनशैली से जोड़ने का प्रयास करता है जिसकी अपेक्षा प्रकृति हमसे करती है। किंतु इंसान अपने को ब्रह्मांड के नियमों से ऊपर समझता है।

धर्मनिरपेक्षता और योग में अंतरविरोध नहीं

सनातन धर्म में ऐसी अनगिनत प्रथाएँ, धारणाएँ, मान्यताएँ, रीतियाँ आदि मौजूद हैं, जिन्हें आप वास्तव में धर्म-निरपेक्ष मान सकते हैं। योग इसी श्रेणी में आता है। आयुर्वेद ऐसी ही दूसरी धरोहर है, जिसका आरंभ भले ही हिंदू धर्म से जुड़ा हो, वह सिर्फ हिंदुओं को लाभ पहुँचाने वाली अवधारणा नहीं है। मानव मात्र उसके लाभ का अधिकारी है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भले ही आयुर्वेद भगवान ब्रह्मा से उद्भूत होकर भगवान धन्वंतरि तक पहुंचा हो और अनगिनत ऋषि-मुनियों ने इसे समृद्ध किया हो, किंतु आज जो व्यक्ति अमेरिका या यूरोप में आयुर्वेदिक दवा का सेवन कर रहा है उसे हमारी पौराणिक मान्यताओं या दंतकथाओं से कितना फर्क पड़ता होगा और क्यों? बौद्ध धर्म को देखिए। उसकी चिकित्सा पद्धति में ऐसी अनेक दवाएँ हैं जिन्हें अभिमंत्रित किया जाता है। इनमें से अनेक चमत्कारिक लाभ देती हैं। इसलिए नहीं कि वे बौद्ध धार्मिक मंत्रों से अभिमंत्रित हैं, बल्कि अपने घटकों के गुणधर्मों की वजह से। बौद्ध मतावलंबियों की श्रद्धा, धारणा और विश्वास को चोट पहुँचाए बिना भी हमें इन दवाओं को ग्रहण करने में कोई संकोच नहीं होता क्योंकि हमारी रुचि परिणाम में है, पृष्ठभूमि में नहीं।

योग को हिंदुत्व से जोड़ना अनावश्यक है। वह वैश्विक संपदा और धरोहर का हिस्सा है। पश्चिमी देशों में वह पहले ही बेहद लोकप्रिय है। अमेरिका और यूरोप में सक्रिय योग-शिक्षकों में पश्चिमी नागरिकों की संख्या ही अधिक है। लगभग हर प्रमुख अमेरिकी शहर में अच्छे योग-स्कूल दिखाई देते हैं जिनका संचालन विदेशी लोग कर रहे हैं। प्रसंशवश, चीन, जापान आदि देशों से आने वाले मार्शल आर्ट का उदाहरण देखा जा सकता है। जापान से आया जूड़ो और चीन से आया कराटे दुनिया भर में लोकप्रिय है। हालाँकि इन मार्शल आर्ट्स का संबंध बौद्ध धर्म से है, लेकिन इन्हें सीखने या आजमाने के लिए आपको बौद्ध धर्म को जानने-समझने की जरूरत नहीं। वे हमें अपनी आत्मरक्षा में सक्षम बनाते हैं, यही जानना हमारे लिए काफी है। ठीक उसी तरह योग हमें स्वस्थ और तनावमुक्त बनाता है, हमें सहज-स्वाभाविक जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करता है, इतना जानना पर्याप्त है। माना कि योग में संस्कृत के श्लोकों का प्रयोग होता है। यदि इनसे आपकी धार्मिकता प्रभावित होती है तो आप सिर्फ शारीरिक क्रियाओं पर ध्यान केंद्रित कीजिए। योग के सिद्धांतों में लचीलेपन की कमी नहीं। आज यदि उसके दर्जनों अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं तो इसीलिए।

गर्व की भावना स्वाभाविक

आप दक्षिणपंथी हों या वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक, हिंदू या गैर-हिंदू, विश्व योग दिवस के प्रारंभ पर गर्व और गौरव की भावना स्वाभाविक रूप से आनी चाहिए। जो लोग इसे विवादित बनाते हैं वे इसे संकीर्णता से देखने के दोषी हैं। योग का विरोध करने वालों को समुद्र में डूबने या देश छोड़कर चले जाने की सलाह देने वाले हिंदू धार्मिक नेता एक वैश्विक धरोहर को बहुत छोटा करके देखने के दोषी हैं। उसी तरह, जैसे यादव समाज भगवान श्रीकृष्ण को 'यादव जाति के गौरव' के रूप में पेश करने लगे और जो लोग कृष्णभक्त नहीं हैं उन्हें यादव-विरोधी मानने लगे। श्रीकृष्ण तो समस्त मानवता के हैं, उन्हें उनके विशाल रूप से छोटा बनाकर क्यों पेश किया जाए?

माना कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योग का प्रयोग करने वाले पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं (पंडित जवाहर लाल नेहरू की योग में गहन आस्था थी और अनेक अन्य प्रधानमंत्रियों ने योग को अपनाया था) लेकिन उन्होंने दक्षिण एशिया की साझा संस्कृति के हित में एक बड़ा कार्य अवश्य किया है। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दिनों में भी महात्मा गांधी की पुण्यतिथि को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिली थी। भारतीयता को यदि उसका जायज सम्मान मिलता है तो भले ही उसके पीछे किसी भी सरकार का हाथ क्यों न हो, उसका स्वागत करने और गर्व महसूस करने की जरूरत है। दोनों ही प्रस्तावों को संयुक्त राष्ट्र में अभूतपूर्व समर्थन प्राप्त हुआ था, जो नरम राजनय (सॉफ्ट डिप्लोमेसी) के लिहाज से हमारी राष्ट्रीय सफलताओं का द्योतक है।

यूँ योग किसी औपचारिक मान्यता का मोहताज नहीं है। अपने गुणों और लाभों के कारण वह स्वतः लोकप्रिय हो रहा है। किंतु संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रारंभ होना इसकी लोकप्रियता को निस्संदेह बढ़ाएगा। वह ऐसे लोगों के बीच भी जागरूकता फैलाएगा, जो इस अवधारणा या उसके लाभों से अब तक अपरिचित हैं। सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह मानव मात्र को स्वस्थ और सबल बनाने के उस पवित्र लक्ष्य में योगदान देगा जो किसी एक जाति, धर्म या संप्रदाय मात्र का लक्ष्य नहीं है। इसी लक्ष्य के कारण यूरोप में उद्भूत एलोपैथी पूरी दुनिया में लोगों को रोगमुक्त बनाने में लगी है। इसी लक्ष्य के कारण विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने मानव जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाया है।

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