रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 18 अप्रैल 2015
श्रेणीः  राजनीति
प्रकाशनः प्रभासाक्षी
टैगः  कश्मीर

लब्बोलुआबः

हम जम्मू कश्मीर में अराजकता, हिंसा, आंदोलन, टकराव और अलगाववाद का एक नया दौर झेलने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसी कश्मीर में भारी जद्दोजहद के बाद सामान्य हालात बहाल हुए थे। नई सरकार ने महज डेढ़ महीने में कश्मीर को क्या से क्या बना डाला?

Summary:

Jammu and Kashmir, which had seen normalcy after a long time, is drifting towards anarchy once again. And the blame falls on none other than the state government in which the nationalist BJP is a partner.
डेढ़ महीने में कश्मीर को यह क्या बना डाला?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

जम्मू कश्मीर में सरकार का हिस्सा बनते समय भारतीय जनता पार्टी को अहसास तो ज़रूर रहा होगा कि वहाँ हालात किस दिशा में मुड़ सकते हैं, खासकर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के पिछले कुछ साल के नजरिए को देखते हुए। लेकिन बदलावों की रफ्तार इतनी तेज होगी, यह शायद भाजपा ने न सोचा हो। फिलहाल वहाँ जो सूरते हाल हैं, उन्हें देखते हुए लगता है कि पीडीपी-भाजपा की सरकार आने के बाद कश्मीर में भारत-विरोधी प्रवृत्तियों का उभार हुआ है। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है जिसे कश्मीर मसले पर अपने अडिग रुख के लिए जाना जाता है।

मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने सरकार संभालने के पहले दिन से ही अहसास कराया है जैसे वे किसी एजेंडा को लेकर चल रहे हैं। उनकी दीर्घकालीन सोच स्पष्ट है- कश्मीर मसले का समाधान तब तक संभव नहीं है जब तक कि घाटी के अलगाववादी तत्वों को साथ लेकर नहीं चला जाएगा और पाकिस्तान को भी किसी न किसी रूप में सारी प्रक्रिया से जोड़ा नहीं जाएगा। उनकी यह लाइन भारत के आधिकारिक राष्ट्रीय दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती जो कश्मीर को दो देशों के बीच की समस्या मानता है और उसमें हुर्रियत के नेताओं या किसी तीसरे देश की भूमिका को स्वीकार नहीं करता। मुफ्ती फिलहाल भारत या भाजपा के आधिकारिक रवैये की तरफ से बेपरवाह प्रतीत होते हैं। जाहिर है, वे अपनी पार्टी की स्थिति मजबूत करने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में जम्मू कश्मीर के एक बार फिर उस खतरनाक स्थिति की तरफ लौटने का खतरा बढ़ गया है, जिससे वहाँ की पिछली सरकार ने लंबी जद्दो-जहद के बाद छुटकारा पाया था। याद कीजिए, उमर अब्दुल्ला सरकार को सत्ता में आने के बाद कुछ महीनों तक किस तरह बड़े पैमाने पर होने वाली पत्थरबाजी और अनवरत विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था। हालात से निपटने में शुरूआती नाकामियों के चलते तब उमर अब्दुल्ला को राजनैतिक दृष्टि से अपरिपक्व करार दिया गया था, लेकिन बाद में उन्होंने स्थिति को संभाल लिया और पिछले दो-तीन साल में कश्मीर की स्थिति लगभग सामान्य हो चुकी थी।

उमर अब्दुल्ला की तुलना में ज्यादा राजनैतिक परिपक्वता और अनुभव वाले मुप्ती मोहम्मद सईद तथा कांग्रेस की तुलना में ज्यादा राष्ट्रवादी तथा उग्र रुख रखने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार का प्रदर्शन फिलहाल निराश करने वाला रहा है। खास तौर पर मशर्रत आलम की रिहाई के बाद के घटनाक्रम ने घाटी में अलगाववाद को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है और हाशिए पर चले जा चुके हुर्रियत कांफ्रेंस के सैयद अली शाह गिलानी तथा मीरवाइज उमर फारूक जैसे नेताओं को फिर से प्रासंगिक बना दिया है। मशर्रत आलम के रूप में गिलानी के उत्तराधिकारी का उदय तो हुआ ही है, घाटी के भारत-विरोधी तत्वों में नई जान सी पड़ गई है। उनका आत्मविश्वास इतना अधिक है कि वे सरे आम पाकिस्तानी झंडे फहराने और आतंकवादी हाफिज मोहम्मद सईद के साथ एकजुटता दिखाने वाले नारे लगाने से नहीं झिझक रहे। भारत के लिहाज से देखें तो मुफ्ती सरकार के डेढ़ महीने के कार्यकाल में कश्मीर के हालात कई साल पीछे चले गए लगते हैं।

मुफ्ती आखिर किस तरफ हैं?

अब भले ही मुख्यमंत्री यह कह रहे हों कि घाटी में अलगाववादियों के प्रदर्शनों में पाकिस्तानी झंडे लहराने की बात बर्दाश्त नहीं की जाएगी, लेकिन उन्हें इस बात पर मंथन करने की जरूरत है कि हालात में बिगाड़ की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी अगर किसी पर आती है तो खुद उन्हीं पर। मशर्रत आलम को रिहा करने के फैसले पर देश भर में फैले असंतोष और सत्ता में अपनी भागीदार भाजपा के स्पष्ट विरोध के बावजूद मुफ्ती और उनकी पार्टी पूरी तरह अडिग रहे। यह वही मशर्रत है जिसे पत्थरबाजी वाले प्रदर्शनों का मास्टरमाइंड माना जाता है। राजनीतिज्ञ के नाते न सही प्रशासक के नाते ही सही, मुफ्ती सईद को अहसास होना चाहिए था कि उसके जैसे नेता अपनी रिहाई के बाद चुप नहीं बैठते। वह फिर सक्रिय होगा और नई मुसीबतें खड़ी करेगा। लेकिन मुफ्ती उसकी रिहाई के लिए बेताब नजर आए। शायद वे एक नई शुरूआत करना चाहते थे। शायद उन्होंने सोचा होगा कि इससे अलगाववादियों के साथ एक किस्म की विश्वास बहाली हो सकेगी। शायद दूसरा पक्ष इसे सकारात्मक रूप में ले। बहरहाल, कश्मीर के अलगाववादियों का इतिहास ऐसी कोई भी उम्मीद लगाने की इजाजत नहीं देता।

जिस वर्ग ने उन्हें चुनकर भेजा, उसकी आकांक्षाओं के अनुरूप मुफ्ती ने कश्मीर की विशिष्ट पहचान और अलग दर्जे को रेखांकित करने वाले कई कदम उठाए हैं। मसलन समारोहों में कश्मीर का अपना झंडा भी फहराया जाना और सरकारी गाड़ियों पर एक तरफ उसकी मौजूदगी। यह समझ में आता है। लेकिन उनके बहुत से कदम ऐसे हैं जो पाकिस्तान और अलगाववादी तत्वों को ज्यादा पसंद आएंगे। उनके सहयोगी अफजल गुरु का शव कश्मीर लाए जाने की बात कर चुके हैं तो खुद मुफ्ती पाकिस्तानी मुद्रा का प्रयोग शुरू करने की हिमायत कर चुके हैं। उनका वह बयान तो कमाल का था जब उन्होंने राज्य में चुनावों के सकुशल संपन्न होने के लिए पाकिस्तान और आतंकवादी संगठनों को श्रेय दे डाला था। संसद में इस पर हंगामा हुआ और तमाम राजनैतिक दलों के भारी विरोध के बीच भाजपा को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। ऐसा कब होता है जब सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल एक दल अपने आपको दूसरे दल के फैसलों से अलग करने की घोषणा संसद में करे।


कश्मीर के हालात जिस अंदाज में बदले हैं, उसमें कश्मीर का हर अलगाववादी तबका अपने आपको प्रासंगिक सिद्ध करने की होड़ में लग गया है। फिर भले ही वह सैयद अली शाह गिलानी जैसे पाकिस्तान समर्थक हों या फिर मीरवाइज उमर फारूक जैसे हुर्रियत कांफ्रेंस के अपेक्षाकृत उदारवादी नेता।


इस तरह बेबस प्रतीत होना एक सामर्थ्यवान नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के अनुकूल नहीं था। पिछले डेढ़ महीने के दौरान भाजपा निरंतर उलझन में दिखाई देती रही है। वह कश्मीर में फंस गई सी प्रतीत होती है। आने वाले दिनों में भी भाजपा की बेबसी बनी रहने वाली है क्योंकि अब तक के घटनाक्रम से लगता नहीं कि मुफ्ती मोहम्मद सईद एक सीमा के आगे किसी की परवाह करते हैं। हद से हद राष्ट्रपति शासन लगेगा और नए चुनाव हो जाएंगे। मौजूदा हालात के मद्देनजर पूरे आसार हैं कि कश्मीर घाटी में पिछले नतीजे ही दोहराए जाएंगे। राजनैतिक लिहाज से पीडीपी की स्थिति कमजोर नहीं पड़ी है। भाजपा की बात अलग है।

फिर आएगा टकराव का दौर

मशर्रत आलम की रिहाई जम्मू कश्मीर की समकालीन राजनीति का नया अध्याय सिद्ध हो रही है। पिछली सरकार के कार्यकाल में अंतिम चरण तक कश्मीर की मानसिकता में बदलाव दिखाई दे रहा था। अलगाववाद और राजनीति की तुलना में विकास और अर्थव्यवस्था पर फोकस आ रहा था। भाजपा, जो कि आर्थिक विकास को खासी अहमियत दे रही है, इन हालात का सकारात्मक कामकाज के लिए दोहन कर सकती थी। इस सरकार को प्रदेश के सभी क्षेत्रों में जिस तरह का समर्थन हासिल है (पीडीपी को घाटी में और भाजपा को जम्मू-लद्दाख में) वह बदलाव के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता था। मुफ्ती जैसे अनुभवी नेता का नेतृत्व इस सरकार की बड़ी ताकत थी। लेकिन नई सरकार की शुरूआत ही गलत हो गई लगती है। न सिर्फ कश्मीर में तनाव लौट आया है बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन में आंतरिक मतभेद भी उपज गए हैं। कानून व्यवस्था की समस्या और अलगाववाद-आतंकवाद की आशंका प्रबल हो गई है। विकास का नारा ठंडे बस्ते में चला गया है।

मशर्रत आलम के रूप में पाकिस्तान समर्थक अलगाववाद के नए चेहरे का उदय हो गया है। सैयद अली शाह गिलानी अब उम्रदराज हो चले हैं लेकिन यह उम्मीद लगाकर नहीं चला जा सकता कि उनके बाद पाकिस्तान समर्थक धारा कुंद हो जाएगी। यह धारा मशर्रत के इर्द-गिर्द जुट गई है और उसे इस तरह घटनाओं के केंद्र में लाने के पीछे खुद जम्मू कश्मीर सरकार सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। फिलहाल जिस अंदाज में हालात बदले हैं, उसमें कश्मीर का हर अलगाववादी तबका अपने आपको प्रासंगिक सिद्ध करने की होड़ में लग गया है। फिर भले ही वह सैयद अली शाह गिलानी जैसे पाकिस्तान समर्थक हों या फिर मीरवाइज उमर फारूक जैसे हुर्रियत कांफ्रेंस के अपेक्षाकृत उदारवादी नेता। भले ही वह कश्मीर की आजादी के समर्थक जेकेएलएफ नेता यासीन मलिक हों या फिर हाफिज सईद जैसे आतंकवादी तत्व। हम जम्मू कश्मीर में अराजकता, हिंसा, आंदोलन, टकराव और अलगाववाद का एक नया दौर झेलने की दिशा में बढ़ रहे हैं। हैरत की बात है कि चुनाव के उस पार और इस पार हालात में इतना बड़ा विरोधाभास हो सकता है।

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