रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 21 फरवरी 2015
श्रेणीः  राजनीति
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  बिहार

लब्बोलुआबः

मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार की वापसी यकीनन उनका आत्मविश्वास बढ़ाएगी और जिस भारतीय जनता पार्टी को बिहार अपनी मुट्ठी में करने का लगभग पूरा यकीन था, उसे कुछ हद तक निराश करेगी। लेकिन क्या यह घटनाक्रम वहाँ के भावी चुनाव नतीजों की दिशा तय करेगा?

Summary:

While Nitish Kumar has emerged as a clear winner in Bihar's political battle, a question mark over his winnability in the impending 'war' (assembly elections) is looming large. Will the Bihar disappointment finally turn into a boon in disguise for the BJP as six months down the line a possible anti-establishment wave might impact the poll outcome, analyses Balendu Sharma Dadhich.
महादलित मसीहा का काल्पनिक हीरोइज़्म और बिहार का एंटी-क्लाइमेक्स

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

बिहार के राजनैतिक और संवैधानिक संकट का पटाक्षेप आखिरकार लगभग उसी तरह हो गया जैसे किसी पहले से लिखी गई पटकथा का मंचन किया जा रहा हो। उत्तर प्रदेश में विधानसभा अध्यक्ष पद पर रहते हुए कई तरह के विवादास्पद फैसलों के लिए चर्चित रहे राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने ऐसा कोई नाटकीय कदम नहीं उठाया जिसकी आशंका जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार को थी। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अपनी तमाम कोशिशों और आश्चर्चयनक आत्मविश्वास के बावजूद अचानक कोई जादुई किस्म के राजनैतिक जनाधार की व्यवस्था करने में नाकाम रहे। जनता दल यूनाइटे़ड और उसके सहयोगियों का नाजुक माना जाने वाला गठजोड़ अडिग रहा और विधायकों की खरीद-फरोख़्त की उम्मीदों तथा आशंकाओं के बावजूद बिहार के विधायक अपने-अपने खेमे में डटे रहे।

पिछले पखवाड़े के घटनाक्रम में अगर फिलहाल कोई एक व्यक्ति सर्वाधिक लाभान्वित होकर उभरा है तो वह है नीतीश कुमार जिन्हें लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी की शर्मनाक पराजय और झेंपते हुए इस्तीफा देने की निराशाजनक घटनाओं के बाद आखिरकार एक अलग किस्म की जीत पर खुश होने का मौका मिल गया है। फिर भले ही यह जीत खुद अपनी ही पैदा की गई समस्या के खिलाफ रही हो और किसी दूसरे राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी के विरुद्ध नहीं बल्कि खुद अपने ही पूर्व सहयोगियों के खिलाफ रही हो। मुख्यमंत्री पद पर नीतीश कुमार की वापसी यकीनन उनका आत्मविश्वास बढ़ाएगी और जिस भारतीय जनता पार्टी को बिहार अपनी मुट्ठी में करने का लगभग पूरा यकीन था, उसे कुछ हद तक निराश करेगी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बिहार में लगभग छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनावों की राजनैतिक पटकथा भी कुछ इसी तर्ज पर संपन्न होगी।

महादलित 'मसीहा' का खांटी हीरोइज़्म

यह निष्कर्ष निकालना कोई बहुत मंथन का काम नहीं है कि पटना और दिल्ली में खेली गई राजनैतिक शतरंज की बाजी में हार किसके हाथ लगी। वह है पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी। वैसे उन्होंने अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में जिस किस्म के आत्मविश्वास और राजनैतिक चतुराई का परिचय दिया वह आश्चर्यजनक था। अगर वे अपने समूचे कार्यकाल के दौरान इतने ही सक्रिय और आत्मविश्वास से भरे रहे होते तो शायद स्थितियाँ इस मुकाम तक पहुँचती ही नहीं। लेकिन मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अपने बयानों और आचरण से उन्होंने किसी बड़े राजनैतिक व्यक्तित्व का परिचय नहीं दिया। विधानसभा में विश्वास मत के कुछ घंटे पहले तक तमाम तरह के दावे करने के बावजूद जिस तरह उन्होंने विश्वास मत का सामना किए बिना तमाम तरह की विवशताएँ गिनाते हुए चुपचाप त्यागपत्र दे दिया, वह भी एंटी-क्लाइमेक्स के समान था। उन पर टिकीं भारतीय जनता पार्टी और तमाम दूसरे लोगों की उम्मीदें भी पलक झपकते ही धराशायी हो गईं और हम सब महादलितों के नए मसीहा के उभार तथा नई किस्म के खांटी हीरोइज़्म का दर्शन करने से वंचित रह गए।

खैर, हुआ वही जो होना था। जिसके पास बहुमत था, आखिरकार उसी की जीत हुई। यूँ यह सारा किस्सा शुरू ही नहीं हुआ होता अगर नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनावों की पराजय को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाया होता। उन्होंने इस घटनाक्रम से कई राजनैतिक सबक सीखे होंगे। जीतन राम मांझी के रूप में यकीनन उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में ऐसे व्यक्ति का चयन किया होगा जिससे उन्हें किसी भी किस्म का राजनैतिक चुनौती मिलने की न्यूनतम आशंका रही होगी। जीतन मांझी की यह दलील गलत नहीं लगती कि नीतीश कुमार ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे जो उनके निर्णयों पर ठप्पा लगाए। लेकिन राजनीति आखिरकार राजनीति है और यहाँ आने वाला हर व्यक्ति एक महत्वाकांक्षा से प्रेरित होता है। नीतीश के मुख्यमंत्री रहते जीतन मांझी की महत्वाकांक्षा दमित, शोषित, पीड़ित की भांति व्यक्तित्व के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी थी लेकिन रेगिस्तान में बरसों से सूखे पड़े किसी पेड़ को अचानक नियमित रूप से खाद-पानी मिलने लगे तो वह कुछ इस अंदाज में उठ खड़ा होता है कि आश्चर्य होता है कि मियाँ अब तक आप कहाँ थे! लगभग इसी तर्ज पर जीतन राम मांझी ने बदली परिस्थितियों में स्वायत्तता का परिचय देना शुरू किया और नए उभरे आत्मविश्वास पर सवार होकर अपना जैसा-तैसा राजनैतिक दर्शन परोसने लगे।


राजनीति आखिरकार राजनीति है और यहाँ आने वाला हर व्यक्ति महत्वाकांक्षा से प्रेरित होता है। नीतीश के मुख्यमंत्री रहते जीतन मांझी की महत्वाकांक्षा दमित, शोषित, पीड़ित की भांति व्यक्तित्व के किसी कोने में उपेक्षित पड़ी थी लेकिन रेगिस्तान में बरसों से सूखे पड़े किसी पेड़ को अचानक नियमित रूप से खाद-पानी मिलने लगे तो वह कुछ इस अंदाज में उठ खड़ा होता है कि आश्चर्य होता है कि मियाँ अब तक आप कहाँ थे! जीतन मांझी इसके जीवंत प्रतीक हैं।


शुरूआती संयम के बाद नीतीश और उनकी पार्टी को अहसास हो गया कि उनसे क्या गलती हुई है। यह व्यक्ति न तो उनका अंध-भक्त है, न ही वह किसी किस्म के अहसान तले दबा हुआ महसूस करता है और न ही राजनैतिक महत्वाकांक्षा से रहित है। जब जीतन मांझी ने बयान दिया कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री भी एक महादलित होगा, तब नीतीश को अहसास हुआ कि यहाँ तो उनका राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी तैयार हो रहा है। भाजपा भले ही कहे कि नीतीश ने एक महादलित का अपमान किया है, उनकी जगह पर कोई भी और क्षत्रप होता तो आखिरकार वही करता जो नीतीश ने किया।

भाजपा का शाश्वत असमंजस

भारतीय जनता पार्टी ने समूचे बिहार प्रकरण के दौरान राजनैतिक अनिश्चितता का परिचय दिया है। जीतन राम मांझी की गतिविधियों से सर्वाधिक प्रसन्नता भाजपा को ही हुई थी और पार्टी नेता सुशील कुमार मोदी ने यह बयान देकर कि श्री मांझी चाहें तो विधानसभा भंग करने की सिफारिश करके कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं, उनकी महत्वाकांक्षा को उभारने में यकीनन योगदान दिया था। तब तक इस बात में कोई संदेह नहीं था कि जरूरत पड़ने पर पार्टी जीतन राम मांझी की सरकार को बचाने के लिए सब कुछ करेगी। बहरहाल, दिल्ली के विधानसभा चुनावों ने राजनैतिक माहौल बदल दिया। जिस तरह जनता ने आम आदमी पार्टी को जिताया और भाजपा की तमाम रणनीतियाँ, राजनैतिक चातुरी और आक्रामकता निष्प्रभावी सिद्ध हुई उससे पार्टी के भीतर दबाव बनना शुरू हुआ कि दिल्ली की हार से सबक लेते हुए पार्टी को अपने रुख में संशोधन करना होगा। बिहार में कोई भी गलत कदम उठाना विधानसभा चुनावों में भारी पड़ सकता है। नतीजतन पार्टी ऊहापोह में पड़ गई कि आखिर जीतन मांझी का क्या किया जाए। इस बीच श्री मांझी 'हमारे पास भी कमीशन पहुँचता है' का बयान देकर स्थितियाँ और विकट बना चुके थे। इन्हीं जीतन मांझी की सरकार को कुछ अरसा पहले बिहार भाजपा ने 'जंगल राज- नंबर दो' की संज्ञा दी थी।

भारतीय जनता पार्टी के नजरिए में अनिश्चितता अंतिम समय तक बनी रही और जब उसके सामने स्पष्ट हो गया कि श्री मांझी विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त करने की स्थिति में नहीं हैं तब उसने उनका आत्मविश्वास बनाए रखने के लिए ठीक एक दिन पहले घोषणा की कि नीतीश कुमार ने महादलितों का अपमान किया है इसलिए वह विश्वास मत के दौरान श्री मांझी का साथ देगी। विश्वास मत के दौरान भले ही मांझी हार जाते लेकिन सारे घटनाक्रम को महादलितों के साथ ज्यादती के रूप में पेश करने का मौका जरूर मिलता और यह भाजपा के लिए राजनैतिक दृष्टि से लाभप्रद होता। बहरहाल, जीतन राम मांझी ऐन मौके पर मैदान छोड़ गए।

क्या होगा विधानसभा चुनावों में

सो नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री भये। उन्होंने अरविंद केजरीवाल के माफीनामे से सबक लेते हुए पिछली बार इस्तीफा देने के लिए जनता से माफी भी मांग ली है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि चंद महीनों बाद बिहार में चुनाव घटित होने हैं और श्री कुमार का सत्ता में मौजूद रहना उस समय फायदे का सौदा सिद्ध होगा या नुकसान का? भाजपा को उम्मीद है कि नीतीश कुमार को प्रतिष्ठान विरोधी माहौल का नुकसान होगा। जनता भूलने में माहिर है और छह महीने बाद वह जीतन राम मांझी का कार्यकाल भूल चुकी होगी और तमाम नाकामियाँ नीतीश कुमार के हिस्से में गिनी जाएंगी। नीतीश कुमार को उम्मीद है कि वे वनडे क्रिकेट के आखिरी पावर प्ले की तर्ज पर अपने छोटे से कार्यकाल के दौरान फटाफट बड़े-बड़े फैसले कर डालेंगे और उन पर अमल भी करने में कामयाब होंगे। तब शायद वे प्रतिष्ठान विरोधी लहर के प्रभाव से बच जाएं। समय की कमी और बजट की सीमा उनके खिलाफ जाती है। उनकी नई मजबूती इस बात से है कि किसी समय उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी रहे लालू प्रसाद यादव भाजपा की विजय यात्रा रोकने के लिए उनके साथ खड़े हैं। कांग्रेस और वामपंथियों का समर्थन भी उन्हें हासिल है।

अपने विरोधी दलों के वोटों की लामबंदी फिलहाल भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अगर जीतन राम मांझी अपना अलग वोट बैंक तैयार करने में सफल होते तो भाजपा के लिए लाभ की स्थिति बनती, जो इस समय अगड़ी जातियों के समर्थन पर अधिक निर्भर है। अलबत्ता, जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल की एकजुटता जनता परिवार की एकजुटता की ही तरह भरोसेमंद नहीं है। अगले चुनाव के संदर्भ में, नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसे कायम रखने की ही होगी। अगर उनके सामने सबसे बड़ा खतरा कोई है तो साथियों के बिखराव की आशंका ही है।

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