Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 02 जनवरी 2015
श्रेणीः  सुरक्षा
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  भारत, पाकिस्तान

लब्बोलुआबः

भारत-पाकिस्तान सीमा पर इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह मीडिया के लिए भले ही सुर्खियों का स्रोत हो और दोनों देशों के सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों को अपनी पीठ थपथपाने का मौका दे रहा हो लेकिन है बेहद दुर्भाग्यपूर्ण।

Summary:

As history has proved, the ongoing confrontration on Indo-Pakistan border is going to serve nobody's interest. There is one loser though in these battles in which no one wins, and that is humanity.
सीमा पर निरर्थक गोलीबारी में हारती है सिर्फ़ इंसानियत

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत-पाकिस्तान सीमा पर इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह मीडिया के लिए भले ही सुर्खियों का स्रोत हो और दोनों देशों के सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों को अपनी पीठ थपथपाने का मौका दे रहा हो लेकिन है बेहद दुर्भाग्यपूर्ण। भारत में हम लगातार पाकिस्तान को सीमा पर गोलीबारी के लिए कोस रहे हैं। सीमा पर तैनात जवानों को हर पाकिस्तानी हमले का उससे भी बड़े परिमाण में जवाब देने का निर्देश दिया जा चुका है। दूसरी ओर पाकिस्तान सीमाई गोलीबारी के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है। असल में गोलीबारी और जवाबी गोलीबारी का सिलसिला जब शुरू होता है तो 'शुरूआत किसने की' का तथ्य धुंधला पड़ जाता है। दोनों देशों के बीच राजनैतिक, सैन्य और सीमाई स्तर पर जिस तरह का अविश्वास मौजूद है, उसमें किसी एक की छोटी सी गलती भी सिलसिलेवार संघर्ष का रूप ले सकती है।

इस तरह की फायरिंग का भारत और पाकिस्तान दोनों को क्या लाभ हो सकता है? पाकिस्तान के बारे में हमारे पारंपरिक अनुभव के आधार पर अनेक तर्क दिए जा रहे हैं। मसलन यह कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे से पहले वहाँ की सेना कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक बार फिर उभारना चाहती है। ऐसे में सीमा पर तनाव बने रहना उसके राजनयिक हितों के अनुकूल है। पाकिस्तानी कार्रवाई का दूसरा कारण आतंकवादियों को भारत में प्रवेश कराने पर केंद्रित हो सकता है। भारत में आतंकवादी घुसपैठ से सेना का ध्यान हटाने के लिए रेंजरों द्वारा गोलीबारी का प्रयोग असामान्य नहीं है। आईएसआई और उसके संरक्षण में पलने वाले आतंकवादी संगठन ओबामा के दौरे के समय भारत में कोई बड़ी कार्रवाई कर सकते हैं, यह एक स्वाभाविक सी आशंका है। गुप्तचर एजेंसियों ने इस आशय के इनपुट भी दिए हैं। गुजरात में पोरबंदर क्षेत्र में समुद्री सीमा में तटरक्षक दल द्वारा पीछा किए जाने पर अपने आप को विस्फोट में उड़ा लेने वाली नौका भी आतंकवादियों की साजिशों की ओर इशारा करती है।

सीमा पर पाकिस्तानी गोलीबारी जम्मू कश्मीर में सफलता से संपन्न हुए विधानसभा चुनावों से भी प्रेरित हो सकती है। उसे आतंकवादियों और इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस की हताशा की हिंसक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। और अंत में इस पारंपरिक तर्क को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि अपने देश की अशांति, हिंसा, अस्थिरता, आर्थिक संकट, राजनैतिक गतिरोध आदि-आदि से पाकिस्तानी जनता का ध्यान हटाने के लिए वहाँ की सेना पूर्वी सेना पर ऐसे हालात पैदा करे जिनसे लोगों का ध्यान स्थानीय परिस्थितियों से हटकर भारत से टकराव पर केंद्रित हो जाए। अगर इन दलीलों में सच्चाई है तो फिर गृह मंत्री राजनाथ सिंह के इस बयान से सहमत हुआ जा सकता है कि पाकिस्तान ने आज भी अपनी गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा। बहरहाल, इस प्रसंग के दूसरे पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है।

आखिर क्यों?

जिस सवाल पर मंथन करने की जरूरत है वह यह है कि पाकिस्तान की सेना, जिसने अपने संसाधन तहरीके तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ बड़े पैमाने पर संचालित सैन्य अभियान में झोंके हुए हैं, इस नाजुक मौके पर भारतीय सीमा पर अपना ध्यान क्यों केंद्रित करना चाहेगी? क्या अफगानिस्तान सीमा पर तैनात सैन्य संसाधनों और उत्तरी वजीरिस्तान की कार्रवाई में लगे संसाधनों के बाद पाकिस्तान सेना ऐसी सुविधाजनक स्थिति में रह गई है कि वह भारतीय सीमा पर संघर्ष के गंभीर रूप ले लेने का खतरा मोल ले सके? हर बार किसी बड़े वैश्विक नेता की भारत यात्रा के आसपास बड़ी आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने से अब तक पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर कोई राजनयिक लाभ प्राप्त नहीं हुआ है। आज भी अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र दोनों कश्मीर समस्या को दोनों देशों के बीच आपसी समस्या मानते हैं और उसमें किसी तरह का दखल करने को तैयार नहीं हैं। जो काम पिछले दो-तीन दशकों के छद्म युद्ध और आतंकवाद के बावजूद नहीं हो सका, वह अब कैसे हो जाएगा जबकि जम्मू कश्मीर से आतंकवाद का लगभग सफाया हो चुका है? या तो पाकिस्तानी हुक्मरान जमीनी हालात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, या सीमा पर तनाव जारी रहने में फौज, आईएसआई तथा आतंकवादियों के निजी हित हैं।

जहाँ पाकिस्तानी नजरिया चिंता और उलझन पैदा करता है वहीं भारत के दृष्टिकोण में आए बदलाव पर भी विचार करना जरूरी है। नरेंद्र मोदी सरकार सीमा पर होने वाली हर हरकत का उससे बड़े परिमाण में जवाब देने की नीति पर चल रही है। श्री मोदी और भारतीय जनता पार्टी पाकिस्तान के संदर्भ में अपने आक्रामक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते हैं और सीमा के घटनाक्रम पर उनकी प्रतिक्रिया उसी के अनुरूप है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी सेना को पाकिस्तानी कार्रवाइयों का कई गुना बड़ा जवाब देने का निर्देश देते हुए कहा है कि अगले छह महीने में पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

भारत का नजरिया

क्या हमारे 'कड़ी कार्रवाई' करने का यह सही समय है जबकि पेशावर के सैनिक स्कूल में मासूम बच्चों के खिलाफ हुए आतंकवादी हमलों के बाद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और पाक सेना आतंकवाद के सफाये की बात कर रही है? रोजाना उत्तरी वजीरिस्तान में दर्जनों आतंकवादी फौजी कार्रवाई में मारे जा रहे हैं। यह सवाल उलझन भरा है कि भारत इस प्रक्रिया में अपनी ओर से कोई रुकावट क्यों पेश करना चाहेगा? पेशावर कांड के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ जिस तरह की एकजुटता दिखाई थी, उसने दोनों देशों के बीच स्थितियाँ बेहतर बनाने में किसी भी सीमाई संघर्ष या राजनैतिक पहल से बड़ा प्रभाव पैदा किया था। मुझे लगता है कि दोनों ही देशों को इस बात का अहसास होना चाहिए कि आतंकवाद उनका साझा शत्रु है और उसी के सफाये को वरीयता दी जानी चाहिए। इधर जिन दो पाकिस्तानी रेंजरों के सीमाई गोलीबारी में मारे जाने की बात कही जा रही है, उनके बारे में पाकिस्तान की ओर से कहा जा रहा है कि वे सीमा सुरक्षा बल के साथ फ्लैग मीटिंग के लिए सफेद झंडा लेकर जा रहे थे और जब वे पहले से तय स्थान पर बैठक के लिए पहुँचे तो भारतीय सुरक्षा बलों ने अंधाधुंध गोलीबारी कर उन्हें मार डाला। अगर यह सच है तो पाकिस्तान में होने वाली प्रतिक्रिया लगभग उसी तरह की होगी, जैसी कि भारत में अपने दो सैनिकों के सिर काट लिए जाने पर हुई थी।

लब्बो लुआब यह कि सीमा पर हो रही मारकाट से भले ही दोनों में से किसी देश के राजनैतिक हित सधते हों, हम वहाँ पर रोजाना उन्मादपूर्ण कार्रवाइयों के गवाह बन रहे हैं। ऐसी कार्रवाइयाँ, जो न तो भारत-पाकिस्तान के संबंध सुधारने में कोई योगदान देने वाली हैं और न ही कश्मीर के मसले को सुलझाने वाली हैँ। पहले सियाचिन में यही होता था, जब दोनों तरफ के दर्जनों जवाब आपसी कार्रवाइयों में जान दे देते थे। आखिरकार क्या हुआ? क्या सियाचिन में स्थितियाँ बदलीं? जरूरत इस बात की है कि दोनों ही देश टकराव के रास्ते से लौटें। दोनों के नजरियों में बदलाव की जरूरत है। पाकिस्तानी सेना को अब यह स्वीकार करना होगा कि आतंकवाद और सीमाई गोलीबारी से उसका लक्ष्य न अब तक हासिल हुआ है और न ही आगे हो सकेगा। दूसरी ओर भारत के लिए विचारणीय प्रश्न यह है कि हमारे रिश्ते जितने संवेदनशील हैं, उन्हें देखते हुए 'कई गुना बड़े अनुपात में जवाब' देने की रणनीति किसी भी समय भारत-पाक युद्ध में बदल सकती है। एक ऐसा युद्ध जिसके परिणाम, जो परमाणु हथियारों की मौजूदगी के कारण, हमारे अनुमान से कहीं अधिक विध्वंसक हो सकते हैं। ईश्वर करे दोनों तरफ सद्बुद्धि लौटे और हम युद्ध की बजाए शांति की फिक्र करना शुरू करें।

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