बालेन्दु शर्मा दाधीच
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 13 दिसंबर 2014
श्रेणीः  विदेश नीति
प्रकाशनः प्रभासाक्षी
टैगः  अमेरिका, रूस, राजनय

लब्बोलुआबः

बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत के सामने अमेरिका और रूस ही नहीं बल्कि पारस्परिक विपरीत हितों वाले कई अन्य देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने की कठिन चुनौती मौजूद है। अब तक हमारी सरकारों ने यह काम बखूबी अंजाम दिया है।

Summary:

As tensions between America and Russia refuse to recede, India has a tough job at hand while trying to strengthen its bilateral ties with powers that have conflicting interests and don't hesitate to make their displeasure known.
ओबामा भी खुश, पुतिन भी खुशः विदेश नीति में संतुलन की कठिन चुनौती

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की प्रस्तावित यात्रा के ठीक पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन का पूर्व निर्धारित दौरे पर भारत आना नरेंद्र मोदी सरकार के लिए किसी लिटमस टेस्ट से कम नहीं था। उक्रेन में रूसी दखलंदाजी के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो धड़ेबंदी हो रही है, उसमें अमेरिका एक तरफ और रूस दूसरी तरफ है। न सिर्फ भारत सरकार बल्कि अमेरिका और रूस की सरकारों पर भी दोनों राष्ट्रपतियों की यात्राओं को लेकर दबाव की स्थिति है। अब अमेरिका ने रूस और भारत के बीच हुए परमाणु सहयोग और रक्षा समझौतों पर अप्रसन्नता जताकर स्पष्ट कर दिया है कि दोनों ताकतों के साथ संबंधों में संतुलन पैदा करने की चुनौती नई दिल्ली के लिए कोई आसान चुनौती नहीं है। भारत सरकार रूसी राष्ट्रपति की यात्रा को बहुत अधिक 'मीडिया हाइप' देने से बची है और यात्रा के राजनैतिक पक्ष की बजाए वाणिज्यिक पहलुओं को ज्यादा अहमियत दी है। फिर भी अमेरिका की नाखुशी स्पष्ट है जिसने टिप्पणी की है कि क्रीमिया के घटनाक्रम के बाद रूस के साथ 'कामकाज की स्थिति पहले जैसी सामान्य' नहीं रह गई है। आशय यह कि भारत-रूस कारोबारी संबंधों की प्रगाढ़ता पर भी अमेरिका को आपत्ति है।

अमेरिका की उलझन स्वाभाविक है, जिसने राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा को खासी अहमियत दी है। भारतीय गणतंत्र दिवस के आधिकारिक मेहमान का दर्जा निस्संदेह अत्यधिक सम्मान का विषय है और अमेरिकी संसदीय चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के बाद विदेश नीति के मोर्चे पर ओबामा को कुछ बड़ी उपलब्धियों की ज़रूरत है। भारत के साथ संबंधों में प्रगाढ़ता इस लिहाज से महत्वपूर्ण है, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका के साथ पारंपरिक रूप से तनावपूर्ण संबंधों और देवयानी खोबरागड़े के साथ अमेरिका में हुए अप्रिय घटनाक्रम के बाद दोतरफा रिश्तों में आए बिगाड़ के संदर्भ में। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति को आमंत्रित किया तो श्री ओबामा ने न्यौता स्वीकार करने में देर नहीं लगाई। बहरहाल, रूसी राष्ट्रपति के भारत दौरे ने उनकी उलझन यकीनन बढ़ाई है। यह अमेरिका के आधिकारिक बयान से स्पष्ट है। हालाँकि भारत का रूस के साथ अपने पारंपरिक रिश्तों की प्रगाढ़ता को रेखांकित करना स्वाभाविक और अपेक्षित था लेकिन वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों के मद्देनजर अमेरिका इसकी टाइमिंग से खुश नहीं है।

ऐसा नहीं है कि उलझन रूस के सामने नहीं है। राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा से पहले रूस में आशंका जताई गई थी कि क्या उनकी यात्रा अमेरिकी राष्ट्रपति के दौरे की हाइप में फीकी तो नहीं पड़ जाएगी? हालाँकि रूस सरकार ने इस आशंका को बेबुनियाद करार दिया था, जब श्री पुतिन ने कहा कि भारत में सत्ता के शिखर पर एक ऐसा व्यक्ति है जो रूस के साथ पारंपरिक संबंधों के प्रति समर्पित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि रूस के साथ संबंधों में कोई बदलाव नहीं आया है। श्री मोदी ने रूस के बरक्स भारत की भावनाओं को इन शब्दों में स्पष्ट किया था कि भारत के किसी भी बच्चे से पूछ लीजिए कि हमारा सबसे अच्छा दोस्त कौनसा है और वह तपाक से रूस का नाम लेगा। भारत ने उक्रेन में रूसी दखल का समर्थन नहीं किया है लेकिन उसके खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई के खिलाफ है। रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर मतदान में भारत ने हिस्सा नहीं लिया था।

बदलता वैश्विक परिदृश्य

लेकिन दूसरी तरफ भारत का लगभग हर बच्चा आज अमेरिका के साथ प्रगाढ़ संबंधों की हिमायत करता है। खासकर शीतयुद्ध के समापन के बाद, जब रूस का राजनैतिक-आर्थिक दबदबा निरंतर घटा है। अब क्रीमिया संकट के बाद तो रूस अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ चुका है। ऐसा नहीं कि रूस के साथ हमारे संबंधों में कोई नकारात्मक पहलू है ही नहीं। पाकिस्तान के साथ उसके रिश्ते लगातार प्रगाढ़ हो रहे हैं और भारत को जिस बात से खास तौर पर आपत्ति है वह है रक्षा क्षेत्र में रूस-पाकिस्तान संबंधों में आ रही निकटता। हाल ही में रूसी रक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान का दौरा किया था। अगर कारोबारी और राजनैतिक क्षेत्रों में उनके संबंध सुधरते हैं तो भारत को आपत्ति नहीं है लेकिन वह किसी पारंपरिक मित्र से यह उम्मीद नहीं करेगा कि वह हमारे खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तान को हथियार देने को तैयार हो जाए। रूस की इस सफाई को पचाना भारत के लिए आसान नहीं होगा कि पाकिस्तान से उसके संबंधों में बेहतरी वास्तव में भारत के हित में है। दूसरी ओर रूस को इस बात पर आपत्ति है कि जहाँ दशकों तक वह भारत का सबसे बड़ा रक्षा-उपकरण सप्लायर रहा है, वहीं अब भारत ने अमेरिका से भी सुरक्षा संबंध बहुत मजबूत कर लिए हैं। कुछ साल पहले तक भारत के रक्षा आयात में रूस का हिस्सा 70 प्रतिशत और अमेरिका का सात प्रतिशत था। इस रुझान में तेजी से बदलाव आ रहा है।

भारतीय विदेश नीति के नियंत्रकों और निर्धारकों के लिए दो बड़ी विश्व शक्तियों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने की चुनौती पहली बार नहीं आई है। जिस अंदाज में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कारोबार में भारत का उभार हो रहा है, उसके मद्देनजर आज हम लाभ की ऐसी स्थिति में है, जो पहले उपलब्ध नहीं थी। हर बड़ी राजनैतिक, आर्थिक और सैन्य शक्ति भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ बनाना चाहती है। ऐसे में पारस्परिक विपरीत हितों वाले देशों के साथ संबंध बनाना एक मुश्किल चुनौती है, जिसे संयोगवश अब तक हमारी सरकारें कुशलता से झेलती आई हैं। चीन और जापान का उदाहरण देखिए। विश्व की सबसे तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति चीन के साथ कारोबारी संबंध मजबूत बनाने की अनिवार्यता को भारत अनदेखा नहीं कर सकता। लेकिन दूसरी तरफ जापान का दृष्टिकोण हमारे प्रति मित्रता और सहयोग का रहा है। चीन भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती है। जापान के लिए भी चीन की यही स्थिति है। ऐसे में चीनी सैन्य चुनौती को संतुलित करने के लिए भी जापान के साथ निकट संबंध बनाना हमारे लिए आवश्यक है। भारत-जापान संबंधों का मजबूत आर्थिक पक्ष भी है। आखिर जापान आज भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। दोनों ही देश भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहते हैं। उनके आपसी कटु संबंधों के बावजूद उनके साथ दोतरफा संबंधों में लाभप्रदता बनाए रखना हमारे राजनीतिज्ञों के कौशल पर निर्भर करेगा।

संतुलन में महारत

कहना पड़ेगा कि डॉ. मनमोहन सिंह की संप्रग सरकार हो या नरेंद्र मोदी की मौजूदा राजग सरकार, भारत अब तक विदेश संबंधों में संतुलन की नाजुक कला का दक्षता से प्रयोग करता आया है। उसने अपने राष्ट्रीय हितों और पारंपरिक नीतियों के अनुरूप कई बार विदेश नीति से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर अमेरिकी रुख के विपरीत या तटस्थ रुख अपनाया है और भारत-अमेरिका संबंधों पर इसका बहुत नकारात्मक असर अब तक नहीं पड़ा है। शायद संतुलन की इस नीति में भारतीय राजनयिकों को अब महारत हासिल हो चली है। ईरान का उदाहरण देखिए, जिसके परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका और उसके मित्र देशों को गंभीर ऐतराज रहा है। अमेरिका को संदेह है कि ईरान परमाणु बम बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उसे रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए थे। भारत पर भी ईरान से आर्थिक संबंधों को तोड़ लेने का भारी दबाव रहा लेकिन भारत इस दबाव में नहीं आया। वह उन चंद देशों में शामिल था जिन्होंने ईरान से तेल का आयात घटाया तो ज़रूर लेकिन प्रतीकात्मक स्तर पर। ईरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्तंभ है। प्रतिबंधों के दौर में ईरान के संदर्भ में हमने तटस्थ और स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया और सस्ती दरों पर तेल का आयात कर अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने में सफल रहे। इसी तरह की नीति कमोबेश इराक के मामले में भी रही। भारत इराक के खिलाफ कार्रवाई करने वाले मित्र देशों में शामिल नहीं था। लेकिन उसके रिश्ते न अमेरिका से बिगड़े और न इराक या ईरान से। सीरिया का उदाहरण भी इसी तर्ज पर है।

सऊदी अरब और ईरान के रिश्तों में तनाव जगजाहिर है। सऊदी अरब सुन्नी देश है और ईरान शिया। तेल की राजनीति के दो अलग-अलग, परस्पर विपरीत ध्रुव हैं। पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब की निकटता के कारण लंबे समय तक भारतीय सरकारों के मन में सऊदी अरब के प्रति आशंका का भाव रहा। लेकिन 2006 में सऊदी शाह अब्दुल्ला के भारत दौरे के बाद उस देश के साथ भारत के रिश्तों में गुणवत्तापूर्ण बदलाव आया है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी 2010 में सऊदी अरब गए। नतीजतन सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान का साथ देने के बारे में हमारी आशंकाएँ घटी हैं। खुद सऊदी अरब ने भी संकेत दिया है कि भारत-पाकिस्तान विवादों में वह तटस्थ रहेगा। दूसरी तरफ ईरान के साथ भी भारत के अच्छे संबंध रहे हैं। सन् 2008 में तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद भारत आए थे। ईरान और सऊदी अरब दोनों ही ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ हमारे संबंधों के परिपृक्ष्य में महत्वपूर्ण हैं। अब आईएसआईएस के उभार की रोशनी में इन दोनों देशों का टकराव बढ़ने की आशंका है और उसी के अनुरूप भारत के सामने मौजूद चुनौती भी गंभीर हो सकती है। इजराइल और फिलस्तीन भी हमारी संतुलनकारी विदेश नीति का अच्छा उदाहरण हैं। भारत के लिए दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। किसी एक को खोए बिना दोनों के साथ रिश्ते प्रगाढ़ बनाने के भारत सरकार के कौशल पर आगे भी दुनिया की नजरें टिकी रहेंगी।

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