रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 06 दिसंबर 2014
श्रेणीः  आतंकवाद
प्रकाशनः प्रभासाक्षी
टैगः  आतंकवाद

लब्बोलुआबः

आर्थिक विकास के मामले में भारत की तुलना चीन के साथ की जाती है, लेकिन इस तथ्य को प्रायः दरकिनार कर दिया जाता है कि चीनी अर्थव्यवस्था हमारी तरह आतंकवाद की समस्या झेलने के लिए मजबूर नहीं है।

Summary:

The Narendra Modi government faces a major irritant as it moves ahead with its growth oriented agenda while India continues to pay a big cost for Pakistan sponsored terrorism.
आतंकवाद के बिना कुछ और होती हमारी आर्थिक कहानी!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

शेयर बाजार के दिग्गज राकेश झुनझुनवाला ने पिछले दिनों एक दिलचस्प इंटरव्यू दिया। उनसे पूछा गया कि वे अगले पंद्रह साल में भारतीय शेयर बाजार को कहां देखते हैं? झुनझुनवाला का जवाब था कि जिस अंदाज में भारत में आर्थिक सकारात्मकता का माहौल है, नई आर्थिक पहलें की जा रही हैं, उसे देखते हुए पंद्रह साल में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी सूचकांक 1,30,000 पर पहुँच सकता है। फिलहाल यह सूचकांक 8500 के करीब है। झुनझुनवाला का बयान अधिकांश आर्थिक विशेषज्ञों और विश्लेषकों को आश्चर्यजनक प्रतीत हुआ लेकिन इसने सबका ध्यान ज़रूर खींचा है। बहरहाल, उनके इंटरव्यू में जो एक और महत्वपूर्ण सवाल था, वह यह था कि वे आर्थिक प्रगति के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट कौनसी देखते हैं? झुनझुनवाला ने जिन बाधाओं का जिक्र किया, उनमें से एक था- पाकिस्तान। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, पाकिस्तानी परमाणु बम आदि को झुनझुनवाला सुरक्षा के साथ-साथ 'बड़ी आर्थिक चुनौती' भी मानते हैं।

वास्तव में पिछले तीन दशकों के दौरान आतंकवाद ने भारत की अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुँचाया होगा, यह गंभीर आकलन और विश्लेषण का विषय है। आर्थिक विकास के मामले में भारत की तुलना चीन के साथ की जाती है, लेकिन इस तथ्य को प्रायः दरकिनार कर दिया जाता है कि चीनी अर्थव्यवस्था हमारी तरह आतंकवाद की समस्या झेलने के लिए मजबूर नहीं है। अगर वह भी अपने पश्चिम और पूर्व में हमारी ही तरह दशकों से आतंकवाद की त्रासदी झेल रहा होता तो शायद चीनी सफलता की कहानी उतनी चमकदार नहीं होती। और अगर हमारे साथ यह समस्या न होती तो शायद हमारी आर्थिक तरक्की की रफ्तार कहीं बेहतर होती। इजराइल का उदाहरण देखिए। वहाँ हुए एक महत्वपूर्ण अध्ययन से स्पष्ट हुआ था कि अगर इजराइल आतंकवादी हमलों से त्रस्त न होता तो उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर 10 से 15 फीसदी अधिक होती।

इजराइल के सामने मौजूद चुनौती प्रधान रूप से फिलस्तीन की तरफ से आती है। भारत के आकार और आतंकवाद के स्रोतों की संख्या के लिहाज से हमारा संकट इजराइल की तुलना में ज्यादा बड़ा है। न सिर्फ पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों, बल्कि उल्फा, बोडो और नगा मिजो उग्रवादियों की चुनौती भी निरंतर बनी हुई है। नक्सलियों और माओवादियों की समस्या लगातार गंभीर हो रही है। पंजाब के उग्रवाद को भी हमने लगभग एक दशक तक झेला है। इन सबकी एक आर्थिक कीमत भी है। दुर्योग से, भारत में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति को लेकर पिछली सरकार के प्रदर्शन से निरंतर असंतुष्ट रहने वाली भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में भी स्थिति नहीं बदली है। कश्मीर, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में हुई ताजा आतंकवादी घटनाएँ इस बात की निशानदेही करती हैं कि आतंकवाद की समस्या केंद्र में सत्ता परिवर्तन मात्र से हल होने वाली नहीं है।

अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव

अर्थव्यवस्था को आतंकवाद कई तरह से प्रभावित करता है। हमलों में होने वाला प्रत्यक्ष नुकसान तो अपनी जगह है ही, आतंकवाद के मौजूद रहते निवेशकों के अनुकूल माहौल बनाना आसान नहीं होता। दूसरी तरफ आतंकवाद निरोधक तंत्र की स्थापना, रखरखाव, हथियार तथा दूसरी रक्षात्मक सामग्री, मानव संसाधनों की व्यवस्था, प्रशिक्षण आदि पर व्यापक खर्च होता है। आतंकी खतरे की आशंका वाले व्यक्तियों, संस्थानों आदि की सुरक्षा के लिए अलग से दीर्घकालीन इंतजाम करने पड़ते हैं। पर्यटन पर आतंकवाद का सीधा और गहरा दुष्प्रभाव पड़ता है। इन सबके अतिरिक्त आतंकवाद के मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभावों की कीमत भी बहुत अधिक है। जब तक आप सुरक्षा के प्रति पूरी तरह आश्वस्त नहीं होंगे, कोई बड़ा निवेश करने की स्थिति में नहीं रहेंगे। कश्मीर इसका ज्वलंत उदाहरण है। विदेशी निवेशकों के लिए अपने निवेश की सुरक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। हर एक आतंकवादी हमले के बाद स्थानीय बाजार भी सीधे तौर पर प्रभावित होता है। शेयर बाजार की त्वरित प्रतिक्रिया के साथ-साथ सामान्य बाजारों की गतिविधियों में भी रुकावट और ठहराव की स्थिति पैदा होती है। कुछ समय के लिए ही सही आर्थिक तरक्की के मार्ग से सरकार और प्रशासन के स्तर पर विचलन पैदा होता है।

आतंकवाद की समस्या का जारी रहना नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भारी उलझन की स्थिति है, जो आर्थिक सुधारों और विकास का संकल्प लेकर सत्ता में आई है। वैश्वीकरण के दौर में वैश्विक अर्थव्यवस्था तो इस प्रक्रिया को प्रभावित करेगी ही, आतंकवाद के जारी रहते हुए आर्थिक विकास के लिए आदर्श परिस्थितियाँ कायम नहीं हो सकतीं। पाकिस्तान, जो खुद भी आतंकवाद के रास्ते पर चलकर आर्थिक दीवालिएपन का आदी हो चुका है, इस बात को बखूबी जानता है। पाकिस्तान से निर्यात किए जाने वाले आतंकवाद का प्रत्यक्ष उद्देश्य भले ही कश्मीर हो, उसका परोक्ष उद्देश्य भारत की आर्थिक प्रगति को लंबित बनाए रखना भी है। निरंतर सैन्य तनाव और आंतरिक सुरक्षा की समस्या में उलझा हमारा सत्ता तंत्र इत्मीनान से आर्थिक विकास पर ध्यान ही न दे पाए तो वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों के लिए आदर्श स्थिति होगी। पाकिस्तान भारत के साथ युद्ध के सैनिक, आर्थिक और राजनैतिक परिणाम भोगने की स्थिति में नहीं है। लेकिन आतंकवाद को प्रायोजित करने पर आने वाला खर्च युद्ध की तुलना में बहुत सीमित है, जबकि दोनों का ही उद्देश्य विनाश है।

सुरक्षात्मक रणनीति

आतंकवाद से निपटने में भारत की नीति प्रायः सुरक्षात्मक ही रही है। भले ही हम प्रो-एक्टिव रेस्पोंस (पूर्व-सतर्कता) की बात करें या फिर ज़ीरो टोलरेंस (शून्य बर्दास्तगी) की, भारत ने पाकिस्तान-जन्य आतंकवाद का कोई बहुत आक्रामक उत्तर नहीं दिया है। हाँ, हमने इसकी बातें ज़रूर की हैं। 'हॉट परस्यूट' ऐसा ही एक विकल्प रहा है, जिसका अर्थ है सीमा पर हमला करने वाले आतंकवादियों का पीछा करते-करते सीमापार उनके ठिकानों तक पहुँचना। सीमा पार आतंकवादी ठिकानों पर हवाई हमलों के विकल्प पर भी खूब चर्चा हुई है, लेकिन हमने उसका प्रयोग नहीं किया। अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड टावर पर आतंकवादी हमले के समय हमने बड़ी मात्रा में अमेरिका को पाकिस्तान के भीतर संचालित किए जा रहे आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों के सबूत मुहैया कराए और इन ठिकानों पर हमलों के लिए जोर डाला। लेकिन अमेरिका हमारे लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों मोल लेता, जब उसे अफगानिस्तान पर कार्रवाई के लिए पाकिस्तान के सहयोग की जरूरत थी!

संभवतः आक्रामक विकल्पों का प्रयोग भारत के लिए आसान नहीं था। बहुत से लोगों को लगता है कि हमारे स्थान पर इजराइल होता तो शायद बात अलग होती। किंतु भारत लोकतांत्रिक परंपराओं में विश्वास रखने वाला देश है, पाकिस्तान की तरह उपद्रवी नहीं। दूसरे, परमाणु हथियारों की मौजूदगी तथा उनका इस्तेमाल करने की पाकिस्तानी शासकों की धमकियां भी एक पहलू हैं। ऐसे में भारत अपने आपको आतंकवाद से मुक्त रखने के लिए करे तो क्या करे? नरेंद्र मोदी सरकार के लिए यह एक बड़ी पहेली सिद्ध होने वाली है, जो खुद को पिछली सरकारों की तुलना में अधिक आक्रामक के रूप में पेश कर रही है। फिलहाल तो ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने भारत में नई सरकार के सत्ता में आने के बाद अपने आतंकवादी तंत्र को कुछ ज्यादा ही सक्रिय कर दिया है। कश्मीर में एक के बाद एक हो रहे आतंकवादी हमलों और हाफिज सईद को लाहौर की ऐतिहासिक मीनार-ए-पाकिस्तान पर रैली करने की इजाजत देकर नवाज शरीफ सरकार ने दिखा दिया है कि भारत आतंकवाद की चुनौती से मुक्त होने की उम्मीद न रखे। कश्मीर में हालात जितने सामान्य होंगे और भारत की आर्थिक तरक्की की कहानी जितनी आगे बढ़ेगी, पाकिस्तान की बौखलाहट और हताशा में भी उतना ही इजाफा होगा।

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