Balendu Sharma Dadhich बालेन्दु शर्मा दाधीच
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 29 नवंबर 2014
श्रेणीः  विदेश
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  विदेश

लब्बोलुआबः

सार्क के ज्यादातर शिखर सम्मेलन सैद्धांतिक चर्चाओं, महत्वाकांक्षाओं के टकराव और औपचारिक प्रक्रियाओं तक सीमित रहे हैं। ऐसे बेजान संगठन में शामिल होने के लिए चीन आखिर इतना बेताब क्यों है? भारत के मन में शंकाएँ और आशंकाएँ उठनी जायज हैं।

Summary:

By sending its Vice President to attend the SAARC summit, China has shown its eagerness to become an official member of the organisation. If any one country's interests are to be affected by China's entry to SAARC, it is India who has had bitter relations with the country and its all-weather friend Pakistan.
बेवजह नहीं है सार्क में पांव जमाने की चीनी बेताबी

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

सार्क शिखर सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के हाथ मिलाने की खबर के शोर में जिस बात से ध्यान हट गया है, वह है इस संगठन में दबे पाँव जड़ें जमाने की चीनी कोशिशें। चीन के पारंपरिक मित्र पाकिस्तान की बात तो समझ में आती है लेकिन इस बार जिस तरह श्रीलंका और मालदीव के राष्ट्रपतियों ने भी सार्क में चीन के पर्यवेक्षक के दर्जे को सामान्य सदस्यता में बदलने का परोक्ष समर्थन किया, वह परदे के पीछे चलती चिंताजनक सरगर्मियों का संकेत है। इन तीन देशों के साथ-साथ नेपाल के कुछ राजनीतिज्ञों ने भी सम्मेलन के दौरान यह मुद्दा उठाया। हमारे पड़ोसी भारत के रुख से अच्छी तरह अवगत होते हुए भी अगर अब चीन की हिमायत करने में हिचक महसूस नहीं कर रहे तो यह दक्षिण एशिया में हमारे घटते प्रभाव और चीनी कूटनीति की आसन्न कामयाबी का संकेत तो है ही।

सार्क में चीन के आगमन की संभावना पर हमारा रुख सकारात्मक हो या नकारात्मक, इस पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है। लेकिन जो एक बात आश्चर्यचकित करती है वह है इस संगठन के भीतर चीन और कुछ दूसरे देशों की बढ़ती दिलचस्पी। सार्क ने अपने अस्तित्व के पिछले तीस सालों में कोई बड़ी राजनैतिक या आर्थिक उपलब्धि हासिल नहीं की है। इसके ज्यादातर शिखर सम्मेलन सैद्धांतिक चर्चाओं, महत्वाकांक्षाओं के टकराव और औपचारिक प्रक्रियाओं तक सीमित रहे हैं। ऐसे बेजान संगठन में शामिल होने के लिए चीन आखिर इतना बेताब क्यों है? महज पर्यवेक्षक की भूमिका के बावजूद काठमाडौ शिखर सम्मेलन में चीन द्वारा अपने उपराष्ट्रपति को भेजना इस संगठन में उसकी गहरी दिलचस्पी का प्रतीक है। अगर चीन को सार्क का सदस्य बनाया गया तो वह दक्षिण एशिया में उसके बढ़ते प्रभाव को औपचारिक रूप से स्थापित करने के समान होगा।

यूँ चीन सार्क के मौजूदा नौ पर्यवेक्षकों में से एक मात्र है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, दक्षिण कोरिया, ईरान, मॉरीशस और म्यांमार अन्य पर्यवेक्षक हैं लेकिन उनको लेकर न तो बहुत चर्चा है और न ही आशंकाएँ। रूस, तुर्की और दक्षिण अफ्रीका ने भी पर्यवेक्षक बनने की इच्छा जताई है। जो तीन पर्यवेक्षक अपना दर्जा बढ़वाने के लिए खास तौर पर दिलचस्पी दिखा रहे हैं, वे हैं- चीन, दक्षिण कोरिया और म्यामांर। पहली नजर में इनमें से सिर्फ म्यांमार ऐसा देश प्रतीत होता है जो अफगानिस्तान की ही तरह दक्षिण एशिया के समीपवर्ती क्षेत्रों में है, सांस्कृतिक-सामाजिक दृष्टि से दक्षिण एशिया के अधिक करीब है और उस लिहाज से सार्क की सदस्यता का अधिक हकदार है। आपको याद होगा कि मूल रूप से सार्क के सात देश हुआ करते थे और अफगानिस्तान को 2006 में इसकी सदस्यता दी गई थी।

सदस्यता का दावा कितना जायज

चीन और दक्षिण कोरिया को सार्क की पूर्ण सदस्यता दे पाना व्यावहारिक दृष्टि से असंभव है। वजह यह है कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन, ब्रिक्स या जी-20 जैसे संगठनों के विपरीत सार्क के गठन का बुनियादी आधार भौगोलिक है। वह दक्षिण एशिया क्षेत्र के देशों का संगठन है। चीन इस पैमाने पर खरा नहीं उतरता और न ही अमेरिका, जापान और यूरोपीय संघ जैसे पक्ष। अगर भौगोलिक आधार पर गठित किसी क्षेत्रीय संगठन का विस्तार किया जाए तो उसकी भी एक सीमा होनी चाहिए। आखिर दक्षिण एशिया के भौगोलिक दायरे को आप कितना बढ़ा सकते हैं? ज्यादा से ज्यादा अफगानिस्तान और म्यांमार तक? अगर दायरा और बढ़ाने की ठान ही लें तो शायद ईरान तक पहुँच जाएं, मगर उसके आगे? आखिर कैसे दक्षिण एशिया के भौगोलिक दायरे में प्रशांत महासागर के देशों या फिर यूरोपीय राष्ट्रों को शामिल किया जा सकता है? और यही बात चीन पर लागू होती है। अफगानिस्तान को सार्क में लेते समय भी इस मुद्दे पर खासा विवाद उठा था क्योंकि अफगानिस्तान दक्षिण एशियाई नहीं बल्कि मध्य एशियाई देश है। अगर इसमें चीन को शामिल किया जाना है तो उसके लिए पहले सदस्यता के बुनियादी पैमाने में फेरबदल करना होगा।

भारत इसके लिए शायद ही तैयार हो, और उसकी जायज वजहें हैं। सार्क में चीन की मौजूदगी से अगर किसी देश को राजनैतिक या राजनयिक दृष्टि से सर्वाधिक नुकसान होने वाला है तो वह भारत ही है। पाकिस्तान शायद सबसे ज्यादा लाभ में रहे, जिसे चीन के साथ मिलकर इस संगठन में भारत को अलग-थलग करने का मौका मिल जाएगा। जब बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर्रहमान की पहल के बाद 1981 में कोलंबो में सात देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में सार्क के गठन का सिलसिला आगे बढ़ाने का फैसला हुआ था तब से पाकिस्तान इसमें भागीदारी को लेकर आशंकित रहा है। उसके मन में हमेशा संदेह रहा कि राजनैतिक, आर्थिक और भौगोलिक दृष्टि से बड़ा देश होने के कारण भारत इस संगठन का इस्तेमाल अपने हितों को साधने में कर लेगा और पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं होगा। अपनी स्थापना के तीन दशकों का सार्क का सफर भारत और पाकिस्तान के आपसी मतभेदों और अविश्वास में ही अटका रहा है। इस बार भी पाकिस्तान ने भारत की तरफ से रखे गए कुछ ऐसे प्रस्तावों को रुकवा दिया जो इस संगठन को वास्तव में परिणामोन्मुखी और उद्देश्यपूर्ण बना सकते थे। ये प्रस्ताव सार्क देशों के बीच सड़क और रेल संपर्क को आसान बनाने पर केंद्रित थे, ताकि उनके बीच व्यापार और आवागमन सुगम हो सके। बड़ी मुश्किल से पाकिस्तान सार्क की बिजली ग्रिड की स्थापना पर सहमत हुआ है।

अगर चीन सार्क की सदस्यता हासिल करने में सफल रहता है तो टकराव की आशंका सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच ही नहीं रहेगी। लंबे समय से सीमा विवाद में उलझे हुए भारत और चीन, जो कि आर्थिक दृष्टि से भी एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं, का आपसी तनाव इस संगठन की बची-खुची गति पर भी विराम लगा देगा। ध्यान देने की बात है कि सार्क में कोई भी फैसला तभी प्रभावी होता है जब उसे सभी सदस्य देशों का समर्थन हासिल हो। कोई भी एक देश किसी भी प्रस्ताव या पहल को रोक सकता है और इस संगठन की अब तक की धीमी गति के लिए यह प्रावधान भी काफी हद तक दोषी है।

क्यों बदल रहा है पड़ोसियों का रुख?

भारत के आसपास के देश आखिर चीन की तरफ क्यों झुक रहे हैं जो सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और भौगोलिक दृष्टि से उनके साथ उस तरह की स्वाभाविक निकटता नहीं रखता, जो कि भारत रखता है? इसका एक पहलू आर्थिक है। चीन कई वर्षों से भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में जुटा है जिसे 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल' नामक रणनीति का नाम दिया गया है। इसके जवाब ने भारत ने भी 'लुक ईस्ट' नीति पर अमल करते हुए पूर्वी एशियाई देशों के साथ संबंध मजबूत किए हैं। बहरहाल, दक्षिण एशिया में पांव जमाने और भारत का प्रभाव घटाने के लिए चीन बड़ी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। वह इस क्षेत्र में 40 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करने का इच्छुक है और आपसी कारोबार को 150 अरब डॉलर तक ले जाना चाहता है। पाकिस्तान और नेपाल में ढाँचागत विकास के लिए चीन ने जमकर पैसा खर्च किया है। श्रीलंका और मालदीव के साथ भी उसके राजनैतिक-आर्थिक संबंध निरंतर प्रगाढ़ हो रहे हैं। आपको याद होगा कि मालदीव में भारत की कंपनी जीएमआर को मिला जो ठेका रद्द किया गया वह एक चीनी कंपनी के हाथ में गया था। बात राजनैतिक और आर्थिक स्तर तक ही सीमित नहीं है। चीन इस क्षेत्र में अपना सैनिक फुटप्रिंट भी बढ़ा रहा है। पाकिस्तान के साथ तो उसके गहरे सैन्य संबंध हैं ही, पिछले दिनों श्रीलंका के समुद्र में चीनी सैन्य पनडुब्बी को रोकने की इजाजत दिए जाने ने भी भारत की आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। जाहिर है, चीन सार्क का इस्तेमाल अपने सामरिक और राजनैतिक हितों को आगे बढ़ाने में करेगा। दक्षिण एशियाई देशों को इससे कोई नुकसान नहीं है, बल्कि लाभ ही है। न सिर्फ निवेश और आर्थिक सहायता के रूप में बल्कि आपसी कारोबार बढ़ने से भी।

इसे स्वीकार करने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि चीन के प्रति बढ़ती नजदीकी की एक वजह अपने पड़ोसियों के प्रति भारत का चौधराहट भरा रवैया भी है। अधिकांश पड़ोसी देशों को लगता है कि भारत अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए उनके अंदरूनी मामलों में इच्छानुसार दखल करने से नहीं झिझकता। कांग्रेसी सरकारों का रवैया तो जगजाहिर है ही, इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नेपाल के अस्पताल के उद्घाटन के मौके पर दिए गए भाषण की कुछ टिप्पणियों पर भी नेपाल के राजनीतिज्ञों और अखबारों ने नाखुशी जाहिर की है। श्री मोदी ने वहाँ के नेताओं को जल्द संविधान बनाने और उसमें सभी पक्षों के हितों का ध्यान रखने की सलाह दी थी। सार्क में भारत के दबदबे से क्षुब्ध सदस्य देश चीन को संभावित संतुलनकारी शक्ति के रूप में देख रहे हों तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

बहरहाल, सार्क में चीन का आगमन अगर होगा तो वह भारत की मर्जी से ही संभव है। अगर भारत नहीं चाहेगा तो शायद ही चीन के लिए रास्ता बन सके। हाँ, ऐसी हालत में चीन के साथ सहानुभूति रखने वाले देश एकजुट अवश्य हो सकते हैं और भारत को अलग-थलग करने की कोशिश कर सकते हैं। इस बार भी सार्क शिखर सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्ताव में भारत की अनिच्छा के बावजूद पर्यवेक्षकों के साथ सहयोग बढ़ाने की बात शामिल की गई है। भारत चीन का स्पष्ट विरोध करते हुए भी नहीं दिख सकता, जिसके साथ कई अन्य मंचों पर वह सहयोग कर रहा है। ऐसे में सार्क में चीनी प्रवेश के मुद्दे पर उसे अपनी नीति बहुत सोच-समझकर तैयार करनी होगी। इस मामले में विकल्पों की कमी नहीं है। मसलन यह कि चीन के साथ-साथ जापान और अमेरिका को भी प्रवेश देने की बात की जाए ताकि उसके अलग-थलग पड़ने की संभावना क्षीण हो जाए।

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