रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 22 नवंबर 2014
श्रेणीः  विदेश नीति
प्रकाशनः प्रभासाक्षी
टैगः  विदेश नीति

लब्बोलुआबः

बराक ओबामा की प्रस्तावित भारत यात्रा को जहाँ हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी उपलब्धि मान रहे हैं वहीं अमेरिका में इसे ओबामा की विदेश नीति की कामयाबी के रूप में पेश किया जा रहा है, जहाँ कांग्रेस में डेमोक्रेटों की स्थिति कमजोर हुई है।

Summary:

US President Barack Obama's scheduled India visit to grace the Republic Day Parade as Chief Guest has the potential to take Indo-US relations to a new level. While it is a foreign policy coup for Narendra Modi, Obama too is set to gain from the visit politically.
ओबामा की भारत यात्रा से किसका ज़्यादा लाभ- उनका या हमारा?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश नीति के मामले में खुद को 'बाहरी' व्यक्ति कहते हैं। लेकिन केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार गठित होने के बाद उन्होंने जिस अंदाज में विदेश यात्राओं का अनवरत सिलसिला अंजाम दिया है, उसे देखकर तो नहीं लगता कि विदेश नीति उनके लिए अपरिचित या पराई चीज़ है। और अगर कहीं संदेह की गुंजाइश बची भी हो तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को अगले गणतंत्र दिवस पर होने वाली परेड के मुख्य अतिथि के रूप में सफलतापूर्वक आमंत्रित उन्होंने उस पर स्थायी विराम लगा दिया है। ओबामा को भारत यात्रा पर सहमत करने को श्री मोदी की विदेश नीति की अब तक की सबसे बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। याद रहे, ओबामा ऐसे समय पर भारत में होंगे, जब अमेरिका में राष्ट्रपति के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्टेट ऑफ द यूनियन भाषण की तैयारी चल रही होती है। श्री ओबामा की प्रस्तावित यात्रा में दोनों देशों का लाभ है। जहाँ इसे श्री मोदी की निजी उपलब्धि माना जा रहा है वहीं अमेरिका में इसे राष्ट्रपति ओबामा की विदेश नीति की कामयाबी के रूप में पेश किया जा रहा है।

इन्हीं नरेंद्र मोदी और अमेरिका के रिश्ते लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले तक कितने तनावपूर्ण थे! श्री मोदी को अमेरिकी वीजा दिए जाने का मुद्दा न सिर्फ श्री मोदी व भाजपा बल्कि पूरे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और यहाँ तक कि भारतीय राजनीति के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील था। याद कीजिए, अमेरिका के पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय में व्हार्टन इंडिया इकॉनॉमिक फोरम में बोलने के लिए मार्च 2013 में श्री मोदी को दिया गया आमंत्रण वापस लेने पर देश भर में कैसी प्रतिक्रिया हुई थी! उद्योगपति गौतम अडानी ने इस इवेन्ट का प्रायोजन रद्द कर दिया था और तत्कालीन शिवसेना सांसद सुरेश प्रभु ने विरोधस्वरूप स्वयं भी फोरम में भाषण देने से इंकार कर दिया था। अमेरिकी प्रशासन ने जोर देकर कहा था कि श्री मोदी के वीजा के मामले में उसके रुख में कोई बदलाव नहीं आया है और तब नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उन्होंने अमेरिका जाने की इच्छा कब जताई है? श्री मोदी ने तब कटाक्ष भरे लहजे में कहा था कि मैं भारत को ऐसा बना दूंगा कि अमेरिकी सांसद भारत का वीजा लेने के लिए कतार में खड़े होंगे।

बहरहाल, वह सब अब पुरानी बात हो गई है। भारत में लोकसभा चुनावों के कुछ पहले ही अमेरिका ने आसन्न बदलावों को भांप लिया था और श्री मोदी के साथ संपर्क की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। तब अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से आधिकारिक रूप से कहा गया था कि यदि श्री मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं तो बतौर शासनाध्यक्ष वे स्वाभाविक रूप से अमेरिकी वीजा के हकदार होंगे। श्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी दोनों पक्षों के बीच कुछ दिनों तक तनाव का माहौल दिखाई दिया, लेकिन फिर अमेरिका ने यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि उसे श्री मोदी के साथ काम करने में कोई हिचक नहीं है। राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा श्री मोदी के सम्मान में व्हाइट हाउस में दिए गए भोज के दौरान दोनों नेताओं के बीच जो गर्मजोशी दिखाई दी, उसने संबंधों में बदलाव की प्रक्रिया को स्पष्ट कर दिया था। उसके बाद अमेरिका में प्रधानमंत्री के अभिनंदन में हुए समारोहों और उनमें अमेरिकी हस्तियों की मौजूदगी ने संबंधों को और मधुर बनाने में योगदान दिया। पिछले दिनों श्री ओबामा और श्री मोदी म्यांमार और ऑस्ट्रेलिया में मिले ही थे। और अब श्री ओबामा का प्रस्तावित भारत दौरा। आज दोनों के बीच जो मैत्रीभाव दिखाई देता है, उसे देखकर लगता नहीं कि यही मोदी हैं जिन्हें वीजा दिए जाने के मुद्दे पर अमेरिका का रुख इतने वर्षों से इतना अडिग था!

महज सांकेतिक नहीं

गणतंत्र दिवस समारोह में बराक ओबामा की मौजूदगी महज सांकेतिक नहीं है। माना कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के राष्ट्राध्यक्ष का विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होना प्रतीकात्मक दृष्टि से बहुत बड़ी घटना है। शायद ऐसा बहुत पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन विदेश नीति के लिहाज से यह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। भारत-अमेरिका संबंधों में पिछली सरकार के अंतिम दिनों में जिस किस्म का ठंडापन और रूखापन आ गया था, यह दौरा उसकी औपचारिक विदायी को अभिव्यक्त करता है। श्री मोदी और अमेरिका के अपने समीकरणों में व्याप्त जटिलता और तनाव के समापन का भी यह संकेत है। देवयानी खोबरागड़े के विवाद का असर भारत-अमेरिका संबंधों पर नहीं पड़ना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से एक छोटी घटना ने बहुत बड़े परिदृश्य को प्रभावित कर दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बराक ओबामा के घनिष्ठ और निजी संबंध रहे हैं। बहरहाल, देवयानी कांड और फिर भारतीय दूतावासों की जासूसी के रहस्योद्घाटन जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं ने मित्रता के पहिए को पीछे की तरफ घुमाना शुरू कर दिया। पिछली सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद संबंधों का तनाव दूर नहीं हो पाया।

ऐसे में भारत में नई सरकार की स्थापना ने वह अवसर दिया जिसकी दोनों ही देशों को बेताबी से तलाश थी। दोनों अपने लिए एक-दूसरे की अहमियत और संबंधों की अपरिहार्यता से परिचित थे ही। ओबामा और श्री मोदी दोनों ने इसका बखूबी इस्तेमाल किया। विदेश नीति के संदर्भ में यही अवसर दूसरे देशों के बरक्स भी मिला, जिसका श्री मोदी ने कुशलता से उपयोग किया। श्रीलंका और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों का रूखापन दूर करने में सफल रहे। पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों की जटिलता फिलहाल कायम है, हालाँकि श्री मोदी की कोशिश उनके साथ भी बेहतर संबंध बनाने की थी। जापान, म्यांमार, बांग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों के साथ चल रहे मैत्रीपू्र्ण संबंधों को पुनः रेखांकित करने में भी वे सफल रहे हैं।

व्यस्त छह महीने

पिछले छह महीनों में नरेंद्र मोदी जिस अंदाज में विश्व नेताओं से मिले हैं वह उल्लेखनीय है। बराक ओबामा, व्लादीमीर पुतिन (रूस), शिंजो आबे (जापान), झी जिनपिंग (चीन), डेविड कैमरन (ब्रिटेन), फ्रांस्वां ओलांद (रूस), टोनी एबट (ऑस्ट्रेलिया), एंजिला मार्केल (जर्मनी), डिल्मा रोजेफ (ब्राजील), जैकब जुमा (दक्षिण अफ्रीका) आदि आदि... इस सूची में आसियान और सार्क देशों के नेताओं को भी जोड़ लीजिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँचों सदस्य देशों के नेताओं से भेंट के साथ-साथ वे दूसरे अहम अंतराष्ट्रीय संगठनों में प्रभाव रखने वाले प्रमुख नेताओं से भी तालमेल बनाने में कामयाब रहे हैं। ओबामा की भारत यात्रा से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन भी भारत का दौरा करके जा चुके होंगे। सत्ता में आने के पहले छह महीने में शायद ही किसी अन्य भारतीय प्रधानमंत्री की विदेश के मोर्चे पर इतनी बड़ी सक्रियता रही हो। भले ही विपक्ष कहता रहे कि वे एक एनआरआई प्रधानमंत्री हो गए हैं या फिर यह कि वे सिर्फ चुनावी रैलियों को संबोधित करने ही भारत आते हैं, मगर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर श्री मोदी की सक्रियता देश के हित में है। लंबे समय तक कांग्रेस के सत्ता में रहने के बाद आए विचारधारात्मक परिवर्तन की रोशनी में भी विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों के साथ सामंजस्य बिठाने और आपसी संबंधों को नए सिरे से रेखांकित करने की ज़रूरत है।

बराक ओबामा के भारत दौरे से दोतरफा संबंधों को एक बार फिर उसी बिंदु से शुरू किया जा सकेगा, जहाँ पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और फिर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उसे ले आए थे किंतु कुछ कारणों से रिश्तों की कड़ियाँ कमजोर पड़ने लगी थीं। आपको याद होगा कि राष्ट्रपति ओबामा ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत में पहला आधिकारिक रात्रिभोज मनमोहन सिंह के सम्मान में ही दिया था। संयोगवश, भारतीय विदेश नीति में पिछले एक दशक के दौरान अमेरिकी की तरफ आया झुकाव विदेश नीति पर भारतीय जनता पार्टी के पारंपरिक रुख के अनुकूल है जो रूस और चीन की तुलना में अमेरिका और जापान के साथ बेहतर समझबूझ महसूस करती आई है। हाँ, भारत-अमेरिका परमाणु सौदे के समय ज़रूर भाजपा का रुख अमेरिका के लिए एक झटका था लेकिन नई सरकार ने यह स्पष्ट करने में देरी नहीं की है कि वह इस करार का सम्मान करती है। हमारी विदेश नीति में थोड़ा बहुत समायोजन तो अवश्यंभावी है लेकिन मोटे तौर पर वह उसी दिशा में रहने वाली है, जिस दिशा में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार छोड़कर गई है। श्री मोदी की परीक्षा तब होगी, जब उन्हें पारस्परिक विपरीत हितों वाले देशों या गुटों में से किसी एक को प्राथमिकता देनी होगी। जैसे- अमेरिका और रूस के बीच या जापान और चीन के बीच। वे एक पक्ष के साथ अपने संबंधों को मैत्रीपूर्ण बनाए रखते हुए दूसरे पक्ष के साथ रिश्ते प्रगाढ़ बनाने का राजनयिक कौशल कैसे दिखाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।

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