रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 03 नवंबर 2014
प्रकाशनः Dainik Jagran
टैगः  कांग्रेस

लब्बोलुआबः

राहुल गांधी की छवि कुछ ऐसी बन गई है जैसे वे पार्ट टाइम राजनीतिज्ञ हैं। अगर कांग्रेस के भविष्य का दारोमदार उन पर है तो वे इस जिम्मेदारी को हल्के में लेने की गलती नहीं कर सकते। राजनीति एक पूर्णकालिक पेशा है और संघर्ष इसका स्वाभाविक चरित्र।

Summary:

While this is no secret that Congress party has pinned its hopes on Rahul Gandhi, the scion of Nehru-Gandhi family has carved an image of being a reluctant politician for himself. When is he finally going to take the plunge is the million dollar question.
अपार कांग्रेसी उम्मीदें और 'अनिच्छुक' राहुल गांधी

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह की ओर से पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया ताजा सुझाव दो बातें स्पष्ट करता है। पहली, पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की भारी पराजय के बावजूद नेतृत्व के मुद्दे पर गांधी परिवार के एकाधिकार पर कोई संशय पार्टी नेताओं के मन में नहीं है। दूसरे, विपक्ष और मीडिया की ही तर्ज पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को भी इस बात का अहसास है कि श्री गांधी आज भी बड़ी जिम्मेदारी लेने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं और इसके लिए दबाव बनाए जाने की जरूरत है। कुछ समय पहले पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ पार्टी नेता पी चिदंबरम की इस टिप्पणी ने राजनैतिक हल्कों में कई तरह की अटकलबाजियों को जन्म दिया था कि गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति भी पार्टी अध्यक्ष बन सकता है।

इस बार दिग्विजय सिंह के बयान के पीछे यह गणित शायद ही कोई निकाले कि श्री सिंह संभवतः राहुल गांधी के मन की बात को ही अभिव्यक्त कर रहे हैं। संप्रग सरकार के दिनों में यह आम धारणा थी कि पार्टी नेतृत्व जो बात खुद आधिकारिक रूप से नहीं कहना चाहता, उसे किसी वरिष्ठ नेता के माध्यम से कह दिया जाता है और बाहरी दुनिया में अनुकूल प्रतिक्रिया न होने पर पार्टी बड़े आराम से यह कहकर उस बयान से पल्ला झाड़ लेती है कि वह फलाँ नेता की निजी राय है। दिग्विजय सिंह के बारे में धारणा रही है कि वे प्रायः राहुल गांधी के मन की बातों को अनौपचारिक रूप से मीडिया में कहते रहे हैं। ठीक वैसे ही, जैसे पानी में कूदने से पहले कदम रखकर उसका तापमान भांपने का प्रयास किया जाता है।

दिग्विजय सिंह की राय गलत नहीं है। राहुल गांधी की छवि कुछ इस तरह की बन गई है जैसे वे पार्ट टाइम राजनीतिज्ञ हैं। अगर कांग्रेस के भविष्य का दारोमदार उन पर है तो वे इस जिम्मेदारी को हल्के में लेने की गलती नहीं कर सकते। राजनीति एक पूर्णकालिक पेशा है, बल्कि सामान्य पूर्णकालिक पेशों से भी अधिक जिम्मेदारी और मांग वाला, जहाँ आपको लगभग हमेशा उपलब्ध रहने की जरूरत है। यहाँ आपकी सक्रियता और चुनौतियों को झेलने का माद्दा बेहद ज़रूरी है। सक्रियता भी सिर्फ होनी नहीं चाहिए बल्कि दिखनी भी चाहिए, विशेषकर तब जब किसी दल का राजनैतिक भविष्य ही आप पर निर्भर हो। नेतृत्व के कार्यकलापों और शैली का संदेश निचले स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं तक जाता है। नेतृत्व निष्क्रिय है तो कार्यकर्ताओं से सक्रियता और कोई बड़ा राजनैतिक कारनामा कर डालने की उम्मीद नहीं की जा सकती। राहुल गांधी इस संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी से सीख ले सकते हैं। जब तक पार्टी नेतृत्व में उदासीनता और निष्क्रियता का भाव था, पार्टी को बड़ी राजनैतिक शक्ति के रूप में नहीं देखा जा रहा था। लेकिन राष्ट्रीय परिदृश्य में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद स्थितियाँ बदल गईं। कहाँ तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को ही बहुमत मिलने पर संशय था और कहाँ भाजपा ने अकेले ही बहुमत जुटा लिया। सक्रिय और ऊर्जावान नेता किसी भी राजनैतिक दल का कायाकल्प कर सकते हैं।

सीखने को बहुत कुछ

नरेंद्र मोदी ही क्यों खुद सोनिया गांधी से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं राहुल गांधी, और अपने स्वर्गीय पिता राजीव गांधी से भी। आपको याद होगा कि स्व. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सत्ता संभालते समय राजीव गांधी भी एक अपरिपक्व राजनीतिज्ञ माने गए थे। प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने नई ऊर्जा और उत्साह का परिचय अवश्य दिया लेकिन सत्ता के संचालन के लिए जिस किस्म के गणित और चातुरी की महारत चाहिए, वह उनमें नहीं थी। इसकी बड़ी वजह थी उस किस्म के राजनैतिक अनुभव का अभाव जो निचले स्तर पर संघर्ष करते हुए ऊपर आने पर प्राप्त होता है। दूसरे, आम आदमी के साथ प्रत्यक्ष जुड़ाव की कमी। ऐसा जुड़ाव आपको उन मुद्दों की पहचान करने की दृष्टि देता है जो जमीनी स्तर पर लोगों के जीवन से जुड़े हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में राजनैतिक सिद्धांतों और अर्थशास्त्रीय मीमांसाओं का बखान करके जनता का विश्वास जीतने या अपार लोकप्रियता अर्जित करने की उम्मीद लगाना व्यर्थ है। आम आदमी किस तरह सोचता है, किस तरह रहता है, किन समस्याओं से रोजाना दो-चार होता है, उसके सपने क्या हैं, निराशाएँ किस तरह की हैं, उसके जीवन संघर्ष के क्या मायने हैं, उसकी राजनैतिक-सामाजिक समझ कितनी सीमित है, किस तरह के मुद्दे उसे प्रसन्न और निराश करते हैं, कैसी बातें उसके मन में उम्मीद भर देती हैं.. यह सब और दूसरी बहुत सी बातें जाने बिना आप इस देश के सामान्य मतदाता के साथ राजनैतिक दृष्टि से लाभप्रद और सार्थक संवाद नहीं कर सकते। बाद में राजीव गांधी ने विपक्ष में रहते हुए, देश का व्यापक भ्रमण कर राजनैतिक परिपक्वता हासिल कर ली थी। उनके निधन के कुछ महीने पहले ही पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने, जो उनके बड़े आलोचक रहे, भी माना था कि अब वे एक अलग किस्म के नेता बन चुके हैं। दुर्भाग्य से, श्री गांधी का असामयिक निधन हो गया और एक बदले हुए राजीव गांधी के नेतृत्व का अनुभव करने से हम वंचित रहे।

राहुल गांधी भी पहले दौर के राजीव गांधी जैसे दिखते हैं। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद वे खुद को चतुर, परिपक्व और तेज-तर्रार राजनीतिज्ञ के रूप में सिद्ध नहीं कर पाए हैं। नरेंद्र मोदी जैसे प्रवीण राजनीतिज्ञ से लोहा लेने के लिए तदर्थ आधार पर राजनीति नहीं की जा सकती। आपको अपने प्रतिद्वंद्वी जैसी ही ऊर्जा, वैसा ही आत्मविश्वास और काबिलियत दिखाने की जरूरत है। लेकिन राहुल फिलहाल निस्तेज प्रतीत होते हैं। राजनीति में अपने प्रतिद्वंद्वियों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। राहुल गांधी भी नरेंद्र मोदी की राजनैतिक चातुरी, प्रवीणता और सहजता से बहुत कुछ सीख सकते हैं। आखिर क्या वजह है कि नरेंद्र मोदी अपनी बात को बड़ी सहजता से आम आदमी तक पहुँचा देते हैं जबकि राहुल गांधी वही काम नहीं कर पाते? वजह है श्री मोदी का जमीन से जुड़ाव, उनका जीवन संघर्ष। आम नागरिक उनमें अपनी ही छवि देखता है। दूसरी ओर राहुल गांधी की छवि किसी विशेषाधिकार सम्पन्न राजनेता की है और इस कल्पना मात्र में ही आम आदमी के साथ उनकी दूरी स्पष्ट हो जाती है। माना कि राहुल गांधी ने समय-समय पर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि में आम लोगों के साथ निकट संपर्क बनाने का प्रयास किया है। लेकिन मंजिल अभी दूर है। बुंदेलखंड, विदर्भ, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि में, जहाँ आम लोगों के साथ उनका संपर्क चर्चा का विषय बना, कोई विशेष राजनैतिक उपलब्धि हासिल नहीं हो सकी। एक अहम कारण संभवतः निरंतरता का अभाव था।

अनिच्छुक राजनीतिज्ञ?

संप्रग सरकार पूरे दस साल तक सत्ता में रही, लेकिन राहुल गांधी सरकार में कोई जिम्मेदारी लेने से बचते रहे। यहाँ तक कि उनकी युवा ब्रिगेड के अनेक नेताओं (ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, जितेंद्र सिंह, जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह आदि) ने मंत्री पद संभाला और उनमें से कुछ का प्रदर्शन सराहा भी गया, लेकिन स्वयं श्री गांधी कोई सरकारी दायित्व लेने से बचते रहे। कांग्रेस के भीतर समय-समय पर उठने वाली मांग के बावजूद। पार्टी में भी, उन्होंने स्वयं को उपाध्यक्ष के पद तक सीमित रखा, जबकि चर्चा उन्हें पार्टी अध्यक्ष या कम से कम कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की थी। पता नहीं श्री गांधी की हिचक का कारण क्या है, लेकिन उनकी छवि एक अनिच्छुक राजनीतिज्ञ की बन रही है। जो परदे के पीछे से नियंत्रण करना पसंद करता है लेकिन सामने आकर सार्वजनिक कसौटी पर कसे जाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। जिस तरह उन्होंने पार्टी के भीतर महासचिव और उपाध्यक्ष पद संभालकर उपयोगी राजनैतिक अनुभव लिया है, उसी तरह का अनुभव वे केंद्र में मंत्री बनकर भी ले सकते थे। और राजनीति में अनुभव की बड़ी कीमत है। वहाँ अवसर छोड़ना भी नासमझी और अदूरदर्शिता माना जाता है। कौन जाने अब उन्हें यह अनुभव कितने साल बाद मिल सकेगा?

श्री गांधी ने अपने जिस फैसले से ज्यादा निराश किया, वह था लोकसभा में पार्टी के नेता का पद संभालने में उनकी अनिच्छा। सोनिया गांधी की स्वास्थ्य संबंधी सीमाओं के चलते यह पद मल्लिकार्जुन खड़गे को मिल गया। श्री खड़गे एक अनुभवी और काबिल नेता हैं, इस बात में संदेह नहीं है। किंतु जरा सोचिए कि यदि राहुल गांधी विपक्ष के नेता बने होते तो क्या यह उनके लिए उसी किस्म के राजनैतिक संघर्ष और दायित्व की शुरूआत नहीं होती, जिसकी जरूरत राजनैतिक परिपक्वता हासिल करने के लिए की जाती है? तब वे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस में विपक्ष का प्रतिनिधित्व करते, पार्टी सांसदों को दिशा देते, संवेदनशील मसलों पर पार्टी का दृष्टिकोण तय करते, सरकार की खामियों का छिद्रान्वेषण करते, विभिन्न दलों के नेताओं के साथ समन्वय करते, लोकसभा के संचालन से जुड़ी अहम बैठकों में हिस्सा लेते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बरक्स विपक्ष की ओर खड़ा कोई व्यक्ति अगर दिखाई देता तो वह राहुल गांधी होते। लेकिन श्री गांधी ने इस जिम्मेदारी से कन्नी काट ली। सवाल उठता है कि आखिर कब? यदि राहुल गांधी अपने लिए बड़ा राजनैतिक भविष्य देखते हैं तो उन्हें कोई अहम राजनैतिक जिम्मेदारी उठाने का जोखिम लेना ही होगा। इसकी शुरूआत कांग्रेस अध्यक्ष के पद से ही हो जाए तो क्या बुरा है?

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