रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 03 नवंबर 2014

लब्बोलुआबः

अगर कोई दूसरी सरकार होती तो स्वाभाविक रूप से सीमा पर पाकिस्तानी गोलीबारी पर उसका रुख अलग रहा होता। मनमोहन सिंह की सरकार तनाव को बढ़ने से रोकने का अधिक प्रयास करती। नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिक्रिया उससे अलग रही- प्रधानमंत्री श्री मोदी की छवि के अनुरूप ही। इनमें से कौनसा तरीका सही है और कौनसा गलत? कहना मुश्किल है।

Summary:

Once again, there was tension on the border with Pakistan. Once again there was unprovoked firing from the Pakistan side and damage on the Indian side. What happened was like events coming out from a familier script, however the Indian response to Pakistani provokations was different this time. Did it make any difference on the ground situation?
क्या पाकिस्तान से निपटने का यही सही तरीका है?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अगर कोई दूसरी सरकार होती तो स्वाभाविक रूप से सीमा पर पाकिस्तानी गोलीबारी पर उसका रुख अलग रहा होता। मनमोहन सिंह की सरकार तनाव को बढ़ने से रोकने का अधिक प्रयास करती। नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिक्रिया उससे अलग रही- प्रधानमंत्री श्री मोदी की छवि के अनुरूप ही। इनमें से कौनसा तरीका सही है और कौनसा गलत? कहना मुश्किल है। शायद संप्रग सरकार का सुलह-सफाई वाला रुख भी सीमा पर तनी बंदूकों को शांत कर देता। वह पहले भी ऐसा करता रहा है। लेकिन इस बार लगता है कि बंदूकें सिर्फ शांत नहीं हुई हैं बल्कि पाकिस्तान को बार-बार संघर्षविराम करने की कीमत का भी अहसास हुआ है। अगली बार सीमा की शांति भंग करने से पहले वह ठिठककर सोचेगा।

लद्दाख में चीन की घुसपैठ से निपटने में नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से अपनाई गई रणनीति कमोबेश उसी तरह की थी, जैसी कि संप्रग शासन के दौरान अपनाई जाती थी। चीनी तैनाती के जवाब में लगभग समान मात्रा में भारतीय सैनिकों की तैनाती और फ्लैग मीटिंगों तथा राजनैतिक संवाद के जरिए तनाव घटाने की कोशिश। अलबत्ता, पाकिस्तान के संदर्भ में मोदी सरकार का नया रूप देखने को मिला। हो सकता है, इसके पीछे महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों ने भी कोई भूमिका निभाई हो, जहाँ श्री मोदी के विरोधी उनकी 56 इंच की छाती पर सवाल उठाने लगे थे। हो सकता है, भारत के कड़े रुख के पीछे राजनैतिक कारण रहे हों, जैसा कि पाकिस्तान सरकार और वहाँ के मीडिया द्वारा आकलन किया जा रहा है। लेकिन यह भी हो सकता है कि पाकिस्तान के संदर्भ में नरेंद्र मोदी सरकार का नजरिया सचमुच पहले की सरकारों की तुलना में अधिक आक्रामक और कम लचीला हो।

पाकिस्तान के संदर्भ में भारतीय जनता पार्टी और उसके सामाजिक-सैद्धांतिक-सांस्कृतिक-वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नीति शुरू से स्पष्ट रही है। वह नीति है किसी भी गलत हरकत का प्रभावी जवाब देने, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर कदम उठाने की रणनीति। हालाँकि यह रणनीति हर बार सफल ही हुई हो, ऐसा यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी राजग की सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर ठोस और आक्रामक रणनीति की छाप छोड़ी थी। कारगिल में हमने पाकिस्तान को मैदान छोड़ने पर मजबूर कर सैन्य गौरव हासिल किया। लेकिन संसद पर हमले के बाद प्रतिक्रियास्वरूप सीमा पर एक साल तक फौज तैनात करने के बावजूद हम पाकिस्तान को झुकाने में नाकाम रहे। दोनों देशों की फौजें आमने-सामने डटी रहीं और भारी आर्थिक कीमत चुकाकर भी न पाकिस्तान पीछे हटा और न हम। अंततः सुलह-सफाई और राजनय के माध्यम से हम तनाव की पराकाष्ठा के दौर से वापस लौटे। जाहिर है, कठोरता की नीति कामयाबी की गारंटी नहीं है। शांति की नीति भी कामयाबी की गारंटी नहीं देती, विशेषकर तब जब भारत की अखंडता और अमन-चैन को भंग करने में चीन और पाकिस्तान जैसे प्रतिद्वंद्वियों की दृष्टि हो। ऐसे में सरकार चाहे कोई भी हो, हमारी सुरक्षा संबंधी रणनीति संतुलित होनी चाहिए- जरूरत पड़ने पर बेहद कठोरता से प्रहार करने की इच्छा शक्ति हो, लेकिन परिस्थितियों की मांग होने पर शांति को अपनाने में आपत्ति नहीं।

भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ मौजूदा टकराव सैन्य और राजनैतिक विश्लेषण की मांग करता है। पाकिस्तानी सेना और शासकों की ओर से सीमा पर संघर्षविराम के उल्लंघन की प्रवृत्ति अनेक परिस्थितियों में देखी गई है। पाकिस्तान में आंतरिक समस्याएं पैदा होने पर सीमा को गर्म कर दिया जाता है। भारत की ओर से जवाबी फायरिंग होने पर मीडिया में भारतीय चुनौती को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और पाकिस्तानी एकजुटता का मुद्दा वहाँ की आंतरिक अशांति, आर्थिक संकट, राजनैतिक अस्थिरता आदि पर हावी हो जाता है। यह पाकिस्तानी शासकों के हित में है। फायरिंग का एक कोण जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के प्रसार के पाकिस्तानी सेना और इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस के मकसद से जुड़ता है। कश्मीर में आतंकवादियों का नया जत्था भेजने से पहले भारतीय सीमा सुरक्षा तंत्र का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तानी रेंजर्स की तरफ से कवर फायरिंग की जाती है। फायरिंग की आड में आतंकवादियों के दल कश्मीर में घुसपैठ कर जाते हैं। सो यह पाकिस्तानी सेना की आतंकवाद-प्रसारक रणनीति का हिस्सा भी है। फिर पाक फौज अपने आपको प्रासंगिक बनाए रखने और कश्मीर मुद्दे को जिंदा बनाए रखने के लिए भी संघर्षविराम का मार्ग अपनाती है।

जहाँ पाकिस्तान की तरफ़ से कहा जा रहा है कि इस बार फायरिंग की पहल भारत ने की, भारतीय पक्ष का आकलन भिन्न है। भारतीय खुफिया एजेंसियों की खबर है कि पाकिस्तानी सेना ने विस्फोटक किस्म के घरेलू हालात से ध्यान हटाने के लिए सीमा पर संघर्षविराम का उल्लंघन करना शुरू किया। कहा जा रहा है कि एक मकसद भारत की नई सरकार के रुख को आजमाना भी था कि वह किस हद तक जा सकती है। हालाँकि मैं इस आकलन से सहमत नहीं हूँ। कोई भी सेना या सरकार सिर्फ दूसरे देश को आजमाने के लिए आग में हाथ जलाना नहीं चाहेगी, खासकर तब जब कि दोनों देशों के बीच छोटी सी बात के बढ़कर बड़े टकराव का रूप ले लेने का इतिहास मौजूद है। इतना जरूर है कि गोलीबारी की शुरूआत पाकिस्तान की तरफ से ही हुई लेकिन जल्दी ही वहाँ की सेना को अपनी भूल का अहसास हो गया, खासकर तब जब भारत ने गोलीबारी का जवाब 'भारी गोलीबारी' से दिया। हालत यहाँ तक पहुँची कि पाकिस्तानी जनरलों को फेस-सेवर के रूप में फायरिंग रोकने का कोई उचित बहाना तक नहीं मिला। बहरहाल, जब हालात काबू से बाहर निकलने जा रहे हों तो हाथ पीछे खींच लेने जरूरी हैं।

इस बार के संघर्षविराम उल्लंघनों ने पाकिस्तान को जिस तरह उसकी सैन्य, राजनैतिक और नैतिक कमजोरी का अहसास दिलाया, वह साफ दिखाई दे रहा है। वरना ऐसा कब होता है जब सीमा पर फायरिंग से कोई इतना आतंकित हो जाए कि अपने परमाणु हथियारों की बात करने लगे, जैसा कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने किया। पाकिस्तान ने इस मामले में फिर संयुक्त राष्ट्र को शामिल करने की नाकाम कोशिश की और अब अप्रासंगिक हो चुके संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह को सीमा के मुआयने के लिए बुलाए जाने की मांग की। यह सब उसकी हताशा और कमजोरी को प्रकट करता है। भारत सरकार ने इस कमजोरी को तुरंत भाँप लिया जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री अरुण जेटली और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयानों से झांकते आत्मविश्वास से प्रकट होता है।

इस बात में शायद ही किसी को संदेह हो कि राजग सरकार ने इस मामले में पिछली सरकार से भिन्न रवैया अपनाया है। केंद्र सरकार की तरफ से यह स्पष्ट कर दिया गया था कि सीमा पर तैनात टुकड़ियों के पास पाकिस्तानी हरकतों का आवश्यकतानुसार जवाब देने की पूरी आजादी है। यह एक बड़ा संदेश है और पिछली सरकार की नीति से अलग है, जब सेना और सीमा सुरक्षा बल में दबे-छिपे इस बात पर निराशा जताई जाती थी कि उन्हें हर प्रतिक्रिया के लिए राजनैतिक नेतृत्व के निर्देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। पाकिस्तानियों के हाथों भारतीय सैनिकों के सिर काट ले जाए जाने की घटना इसकी एक मिसाल है, जब भारतीय सेना की तरफ से तुरंत बदले की कार्रवाई करने में काफी समय लिया गया। बहरहाल, इस बार स्थितियाँ अलग थीं। सीमा पर तैनात टुकड़ियों को निर्देश था कि पाकिस्तान की तरफ से होने वाली फायरिंग का उसी दिशा में, उसी शैली में, अधिक परिमाण में जवाब दिया जाए। रक्षा मंत्री का बयान इस रुख को स्पष्ट करता था जिन्होंने कहा कि भारत की ओर से दिया जाने वाला जवाब 'प्रभावी' होगा। भारत के रुख में एक बड़ा बदलाव यह था कि इस बार हम फ्लैग मीटिंगों में समय बर्बाद करने के लिए तैयार नहीं थे। जब शुरूआत उधर से हुई है तो रोकना भी उन्हीं को है- भारत की तरफ से यह संदेश स्पष्ट था। केंद्र से निर्देश था कि पाकिस्तान की तरफ से आने वाले फ्लैग मीटिंगों के आग्रह पर ध्यान नहीं दिया जाए।

सरकार का रुख यकीनन अलग है। पाकिस्तान को अपनी रणनीतियों और नजरिए का दोबारा आकलन करना होगा। उसे भारत में चल रही मनःस्थिति का अनुमान हो गया है। क्या सीमा पर संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं बंद हो जाएंगी? कहना मुश्किल है। हो सकता है कि पाकिस्तान ने रणनीतिक वापसी की हो और कुछ सप्ताह या महीनों के बाद वह ज्यादा ताकत और मजबूती के साथ सामने आए। भारत अति-आत्मविश्वास का जोखिम मोल नहीं ले सकता। उसे सतर्क बने रहना होगा और अपनी तरफ से पूरी तैयारी रखनी होगी। चुनौती चाहे उत्तर से आए या पश्चिम से, हमारा जवाब 'प्रभावी' ही होना चाहिए। यहाँ प्रभावी का अर्थ सिर्फ सैन्य अर्थों में नहीं लिया जाए, उसमें राजनैतिक और राजनयिक पहलू भी समाहित हैं।

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