रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 03 नवंबर 2014

लब्बोलुआबः

आखिर वह कौनसी रुकावट है जो सरकार के स्तर पर लागू की जाने वाली महत्वाकांक्षी तकनीकी परियोजनाओं को समय पर पूरा नहीं होने देती। भारी-भरकम बजट के बावजूद सरकारी संस्थान जिन तकनीकी अनुप्रयोगों का विकास और डिलीवरी करने में नाकाम रहते हैं आखिर उन्हें गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे निजी तकनीकी संस्थान अपेक्षाकृत कम बजट पर, बहुत कम समय में कैसे तैयार कर लेते हैं?

Summary:

Why ambitious technology development schemes and projects run by our government fail to deliver whithin stipulated time and budget while companies such as Google and Microsoft are able to deliver equally important products on a regular basis. What stops heavily funded government projects from getting completed within the pre-defined time frames?
जो गूगल के लिए आसान है, वह सरकारों के लिए मुश्किल क्यों?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

केंद्र सरकार की तरफ से डिजिटल भारत और ई-शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए की जा रही बड़ी पहल से नागरिकों के लाभ के साथ-साथ हिंदी के सुखद भविष्य के संदर्भ में भी बड़ी उम्मीदें लगी हैं किंतु इन उम्मीदों को व्यावहारिकता के दायरे में रखा जाना श्रेयष्कर होगा। कारण? अतीत में हिंदी से जुड़ी सरकारी परियोजनाओं, विशेषकर तकनीक के क्षेत्र में, के क्रियान्वयन ने कोई बहुत उम्मीदें नहीं जगाई हैं। हालाँकि इस बात में संदेह नहीं है कि सही ढंग से क्रियान्वित होने पर ऐसी परियोजनाएँ हिंदी के विकास और प्रसार में योगदान दे सकती हैं। लेकिन समस्या मंतव्य की कम, प्रक्रियाओं की अधिक है।

याद कीजिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के महत्वाकांक्षी टैबलेट 'आकाश' को। दुनिया के सबसे सस्ता टैबलेट को पिछली सरकार के शक्तिशाली मंत्री कपिल सिब्बल का पूरा संरक्षण हासिल था। परियोजना पर आने वाली लागत सीमित थी और उपयोगिता असीमित। इसे बड़ी संख्या में देश के महाविद्यालयों और विद्यालयों तक पहुँचाने और इसके माध्यम से शैक्षणिक सामग्री और सेवाओं की डिलीवरी का उद्देश्य भी व्यावहारिकता के दायरे में था। अवधारणा भी अच्छी थी क्योंकि देश के कोने-कोने में फैले स्कूल-कॉलेजों में कंप्यूटरों को फैलाना न सिर्फ टैबलेट की तुलना में बहुत खर्चीला विकल्प था बल्कि बिजली और इंटरनेट की निर्बाध व्यवस्था न होना भी बहुत बड़ी बाधा था। इसके मुकाबले आकाश, जो कि एक हैंडहेल्ड डिवाइस है, को एक बार चार्ज करने के बाद कई घंटे तक बिना बिजली इस्तेमाल किया जा सकता था और डेटा प्लान के माध्यम से इंटरनेट के प्रयोग का वैकल्पिक माध्यम भी उपलब्ध था। एक कंप्यूटर की कीमत में बीस 'आकाश' टैबलेट आ सकते थे, सो वह आर्थिक दृष्टि से भी कम व्यावहारिक नहीं था। उत्पाद भी तैयार हो गया, जमकर प्रचार भी हो गया, लेकिन जब बात क्रियान्वयन की आई तो वही ढाक के तीन पात! न तो कहीं कन्टेन्ट का पता है और न ही डिलीवरी का।

इसके बरक्स निजी क्षेत्र की ई-शिक्षा और ई-कन्टेन्ट परियोजनाओं को देखिए। एडुकॉम्प, जिसने बहुत छोटे पैमाने पर स्कूलों में आधुनिक ढंग से स्मार्ट-कक्षाओं की शुरूआत की थी, वह एक दशक के भीतर कहां से कहां पहुँच गई। आखिरकार हजारों स्कूलों और लाखों विद्यार्थियों तक पहुँचने में इस कंपनी को वैसी समस्याएँ क्यों पेश नहीं आई जैसी सरकारी परियोजनाओं को आती हैं, जबकि यह पूरी तरह लाभ-आधारित परियोजना है और सरकारी योजनाओं के लिए मुनाफे जैसी कोई शर्त नहीं है?

एडुकॉम्प अपनी किस्म की अकेली परियोजना नहीं है। प्रथम, ईगुरुकुल, ज़ी इंटरएक्टिव और स्कूलनेट जैसी परियोजनाएँ भी इसी दिशा में कार्यरत हैं। फिर ऑनलाइन ट्यूशन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की सफलता की कई कहानियाँ मौजूद हैं, जैसे- ट्यूटरविस्टा। दूसरी तरफ, सरकार की साक्षत् जैसी महत्वाकांक्षी ई-शिक्षा परियोजना अपनी स्थापना के लगभग एक दशक बाद भी संघर्ष की स्थिति में है। ई-ज्ञानकोश, विद्यानिधि आदि इसी श्रेणी में आते हैं।

हिंदी में तकनीकी विकास को बढ़ावा देने वाली अन्य सरकारी योजनाओं की भी बात हो जाए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की पिछली सरकार के दौर में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने हिंदी में कामकाज आसान बनाने के लिए कुछ सॉफ्टवेयरों का विकास करवाया था। इन सॉफ्टवेयरों की सीडी तैयार हुई जिसे धूमधाम से जारी किया गया। खासा प्रचार भी हुआ। लेकिन पहली बात तो ये सीडी आम लोगों तक पहुँची ही नहीं, और दूसरे, इसमें शामिल सॉफ्टवेयरों में से अधिकांश नए ऑपरेटिंग सिस्टमों के अनुकूल नहीं थे या बाजार में प्रचलित सॉफ्टवेयरों के साथ स्पर्धा करने की स्थिति में नहीं थे। जो हिंदी की तकनीकी सक्षमता के क्षेत्र में एक अच्छी पहल सिद्ध हो सकती थी, वह निष्प्रभावी सिद्ध हुई। यूँ भारतीय भाषाओं में तकनीकी विकास (टीडीआईएल) नामक यह परियोजना आज भी किसी न किसी रूप में जारी है, लेकिन कागजों में। भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में इस तरह की सीडी बनी हैं जिनका मकसद आम लोगों को अपनी भाषाओं में तकनीकी माध्यमों पर कामकाज में सक्षम बनाना है। एक दशक से ज्यादा की अवधि बीत चुकी है। क्या अब तक ये उत्पाद आप तक पहुँचे? उत्पादों की छोड़िए, क्या उनकी जानकारी तक आपके पास पहुँची? इस्तेमाल तो दूर, इन पर जागरूकता फैलाने तक का प्रयास नहीं किया गया।

मंत्र राजभाषा, लीला हिंदी शिक्षण प्रणाली, श्रुतलेखन, चित्रांकन आदि उत्पाद, जिन्हें केंद्र सरकार के राजभाषा विभाग के भारी आर्थिक सहयोग से सीडैक की तरफ से विकसित किया जा रहा है, भी सरकारी उदासीनता की शिकार हैं। ऐसी परियोजनाएँ, दर्जनों करोड़ रुपए के बजट से पोषित होते हुए दशकों तक चलती रहती हैं और शायद आगे भी दशकों तक चलती रहेंगी। त्रुटिहीन और व्यावहारिक दृष्टि से प्रयोग के योग्य अंतिम उत्पाद और अंतिम परिणाम के आने तक न जाने कितने और समय तथा बजट की जरूरत पड़ेगी! दूसरी तरफ गूगल जैसी निजी कंपनियों को देखिए जो ऑनलाइन हिंदी अनुवाद से लेकर हिंदी डिक्टेशन जैसे उत्पादों को तीन-चार साल की छोटी अवधि और छोटे बजट में विकसित कर देती है और निःशुल्क उपलब्ध भी करा देती है। यह एक अनोखी पहेली है कि उच्च स्तर पर तमाम समर्थन और सहयोग के बावजूद आखिर क्यों, कहाँ और कैसे अटक जाती हैं हमारी सरकारी परियोजनाएँ?

केंद्र सरकार की डिजिटल इंडिया नामक पहल से सबको बड़ी उम्मीदें हैं। यह परियोजना मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से न सिर्फ सरकारी सेवाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आम लोगों तक पहुँचा सकती है बल्कि शिक्षा-प्रक्रिया को भी ज्यादा उद्देश्यपूर्ण और परिणामोन्मुख बना सकती है। ई-शिक्षा परियोजना में हिंदी कई तरीकों से लाभान्वित हो सकती है। न सिर्फ हिंदी के अध्ययन में तकनीकी माध्यमों का रचनात्मक इस्तेमाल करने की संभावना मौजूद है बल्कि अन्य विषयों को भी हिंदी माध्यम से पढ़ाए जाने का अवसर मौजूद है। आम लोगों के बीच तकनीक के प्रति जागरूकता और आकर्षण बढ़ा हुआ है। अभिभावक भी चाहते हैं कि बच्चे पढ़ाई-लिखाई में नए तौर-तरीकों का इस्तेमाल करें। गुंजाइश तो बहुत है, मगर दारोमदार प्रक्रिया तथा क्रियान्वयन पर है। यदि मोदी सरकार प्रक्रिया और डिलीवरी के मामले में पिछली सरकारों से बेहतर सिद्ध हो तो देश में शिक्षा का भी कायाकल्प हो सकता है और भाषाओं का भी।

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