रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 03 नवंबर 2014

लब्बोलुआबः

कहना होगा कि देश भर के बच्चों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन तथा संवाद को लेकर जितनी शंकाएँ और आशंकाएँ रही होंगी, उनमें से अधिकांश निर्मूल सिद्ध हुई। न राजनीति का जिक्र, न धर्म का, न संघ के सिद्धांतों की चर्चा और न अपनी 'महानता' का बखान। कम शब्दों में कहें तो संवाद सार्थक और उद्देश्यपूर्ण रहा।

Summary:

Prime Minister Narendra Modi addressed the children of India, perhaps for the first time since Pt. Nehru did so in the 1960s. During this friendly conversation involving a large, virtual, nationwide audience, what Modi said was based on conventional wisdom- a message that every parent wants to deliver to his children.
नई पीढ़ी से सहज संवादः नेहरू और कलाम से अलग मोदी शैली

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

पाँच सितंबर को देश भर के स्कूली छात्रों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संवाद शुरू होने से पहले अधिकांश लोग इस कार्यक्रम का औचित्य नहीं समझ पा रहे थे। कई तरह के विवाद, कई तरह के सवाल भी उठ चुके थे। कहीं इतनी बड़ी संख्या में बच्चों और शिक्षकों को भाषण सुनने के लिए 'बाध्य' करने का विरोध था तो कहीं भाषा का कोण तलाश लिया गया था। मीडिया में भी शंकाएँ थीं। क्या यह शिक्षा प्रणाली के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रेरित 'भगवाकरण अभियान' की शुरूआत है, या फिर नरेंद्र मोदी का आत्म-प्रचारवाद नई ऊंचाइयाँ छू रहा है? क्या यह भावी मतदाताओं के साथ तालमेल बिठाने और उनके जरिए घरों तक पहुँचने की कवायद है, या फिर बच्चों के कोमल मानस को एक खास विचारधारा की तरफ मोड़ने का परोक्ष प्रयास?

आखिरकार मोदी बोले और कहना होगा कि उनके संबोधन तथा संवाद को लेकर जितनी शंकाएँ और आशंकाएँ रही होंगी, उनमें से अधिकांश निर्मूल सिद्ध हुई। न राजनीति का जिक्र, न धर्म का, न संघ के सिद्धांतों की चर्चा और न अपनी 'महानता' का बखान। कम शब्दों में कहें तो संवाद सार्थक और उद्देश्यपूर्ण रहा। पूरी तरह बेतकल्लुफ, दोस्ताना और अनौपचारिक। ज्यादातर बातें हमारी संस्कृति में निहित पारंपरिक बुद्धिमत्ता तथा अनुभव पर आधारित। शैली हल्की-फुल्की और दिलचस्प- स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाने-लिखाने की औपचारिक शैली से भिन्न और रुचिकर। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि श्री मोदी के विरोधियों को आलोचना के लिए अधिक सामग्री नहीं मिली। कांग्रेस भी बस इतनी टिप्पणी कर पाई कि श्री मोदी शिक्षकों के सम्मान के मुद्दे पर लोगों का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाए। हालाँकि बहुत से लोग शायद इससे सहमत न हों। आम आदमी पार्टी की आपत्ति है कि उन्होंने शिक्षकों की खराब स्थितियों, उनकी भर्तियों में घोटालों आदि का जिक्र नहीं किया।

इस बात से कौन इंकार करेगा कि बच्चों के साथ प्रधानमंत्री का संवाद अपने आप में एक नवोन्मेषी (इनोवेटिव) पहल तो है ही। आखिर पहले किसी ने ऐसा क्यों नहीं सोचा? वही देश, वही विद्यालय, वही बच्चे, वही माध्यम- सब कुछ तो पहले से मौजूद था! लेकिन सवाल विचार का है, और प्राथमिकता का भी। यहाँ सर्वोच्च पद पर एक व्यक्ति है, जिसके मन में सचमुच कुछ नया करने की ललक है। इस मायने में श्री मोदी पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की याद दिलाते हैं, जो विद्यार्थियों के साथ संवाद के दौरान अपरिमित ऊर्जा और उत्साह का भंडार प्रतीत होते थे। एक से दूसरे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में जाने और विद्यार्थियों के साथ प्रत्यक्ष संवाद करने में उनका कोई सानी नहीं। श्री मोदी की शैली अलग है। वे बड़े पैमाने पर अपने मॉस ऑडियंस को संबोधित करने में माहिर हैं। सोशल मीडिया पर उनकी पकड़ और विभिन्न माध्यमों से संवाद का लंबा अनुभव उनकी मजबूती है। उनकी बातें जीवन-संघर्ष, संस्कारों, विविधतापूर्ण अनुभवों और पारंपरिक बुद्धिमत्ता पर आधारित हैं। लगभग वही नसीहतें, जो हर अभिभावक या शिक्षक अपने बच्चों को देना चाहता है। इसीलिए इनमें सहजता है, संप्रेषणीयता है, स्वाभाविकता है। और जब यह संदेश इतने बड़े व्यक्ति के माध्यम से बच्चों तक पहुँचता है तो उसका असर ज़रूर होना चाहिए। इसीलिए श्री मोदी की बातें अधिकांश अभिभावकों और शिक्षकों के कानों में मिश्री के समान रही होंगी।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम विषय विशेष के अध्ययन, प्रत्यक्ष संवाद, समस्याओं के वैज्ञानिक विश्लेषण और अनुभवजन्य समाधान प्रस्तुत करने में रुचि रखते हैं। उनकी विषयवस्तु प्रश्न और प्रतिप्रश्न उत्पन्न करने की दृष्टि से तैयार की गई है। वह शिक्षा और कौशल निर्माण के क्षेत्र में व्यावहारिक मार्गदर्शन पर केंद्रित है। उनके बरक्स प्रधानमंत्री मोदी का जोर संस्कार निर्माण और मोटीवेशन पर अधिक दिखता है। दोनों के पास दृष्टि है। दोनों का उद्देश्य और संदेश भी लगभग एक है किंतु तरीके भिन्न-भिन्न। दोनों पद्धतियों तथा विषय-वस्तुओं (कन्टेन्ट) की अपनी-अपनी उपयोगिता है और माध्यम भी सटीक हैं। श्री मोदी के विपरीत, डॉ. कलाम की पावरप्वाइंट प्रस्तुतियां दूरदर्शन जैसे जनसंचार माध्यम के जरिए देश भर के छात्रों तक पहुँचने पर संभवतः उतनी प्रभावी सिद्ध नहीं हो सकेंगी जितनी कि किसी स्थान विशेष पर छात्रों को सीधे संबोधित करने में। उधर श्री मोदी के लिए नियमित रूप से स्कूल-कॉलेजों में जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो सकेगा इसलिए सोशल मीडिया और मास मीडिया उनके लिए अधिक अनुकूल है। अखबारों में चर्चा है कि नरेंद्र मोदी की नजर 'चाचा नेहरू' की विरासत पर दिखती है। यह बात इसलिए भी उठती है कि उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर में स्थापित संस्थाओं, परंपराओं और नीतियों पर नए नजरिए का परिचय दिया है। जैसे योजना आयोग। किंतु मुझे लगता है कि श्री मोदी की नई पहलों और नई सोच का किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के साथ कोई संबंध होना संयोग मात्र है। इसके पीछे कोई राजनैतिक संदेश या राजनैतिक उद्देश्य कम, निजी पसंद-नापसंद, वरीयताएँ, शैली और विचारधारा अधिक प्रतीत होती है।

जहाँ तक शैली का प्रश्न है, श्री मोदी और डॉ. कलाम के बरक्स पंडित नेहरू की शैली कुछ और थी- बच्चों के साथ प्रत्यक्ष घुलना-मिलना, खेलना, किस्सागोई करना आदि-आदि। मैंने जो कुछ पढ़ा है, उसके अनुसार वे भी बच्चों के साथ बड़े बेतकल्लुफ थे। खूब मजाक करना और खेल-खेल में कुछ सिखाने की कोशिश करना। 1949 में बच्चों के नाम पत्र में उन्होंने लिखा है- "मैं बच्चों के साथ रहना और खास तौर पर उनके साथ खेलना पसंद करता हूँ। कुछ समय के लिए मैं भूल जाता हूँ कि मेरी उम्र बहुत अधिक है और मेरे बचपन को बहुत लंबा अरसा बीत चुका है।" उस जमाने में टेलीविजन नहीं था। लेकिन नेहरूजी बच्चों तक पहुँचने के लिए रेडियो और प्रत्यक्ष संपर्क का रास्ता अपनाते थे। आजादी के बाद भारत में इतने विशाल शिक्षा तंत्र की स्थापना में निस्संदेह नेहरूजी का हाथ रहा। उनकी लिखी 'भारत एक खोज' (डिस्कवरी ऑफ इंडिया), 'विश्व इतिहास की झलक' (ग्लिम्प्सेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री), 'पिता के पत्र, पुत्री के नाम' (लेटर्स फ्रॉम ए फादर टु हिज डॉटर) जैसी महान किताबें बच्चों और बड़ों को कई पीढ़ियों तक ज्ञान और प्रेरणा देती रहेंगी। आज का दौर अलग है और वह दौर अलग था। मुझे लगता है कि बच्चों के साथ संपर्क के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी की तुलना नेहरूजी के साथ करना बेमानी है। न सिर्फ दोनों का समय अलग है, परिस्थितियाँ भी अलग हैं, तौर-तरीके भी अलग हैं और जरूरतें भी। लेकिन भले ही नेहरू हों, डॉ. कलाम हों या फिर मोदी, तीनों ने भारतीयों के एक ऐसे विशाल वर्ग के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश की है, जो इस तरह की दुर्लभ घटनाओं के अलावा प्रायः उपेक्षित पड़ा रह जाता है। जबकि यही वह वर्ग है, जिस पर भारत का भविष्य निर्भर है। उस दृष्टि से तीनों एक ही खेमे में दिखाई देते हैं, प्रतिद्वंद्वी खेमों में नहीं।

नरेंद्र मोदी ने एक चीनी कहावत का जिक्र करते हुए इस बात को रेखांकित भी किया। उन्होंने कहा कि जो लोग एक साल की सोचते हैं वे अनाज बोते हैं, जो दस साल की सोचते हैं वे फलों के वृक्ष लगाते हैं लेकिन जो पीढ़ियों की सोचते हैं वे इंसानों में निवेश करते हैं। यह कहावत प्रधानमंत्री की प्राथमिकता को स्पष्ट करती है। जिस तरह का बड़ा सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव लाने का मंसूबा लेकर वे चल रहे हैं, उसकी कामयाबी के लिए बच्चों को साथ लेना बहुत ज़रूरी है। एक तरफ विकास का लक्ष्य, तो दूसरी तरफ भारत को 2019 तक स्वच्छ राष्ट्र में बदलने का संकल्प। इनमें से बहुत से बच्चे 2019 तक युवा हो जाएंगे। उन्हें उद्वेलित करने, राष्ट्रीय महत्व के विषयों की ओर ध्यान खींचने, उनमें उत्साह भरने, सोचने-समझने, तर्क करने और अच्छे भविष्य के लिए तैयार करने की जरूरत है। श्री मोदी के संवाद से इसकी बुनियाद जरूर पड़ी है जिन्होंने बहुत सहजता के साथ अनुशासन, किफायत, ऊर्जा-संरक्षण, स्वच्छता, खेलकूद, पढ़ने लिखने की प्रवृत्ति, खेलकूद आदि का संदेश दिया। बच्चों को शायद एक बड़ी हस्ती से एक बार फिर खूब पढ़ने और अच्छे अंक लाने की नसीहत की आशंका रही होगी, लेकिन श्री मोदी ने कहा कि किताबी ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है किसी हुनर का विकास। इस संदर्भ में उन्होंने दादा धर्माधिकारी का प्रसंग सुनाया तो महात्मा गांधी को भी याद किया। श्रमदान की अहमियत बताने के लिए जापान का अपना ताजा अनुभव सुनाया, जहाँ शिक्षक और छात्र मिल-जुलकर स्कूल की सफाई करने में संकोच नहीं करते।

ध्यान से देखा जाए तो इस हल्के-फुल्के संवाद में श्री मोदी ने उन बिंदुओं को अवश्य रेखांकित कर दिया, जिन पर मौजूदा सरकार काम कर रही है। जैसे- डिजिटल इंडिया नामक उनकी प्रिय परियोजना, जिसके तहत इंटरनेट तथा दूरसंचार के माध्यम से देश भर में लोगों तक जरूरी सुविधाएँ पहुँचाई जाएंगी। कौशल विकास, जिस पर फोकस करते हुए सरकार 'स्किल इंडिया' कार्यक्रम के तहत सन् 2022 तक 50 करोड़ भारतीयों को किसी न किसी क्षेत्र में कौशल से लैस करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। स्वच्छता अभियान और बालिकाओं के लिए शौचालय, जिनका उन्होंने 15 अगस्त को अपने भाषण में खास तौर पर जिक्र किया था। श्री मोदी ने कहा भी कि इस कार्यक्रम के जरिए वे इस बात का आकलन करने का भी प्रयास कर रहे हैं कि क्या भारत के दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थित विद्यालय कनेक्टिविटी के बुनियादी तंत्र से लैस हैं। डिजिटल इंडिया, ई-शिक्षा और ई-लाइब्रेरी जैसे कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं के संदर्भ में यह जानकारी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के साथ बच्चों और शिक्षकों द्वारा बिताई गई डेढ़ घंटे की यह अवधि हमारे उस सुप्त, उदासीन, मशीनी ढर्रे वाले शिक्षा तंत्र को झकझोरने, जोश भरने, नए विचारों को प्रोत्साहित करने और आत्म-मंथन के लिए प्रेरित करने में योगदान देगी। उस लिहाज से यह कोई महंगा सौदा नहीं है।

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