Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 02 अक्तूबर 2014
श्रेणीः  विदेश
टैगः  स्कॉटलैंड

लब्बोलुआबः

स्कॉटलैंड की जनता ने यूके के भीतर ही बने रहने का निर्णय किया जो सामूहिकता की शक्ति और भावनात्मक एकता की अहमियत दर्शाता है। इस जमनतसंग्रह में कश्मीर समेत दुनिया भर के अलगाववादी आंदोलनों के लिए संदेश छिपा हुआ है।

Summary:

Scotland's decision to remain a part of UK has a message for all separatist movements of the world and Kashmir is no exception. And the message is- that unity means real power and real progress.
स्कॉटलैंड के जनमतसंग्रह से कुछ सीखेंगे कश्मीरी भाई?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

ऐतिहासिक जनमतसंग्रह में स्कॉटलैंड ने यूनाइटेड किंग्डम (यूके) से अलग होने के विरोध में अपनी राय प्रकट की है। मुझे याद नहीं पड़ता कि पहले कभी किसी जमनतसंग्रह का परिणाम आने पर विश्व ने इस तरह राहत की सांस ली हो जैसी कि इस बार ली है। यूके के अन्य घटकों, इंग्लैंड के नाटो सहयोगियों और प्रमुख बाजारों समेत अधिकांश स्थानों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ आई हैं। जनमतसंग्रह इस बात पर था कि क्या स्कॉटलैंड यूके से अलग होना चाहेगा? यूके चार अलग-अलग क्षेत्रों- इंग्लैंड, उत्तरी आयरलैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड का संघ है। यह कोई भौगोलिक इकाई नहीं है बल्कि आपसी सहमति पर आधारित संघ है इसलिए 'आजादी' जैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व वहाँ पर नहीं है। प्रश्न सिर्फ संघ से अलग होने या साथ रहने का है, जिसका निर्णय भी संबंधित पक्षों को स्वयं करना है। बहरहाल, स्कॉटलैंड की जनता ने यूके के भीतर ही बने रहने का निर्णय किया जो सामूहिकता की शक्ति और भावनात्मक एकता की अहमियत दर्शाता है। इस जमनतसंग्रह में कश्मीर समेत दुनिया भर के अलगाववादी आंदोलनों के लिए संदेश छिपा हुआ है। ..और यह संदेश है एकता का, उस अटूट संबंध का जो सदियों के सहजीवन पर आधारित है।

स्कॉटलैंड के जनमतसंग्रह से पहले कश्मीरी अलगाववादी नेताओं ने यह मांग उठाई भी थी कि जम्मू-कश्मीर में भी इसी तरह का मतदान कराया जाना चाहिए। शायद इस आशा में कि स्कॉटलैंड यूके से अलग होने का फैसला करने वाला है। मीरवाइज उमर फारूक ने कहा था कि स्कॉटिश लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से अपना भविष्य तय करने का अधिकार देना एक आशाजनक घटना है और उन्हें उम्मीद है कि भारत भी इससे सबक लेगा। सैयद अली शाह गिलानी ने भी स्कॉटलैंड को मतदान का अधिकार देने के लिए यूके की तारीफ करते हुए कहा था कि इंग्लैंड को भारत पर भी यही करने के लिए दबाव डालना चाहिए। बहरहाल, अब जबकि स्कॉटलैंड ने एकता के पक्ष में फैसला कर लिया है तो मीरवाइज और उनके साथियों की प्रतिक्रिया देखना दिलचस्प होगा।

भारत ने साढ़े छह दशक पहले, 1947 में, संयुक्त राष्ट्र में जम्मू-कश्मीर में जनमतसंग्रह पर सशर्त सहमति जाहिर की थी। बहरहाल, पाकिस्तान ने इन पूर्व-शर्तों पर अमल नहीं किया और कश्मीरियों द्वारा आत्मनिर्णय करने की स्थिति कभी नहीं बनी। वह संभावना कभी बन भी नहीं सकेगी क्योंकि पिछले छह दशकों में परिस्थितियाँ इतनी बदल चुकी हैं कि इससे संबंधित संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव अप्रासंगिक हो चुका है। हालाँकि जम्मू कश्मीर में सक्रिय अलगाववादी नेता आज भी अपने भविष्य का फैसला करने के लिए कश्मीरियों को मौका देने की मांग पर कायम हैं। यूँ कश्मीर दुनिया का ऐसा अकेला क्षेत्र नहीं है जहाँ अलगाववादी आंदोलन जारी है। पाकिस्तान में भी बलोच अलगाववादियों ने स्कॉटलैंड की ही तर्ज पर अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार देने की मांग की है। उधर कनाडा में क्यूबेक, यूक्रेन में क्रीमिया, स्पेन में कैटालोनिया, बेल्जियम में फ्लैंडर्स, इराक में कुर्दिस्तान, श्रीलंका में तमिल ईलम जैसे बहुत से क्षेत्रों में अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं। चीन की स्थिति तो भारत की तुलना में बहुत नाजुक है, जहाँ तिब्बत, हांगकांग और शिनजियांग (उइगुर अलगाववाद) उससे अलग होने के किसी भी अवसर को तुरंत लपक लेना चाहेंगे। बहरहाल, स्कॉटलैंड के मतदान में इन सभी के लिए मंथन करने को कुछ न कुछ है।

स्कॉटलैंड जैसा नहीं कश्मीर

जम्मू-कश्मीर में परिस्थितियाँ लगातार बदलती चली गई हैं और उसी के अनुरूप जनमतसंग्रह की संभावना निरंतर अप्रासंगिक होती चली गई है। और इसके लिए भारत ही जिम्मेदार नहीं है। पाकिस्तान ने न सिर्फ 1947 में कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था बल्कि बाद में उसे अपनी सुविधानुसार तथाकथित 'आज़ाद कश्मीर' और गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्रों में भी विभाजित कर दिया था। जनमतसंग्रह संबंधी प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव चार्टर के अध्याय 6 के तहत पारित किया गया था। पहला तथ्य तो यही है कि इस अध्याय के तहत पारित प्रस्ताव 'बाध्यकारी' नहीं हैं और उनके 'अनिवार्य क्रियान्वयन' का प्रावधान नहीं है। दूसरे, जनमतसंग्रह की पहली शर्त के तौर पर पाकिस्तान ने कभी भी अपने कब्जे वाले इलाकों का नियंत्रण नहीं छोड़ा है। इधर भारत निरंतर यह दलील देता रहा है कि राज्य की जनता विभिन्न चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग कर भारतीय संघ और यहाँ की राजनैतिक व्यवस्था में अपना विश्वास प्रकट करती रही है। जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियों में एक बड़ा बदलाव कश्मीरी पंडितों को खदेड़े जाने से आया है, जिसके लिए भी भारत नहीं बल्कि खुद कश्मीरी अलगाववादी और पाकिस्तान आधारित आतंकवादी तत्व जिम्मेदार हैं।

आज का जम्मू-कश्मीर वह नहीं है, जैसा कि वह सन् 1947 में था। न ही जनमतसंग्रह के लिए आवश्यक शर्तों का ही किसी पक्ष ने पालन किया है। भारत और पाकिस्तान में न जाने कितनी सरकारें बदल चुकी हैं। उनके नजरिए बदल चुके हैं। इसका अनुमान केंद्र द्वारा 'भारत और पाकिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह' (यूएनएमओजीआईपी) को दिए गए सरकारी भवन खाली करने के ताजा निर्देश से हो जाना चाहिए। सदियों की एकात्मता के कारण भारत की जनता कश्मीर के साथ भावनात्मक रूप से बेहद गहराई के साथ जुड़ी हुई है और उसके अलगाव के लिए किसी भी स्थिति में तैयार नहीं है। और तो और अलगाववादी नेताओं का प्रभाव राज्य के तीन में से एक क्षेत्र, कश्मीर घाटी, तक सीमित है। जम्मू और लद्दाख की जनता जनमतसंग्रह की मनःस्थिति में नहीं है। वैसे भी, संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों में कश्मीर को अलग राष्ट्र में तब्दील करने के विकल्प का जिक्र ही नहीं है, जिसकी मांग अधिकांश अलगाववादी नेता करते हैं। उसमें राज्य को भारत के साथ या फिर पाकिस्तान के साथ विलीन करने का ही विकल्प मौजूद है। स्कॉटलैंड के मतदान के मद्देनजर कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों को लागू करने की मांग उठाने वाले नेताओं को इन पहलुओं को नहीं भूलना चाहिए।

विभाजन की व्यावहारिकता

खुदा-न ख्वास्ता, अगर कश्मीर को भारत से अलग स्वतंत्र देश बनने का असंभव विकल्प प्राप्त भी हो जाए तो उसका अंजाम क्या होगा? हाल ही में राज्य में आई बाढ़ के दौरान वहां की जनता को इस मांग की अव्यावहारिकता का कुछ अनुमान अवश्य हो गया होगा जब वे प्रकृति के कोप से बचने के लिए पूरी तरह भारतीय सेना पर निर्भर थे। लगभग दो सप्ताह की त्रासदी के दौरान हुर्रियत कांफ्रेंस के वे नेता कहीं नज़र नहीं आए जो इस बात का दावा करते हैं कि कश्मीर आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि से अपनी देखरेख खुद करने में सक्षम है। जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वहाँ विकास का आत्मनिर्भरता आधारित मॉडल स्थापित होना मुश्किल है। एक 'मित्र देश' के रूप में पाकिस्तान भी उसकी मदद करने की स्थिति में नहीं रहने वाला, जिसके कब्जे वाले कश्मीर के लोग गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और पिछड़ेपन की स्थिति में रह रहे हैं। विकास का तो वहाँ कोई संकेत तक उपलब्ध नहीं है। अगर किसी बात की प्रधानता है तो सिर्फ कट्टरपंथ की।

जम्मू-कश्मीर के चारों तरफ जमीन है, लिहाजा कारोबार की संभावनाएँ भी बेहद सीमित हैं। कृषि, बागवानी, पर्यटन और हस्तशिल्प पर ही पूरी अर्थव्यवस्था निर्भर है। खनन, विनिर्माण, सेवा-उद्योग आदि के लिए संभावनाएं बेहद सीमित हैं। आर्थिक और सैन्य दृष्टि से कमजोर कश्मीर पर पाकिस्तान और चीन की गिद्ध दृष्टि हमेशा लगी रहेगी और वह कब तक अपना अस्तित्व बचा पाएगा, कहना मुश्किल है। खासकर इसलिए क्योंकि समुद्र से दूर होने तथा चारों तरफ दूसरे राष्ट्रों की भूमि होने के कारण वहाँ किसी किस्म की विदेशी सहायता पहुँच पाना भी लगभग असंभव होगा। जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ बने रहना उसकी सुरक्षा और खुशहाली के लिए भी ज़रूरी है। पिछले तीन दशकों से जारी अलगाववाद और आतंकवाद का सिलसिला दूर हो तो राज्य के विकास का दौर शुरू हो। जितना धन वहाँ कानून-व्यवस्था बनाए रखने, आतंकवाद से सुरक्षा तथा पाकिस्तानी फौजी चुनौती के समाधान पर खर्च हो रहा है, कल्पना कीजिए कि यदि वही धन राज्य के विकास पर खर्च हो तो कश्मीर क्या से क्या हो जाए! अगर वहाँ विकास की कमी है तो जिम्मेदारी किसकी है? भारत सरकार की या फिर उन लोगों की जो बाढ़ में फंसे लोगों को बचाने आए सैनिकों पर भी पत्थर बरसाते हैं? स्कॉटलैंड के जनमतसंग्रह का संदेश स्पष्ट है। वह संदेश है- शांति, एकता और विकास का। कश्मीरी जनता को यह पुरानी कहावत नहीं भूलनी चाहिए कि- 'एकता में ही शक्ति है।'

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