Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 02 अक्तूबर 2014
श्रेणीः  डिजिटल भारत
टैगः  डिजिटल भारत

लब्बोलुआबः

ऐसा नहीं है कि भारत के लिए ई-गवरनेंस, ई-प्रशासन, ई-शिक्षा और डिजिटल साक्षरता जैसे मुद्दे एकदम नए हैं। राजीव गांधी के समय कंप्यूटरीकरण का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसकी स्वाभाविक परिणति नरेंद्र मोदी के ई-गवरनेंस और डिजिटल भारत के रूप में हो सकती है।

Summary:

Our experiment with digital and interactive projects is not new, however it is for the first time that e-governance is being given such a great importance under Digital India.
नरेंद्र मोदी का डिजिटल भारत: समय तो अनुकूल है!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भले ही आप राजनैतिक आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हों या विरोधी, आप यह स्वीकार किए बिना नहीं रह सकेंगे कि- एक, उनके पास इनोवेटिव (नवोन्मेषी) विचारों की कमी नहीं है, दो, वे सरकार और प्रशासन की सीमाओं के बावजूद कुछ ठोस करने का संकल्प रखते हैं और तीन, कारोबार से लेकर तकनीक जैसे परस्पर विविधतापूर्ण क्षेत्रों पर भी उनकी दृष्टि काफी हद तक स्पष्ट तथा संतुलित है। लाल किले की प्राचीर से उनका भाषण, जो कि कई मायनों में पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों द्वारा स्थापित परंपराओं और परिपाटियों से भिन्न था- न सिर्फ शैली बल्कि विषय-वस्तु के स्तर पर भी- इसे स्पष्ट करता है। जिस लाल किले से प्रायः हमारे नेता गरीबी, आतंकवाद, भारत-पाक तनाव और नई सरकारी योजनाओं का जिक्र करना एक अनिवार्यता समझते हैं, वहाँ से श्री मोदी ने एक तरफ बुनियादी सामाजिक सुधारों की बात की तो दूसरी तरफ डिजिटल इंडिया और ई-गवरनेंस पर अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं का खाका पेश किया।

शायद इसलिए कि दशकों तक संसद सदस्य के रूप में घिसते रहने का बोझा उनके साथ नहीं है। एक सांसद के रूप में प्राप्त होने वाले अनुभव का अपना महत्व है, लेकिन ऐेसे सांसद प्रायः एक पारंपरिक किस्म के वैचारिक मेथड को अपना लेते हैं। समस्याओं, चुनौतियों और परिपाटियों के बीच से गुजरते हुए कई बार हम अपने ही, स्वाभाविक, नए विचारों से वंचित होते चले जाते हैं; बाहरी माध्यमों से कुछ नया हासिल करने का जज़्बा खोते चले जाते हैं; अपने परिवेश का स्वाभाविक हिस्सा बनते चले जाते हैं। परिवेश और व्यक्ति के बीच सौहार्द तथा अनुकूलता तो विकसित हो जाती है लेकिन झकझोरने वाले क्रांतिकारी विचार कहीं गुम हो जाते हैं। नई पहल का हौसला बचा नहीं रह जाता। अन्यथा आखिर क्या वजह है कि मायावती और अरविंद केजरीवाल जैसे लोग जो किसी अदृश्य परिदृश्य से विस्फोटक किस्म के रचनात्मक विचारों और बदलाव के जज़्बे के साथ सामने आते हैं लेकिन कुछ ही वर्षों में उसी सिस्टम का हिस्सा बन जाते हैं, जिसे हम दशकों से देखते आए हैं। सब कुछ बदल डालने का उनका संकल्प न जाने कहाँ चला जाता है। यथास्थितिवाद को अधिक सुरक्षित और नएपन को चुनौतीपूर्ण अवधारणा के रूप में लेकर चलने वाले हमारे सिस्टम की अपेक्षाएँ किस तरह आपको एक साँचे में ढाल देती हैं, उसकी मिसाल केजलीवाल और मायावती जैसे नेता हो सकते हैं।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी के पास हमारी संसद और केंद्र सरकार के साथ कोई पूर्व अनुभव न होने के अपने लाभ हैं- कम से कम फिलहाल, कम से कम वैचारिक स्तर पर और संकल्प के स्तर पर वे दूसरों से अलग हैं। कहते हैं कि एक विचार विश्व को बदल सकता है और बड़ी-बड़ी सर्वशक्तिमान सरकारों के पास कई बार विचारों का अभाव होता है। संयोगवश, श्री मोदी के साथ यह समस्या नहीं है। ई-गवरनेंस और डिजिटल भारत का उनका सपना इसका मजबूत संकेत है।

लंबी प्रक्रिया की परिणति

ऐसा नहीं है कि भारत के लिए ई-गवरनेंस, ई-प्रशासन, ई-शिक्षा और डिजिटल साक्षरता जैसे मुद्दे एकदम नए हैं। हम इस मार्ग पर और कुछ नहीं तो पिछले दो दशकों से तो चल ही रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के समय पर कंप्यूटरीकरण का जो सिलसिला शुरू हुआ था, उसकी स्वाभाविक परिणति नरेंद्र मोदी के ई-गवरनेंस और डिजिटल भारत संबंधी व्यापक तंत्र के रूप में हो सकती है। इस लंबी अवधि में हम सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, आईटी की आधारभूत संरचनाओं, इंटरनेट आधारित सेवाओं, बाजार तथा सूचना तंत्र आदि के विकास में काफी आगे आ चुके हैं। सूचना प्रौद्योगिकी में हमारे पास कुशल मानव संसाधनों की उपलब्धता अन्य देशों की तुलना में काफी अच्छी है। हालाँकि ढाँचागत विकास के मामले में आज भी चुनौतियाँ बरकरार हैं, जैसे- डिजिटल साक्षरता का अभाव, गांव-कस्बों में कंप्यूटरों की संख्या (पीसी पेनेट्रेशन) के कमजोर आंकड़े, ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमज़ोर रफ़्तार आदि। गांव-कस्बों तक ई-गवरनेंस के लाभ पहुँचाने के संदर्भ में सिर्फ तकनीकी सीमाएँ ही नहीं हैं, हमारी अन्य सीमाएँ भी उस लक्ष्य को हासिल करने में रुकावट पैदा कर सकती हैं, जैसे- बिजली की समस्या, जिसके बिना गांव-देहात के लोगों का सरकारी ई-प्रणालियों के साथ संपर्क कर पाना दिक्कत-तलब होगा, निम्नतम स्तर पर सुविधाओं के संचालन के लिए मानव संसाधनों का अभाव, चुनौतीपूर्ण लक्ष्यों को हासिल करने में प्रशासनिक तंत्र का अनमनापन, जो स्वयँ आज तक तकनीक के साथ उस किस्म का तालमेल नहीं बिठा पाया है, जिसकी आवश्यकता श्री मोदी के ई-गवरनेंस विज़न को साकार करने के लिए सामने आएगी।

किंतु इन सभी समस्याओं का समाधान असंभव नहीं है और प्रधानमंत्री को इन चुनौतियों का बखूबी अहसास दिखता है। दूसरे, समय उनके साथ है। जन-हित में सूचना तकनीक और दूरसंचार क्षेत्र की शक्तियों का प्रयोग करते हुए जिन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का संकल्प उन्होंने लिया है, उसके लिये संभवतः यह सर्वाधिक अनुकूल समय है। पहला, देश में आधी से अधिक संख्या 35 वर्ष तक की आयु के युवाओं की है जो तकनीक के प्रति स्वाभाविक लगाव रखते हैं और उसे दिलचस्पी से देखते तथा प्रयोग करते हैं। दूसरे, देश में मोबाइल फोन, टैबलेट और कंप्यूटरों का प्रसार तेज रफ़्तार से हो रहा है और दूरसंचार सुविधाएँ देश की तीन चौथाई आबादी तक पहुँच चुकी हैं। मोबाइल फोन के मामले में हम अमेरिका को पीछे छोड़ चुके हैं और सिर्फ चीन से पीछे हैं। जब कनवरजेंस का कारवाँ एक के बाद एक मोर्चे फतेह करता जा रहा हो तो टैबलेट और मोबाइल फोन सेवाओं को मुहैया कराने और दोतरफा संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं। श्री मोदी मोबाइल गवरनेंस की भी बात कर चुके हैं और देखा जाए तो देश ने पहले ही इसके लिए एक अच्छा-खासा आधार तैयार कर दिया है।

तकनीक जनता के लिए

इंटरनेट उपयोक्ताओँ के मामले में भी, यदि सरकार की प्राथमिकताएँ बदली नहीं तो, हम 2018 तक अमेरिका से आगे बढ़ सकते हैं जब देश में लगभग 50 करोड़ इंटरनेट उपयोक्ता हो जाएंगे। यह अनायास नहीं है कि फेसबुक से लेकर गूगल और माइक्रोसॉफ्ट से लेकर ट्विटर तक के शीर्ष पदाधिकारी भारत को अपने विकास की धुरी के रूप में देख रहे हैं। अगर सरकार कंप्यूटरों के प्रसार पर फोकस करती है तो तीन साल के भीतर हम अपनी एक चौथाई आबादी को कंप्यूटरों से जोड़ने में सफल हो सकते हैं। गार्टनर के अनुसार भारत में आईटी से संबंधित आधारभूत सुविधाओं पर खर्च चार फीसदी सालाना की गति से बढ़ रहा है। हमें इसे छह से आठ फीसदी तक ले जाना होगा। भारतीय सॉफ्टवेयर और आईटी सेवाओं के शीर्ष संगठन नैसकॉम ने जिस अंदाज में श्री मोदी की घोषणाओं का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया है, वह दिखाता है कि डिजिटल भारत और ई-गवरनेंस के उनके विज़न में कितनी कारोबारी और विकासात्मक संभावनाएँ छिपी हुई हैं।

नरेंद्र मोदी को ई-गवरनेंस का पर्याप्त अनुभव है, यह गुजरात के उनके प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है। गुजरात में उन्होंने जो आईसीटी (सूचना और संचार तकनीकें) विज़न लागू किया, वह प्रायः सफल माना जा रहा है और इसके लिए उन्हें पहले ई-रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सो, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटल माध्यमों के लिए श्री मोदी कोई नए व्यक्ति नहीं हैं। चुनाव के पहले और चुनाव के बाद सोशल मीडिया का उत्कृष्ट प्रयोग कर वे स्वयं को सर्वाधिक आईटी-अनुकूल राजनेता के सिद्ध कर चुके हैं। जनता के साथ दोतरफा संवाद के लिए माइगव.इन पोर्टल की शुरूआत, विभिन्न विभागों को सोशल मीडिया के माध्यम से जनता के साथ दोतरफा संवाद के लिए प्रेरित करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की है। डिजिटल भारत परियोजना को इसी माह केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिल चुकी है। डिजिटल साक्षरता के मोर्चे पर भी कुछ बड़े कदम उठाए जा चुके हैं। निस्संदेह, मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सूचना प्रौद्योगिकी के जनोपयोगी प्रयोग के लिहाज से बड़ी सरगर्मी शुरू हुई है- सरकार के भीतर भी और बाहर भी। ई-गवरनेंस और डिजिटल भारत का लक्ष्य ऐसा नहीं है जो मौजूदा सरकार के वर्तमान कार्यकाल में पूरा हो जाए। लेकिन श्री मोदी एक मजबूत बुनियाद रखने में सक्षम हैं। व्यक्ति भी सही है और समय भी एकदम सही।

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