Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 01 अक्तूबर 2014
टैगः  सोशल मीडिया

लब्बोलुआबः

जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पारंपरिक समाचार माध्यमों से दूरी के चलते उलझन में पड़े हैं, वे जरा सोचें कि सोशल मीडिया की अपार लोकप्रियता, पहुँच और प्रभाव के बावजूद क्या वे अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए पारंपरिक तौर-तरीकों पर निर्भर हैं?

Summary:

Prime Minister Narendra Modi's perceived 'calculated distance' from traditional media stems from his mastery of social media. In this age of Internet and social media, is he really dependent on a particular medium to spread his word?
पारंपरिक मीडिया से दूरी बनाते सोशल मीडिया प्रधानमंत्री

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

बहुत से लोग आम आदमी तक पहुँचने के लिए सोशल मीडिया और दूसरे संवादात्मक माध्यमों के इस्तेमाल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तथाकथित ऑब्सेशन पर हैरत जाहिर करते हैं। असल जिंदगी में चुप्पी और वर्चुअल दुनिया में अति-सक्रियता? श्री मोदी मीडिया से भी दूरी बनाए हुए हैं। और नतीजे में तमाम सवाल उठ रहे हैं- विपक्ष की तरफ से भी, बुद्धिजीवी वर्ग की तरफ से भी और मीडिया की ओर से भी। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री और उनका मंत्रिमंडल किसी बाहरी मीडिया पर निर्भर प्रतीत नहीं हो रहा। यह चुनाव पूर्व के परिदृश्य से एकदम उलट है और इसीलिए लोग विस्मित हैं। बहरहाल, इंटरनेट, विशेषकर सोशल मीडिया की अपार लोकप्रियता, पहुँच और प्रभाव के बाद क्या सचमुच वे अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए पारंपरिक तौर-तरीकों पर निर्भर हैं? सोशल मीडिया तो स्वयं बेहद शक्तिशाली मीडिया है, जिसका स्वामित्व भी उस व्यक्ति के पास है जो उसका प्रयोग करता है। इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और वेब आधारित समाचार माध्यम जिसका प्रयोग सूचनाओं को स्रोत के रूप में करते हैं। जब आपके पास अपनी बात को बिना तोड़-मरोड़ के, बिना काट-छांट के, बिना किसी तरफ झुकाव के, अपने मूल रूप में अभिव्यक्त करने का निजी मीडिया उपलब्ध हो तो पारंपरिक मीडिया पर निर्भरता घट जाती है।

ऐसा नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट माध्यमों की प्रासंगिकता घट गई है। पारंपरिक मीडिया से दूरी के नकारात्मक प्रभाव भी जरूर होंगे, लेकिन सकारात्मक भी हैं। और यह दूरी न सिर्फ सीमित है, बल्कि सोची-समझी और सुयोजित भी है। यह किसी पूर्वाग्रह पर आधारित नहीं दिखती। प्रायः मीडिया के साथ श्री मोदी के संबंध खुले और गर्मजोशी-भरे रहे हैं। हाँ, गुजरात दंगों और निजी जिंदगी से जुड़े विवादों पर मीडिया के एक वर्ग के नजरिए से उन्हें उलझन अवश्य होती रही है, लेकिन फिर भी इन माध्यमों के प्रति उनका अनुराग बरकरार रहा। पिछले चुनावों के दौरान भी उन्हें मीडिया में अच्छा कवरेज मिला और बहुत से लोग भाजपा की स्पष्ट जीत का श्रेय मीडिया को भी देते हैं। ऐसे में उन्हें मीडिया से अरुचि तो बिल्कुल नहीं है। यदि इस दूरी का कोई अहम कारण समझ में आता है तो वह यह कि वे अब काम को अधिक और प्रचार को कम अहमियत दे रहे हैं। दूसरे, प्रधानमंत्री ने अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया के प्रयोग में कुशलता सिद्ध कर दी है। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि सोशल मीडिया ने मास-मीडिया का मजबूत विकल्प उपलब्ध करा दिया है। यहाँ आप बस उतनी बात करें, जितनी करना चाहते हैं- बिना किसी अनावश्यक विवाद या सवाल-जवाब में पड़े। अब काम पर ध्यान केंद्रित करना अधिक महत्वपूर्ण है, बजाए उसे प्रचारित करते रहने के। चुनावों से पहले और चुनावों के दौरान, अलग बात थी।

वास्तव में तकनीकी माध्यमों का विकल्प सिर्फ अपनी बात को प्रचारित-प्रसारित करने तक सीमित नहीं है। वह लोगों की बात सुनने, उस पर मंथन करने और दोतरफा संवाद का माध्यम भी है। इस बात को हम मोदी सरकार के माईगव.एनआईसी.इन (mygov.nic.in) नामक पोर्टल के रूप में फलीभूत होते हुए देख सकते हैं। यकीनन सरकार बदलने के बाद सोच बदली है। यह सोच अर्थव्यवस्था, तकनीक और युवा उमंगों के ज्यादा करीब दिखाई देती है, जमीन से जुड़ाव की भाजपा और आरएसएस की विशेषता को प्रभावित किए बिना।

सोशल मीडिया पर पकड़

भारत में सोशल मीडिया की शक्तियों और प्रभाव से शायद ही कोई अन्य राजनेता उतना परिचित होगा जितने कि नरेंद्र मोदी हैं। काफी हद तक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की ही तरह उन्होंने नए माध्यमों का विलक्षण राजनैतिक, सामाजिक प्रयोग करने में सफलता हासिल की है। उनकी नई परियोजनाएँ तकनीकी माध्यमों के प्रति प्रधानमंत्री की सोच को एक पीढ़ी आगे लेकर आती हैं। ऐसा नहीं है कि पारंपरिक माध्यमों को त्याग दिया गया है। वास्तव में सोशल मीडिया पारंपरिक माध्यमों और प्रशासन के साथ जन-संपर्क, जन-भागीदारी की एक कड़ी बनकर उभर रहा है। वह अपने आप में कोई तकनीकी द्वीप जैसा फेनोमेनन नहीं रह गया है बल्कि मौजूदा व्यवस्थाओं का महत्वपूर्ण तकनीकी, संवादात्मक, पारदर्शी विस्तार है।

पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान सोशल मीडिया ने लोगों की राय को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज भी इस मीडिया की पहुँच भारत की पंद्रह-बीस फीसदी आबादी तक ही है लेकिन एक से दूसरे व्यक्ति तक संदेश पहुँचाने (वर्ड ऑफ माउथ) की प्रवृत्ति उसे प्रभावी बना देती है। फिर पारंपरिक माध्यम भी सोशल मीडिया से ली गई सूचनाओं को प्रमुखता से प्रसारित करते हैं इसलिए उनका प्रभाव और पहुँच बढ़ जाती है। अगर सोशल मीडिया न होता तो क्या निर्भया (दामिनी) के साथ हुए नृशंस बर्ताव का मुद्दा इस तरह देश की आत्मा को झकझोरता? अगर फेसबुक, ट्विटर और मोबाइल संदेश न होते तो क्या अन्ना हजारे के आंदोलन में अनायास ही जुट गया जनसमुद्र इस तरह घरों से बाहर निकलता? अगर तकनीक का मायाजाल न होता तो क्या संसाधन-विहीन अरविंद केजरीवाल दिल्ली की शक्तिमान मुख्यमंत्री को परास्त कर सत्ता में आते? और अगर घर-घर तक सोशल मीडिया की पहुँच न होती तो क्या किसी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के किसी प्रत्याशी के पक्ष में इस किस्म का माहौल बनता?

अगले चरण की तैयारी

कल्पना कीजिए कि जिस अंदाज में सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी का अभियान आम नागरिक के साथ सीधा संपर्क बनाने में कामयाब रहा, क्या उसी किस्म का संपर्क हमारी सरकारें, हमारा प्रशासन, जन-प्रतिनिधि और कानून लागू करने वाली एजेंसियाँ नहीं बना सकतीं? जब कमान श्री मोदी जैसे तकनीक-प्रिय, प्रचार-प्रवीण, मार्केटिंग-दक्ष प्रशासक के हाथ में हो तो क्या सोशल मीडिया का प्रयोग सरकार और आम आदमी के बीच सीधे संपर्क के माध्यम के रूप में नहीं हो सकता? सोशल मीडिया ने जिस तरह की निर्णायक भूमिका इन चुनावों के दौरान निभाई है, क्या चुनावों के बाद उसका टेम्पो बरकरार नहीं रखा जा सकता? क्या उसकी तेज-रफ्तारी और दोतरफा कनेक्टिविटी का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के स्थान पर प्रशासनिक तथा सामाजिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता? नई सरकार का माइगव नामक पोर्टल और मंत्रियों तथा विभागों को सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने का उनका निर्देश इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

अनेक देशों में इस तरह के प्रयोग हुए हैं। अमेरिका के यूटाह प्रांत की सरकार आम लोगों के विचार जानने के लिए एक दर्जन से अधिक सोशल मीडिया टूल्स का इस्तेमाल करती है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा गूगल हैंगआउट्स पर आम लोगों के साथ चैट करते हुए उनके विचार जानने की कोशिश करते हैं। हमारे अपने राजनेता भी चुनावों के दौरान इस तकनीक का अच्छा प्रयोग कर चुके हैं। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र अपने आँकड़े उपलब्ध कराने के लिए मोबाइल ऐप्स जारी कर चुके हैं। भारत में भी माईगव नामक पोर्टल से बड़ी शुरूआत की उम्मीद की जानी चाहिए जहाँ आम लोग और विशेषज्ञ जरूरी मुद्दों पर अपने विचार, सुझाव, शिकायतें, जरूरतें आदि को सरकार तक पहुँचा सकते हैं। इस तरह के फीडबैक को 'सक्षम अधिकारियों' और विशेषज्ञों के साथ साझा किया जाएगा ताकि उनके आधार पर जरूरी बदलाव किए जा सकें। नए विचारों पर आधारित नई परियोजनाएँ बन सकें। अर्थव्यवस्था और प्रशासन में उत्साह और तेजतर्रारी लाई जा सके। अब तक सरकार की खिड़कियाँ बंद थीं। लेकिन अब उसने खिड़कियाँ खोलना शुरू किया है। इसकी शुरूआत सूचना के अधिकार से मानी जा सकती है। नई सरकार के सोशल मीडिया अनुप्रयोग उसे नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। कम से कम लक्ष्य तो वही है।

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