रचनाः नरेन्द्र कोहली
तिथिः 21 मार्च 2013
श्रेणीः  मेहमान कोना
टैगः  व्यंग्य

लब्बोलुआबः

हिन्दी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास की विधा को प्रारंभ करने का श्रेय श्री नरेन्द्र कोहली को ही जाता हैं। उन्होंने पुराणों पर आधारित साहित्यिक कृतियों की रचना कर लेखन की दुनिया में एक नई विधा का सूत्रपात किया। 1975 से वह हिन्दी साहित्य को अपनी लेखनी की अविछिन्न धारा से समृद्ध करते आ रहे हैं, इसलिए समकालीन आधुनिक हिन्दी साहित्य की यह अवधि कोहली युग के नाम से भी जानी जाती है। कालजयी कथाकार कोहली जी की अब तक लगभग 76 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें कहानी, उपन्यास के साथ−साथ आलोचना, व्यंग, नाटक, संस्मरण व निबंध शामिल हैं। महासमर, तोड़ो कारा तोड़ो, अभ्युदय, क्षमा करना जीजी, अभिज्ञान, हत्यारे, आत्मा की पवित्रता, युद्ध एवं त्रासदियां उनके बहुचर्चित संस्करण हैं।

हम दिल्ली वाले हैं...

- नरेन्द्र कोहली

वह लड़के-लड़कियों का एक दल था। वे लोग उसको ग्रुप कहते थे; किंतु उनका व्यवहार एक रेवड़ के समान था। हाथों में गिलास लिए हुए, एक दूसरे से लिपटे-लिपटाते वे झूम रहे थे। या तो कपड़ों का होश नहीं था या फिर जानते-बूझते वे नंगई का आनन्द ले रहे थे।

''यह सब क्या है ?'' मैंने एक लड़के से पूछ ही लिया।

किंतु उत्तर एक लड़की ने दिया। वह आगे बढ़ी थी या धकेल दी गई थी, मैं स्वयं समझ नहीं पाया था। बस झूमती-झामती या गिरती-पड़ती मेरे सामने आ गई थी। मन हुआ कि उसे सहारा दूं; किंतु उसकी आवश्यकता नहीं पड़ी। कई लड़कों ने स्वयं गिरते हुए भी उसे गिरने से बचा लिया था।

''क्या है ?'' उस लड़की ने अकड़ कर पूछा।

''यह सब क्याह है ?'' मैंने अपना प्रश्नू दोहरा दिया।

''यह सब माने ?'' उस लड़की ने नशीली आंखों से मेरी ओर देखा, ''मस्ती। है। नए वर्ष की मस्ती है। तुम नहीं जानते ?''

''मुंबई में आतंकी आक्रमण में कितने लोग मरे। कितने घायल हुए। कितने अनाथ हुए।'' मैंने कहा, '' उससे पहले वही दिल्लीं में हुआ। उसके कारण तुम्हारे मन में कहीं शोक नहीं है कि नए वर्ष के बहाने शराब पीने ओर सार्वजनिक रूप से लिपटन-लिपटाई का खेल खेलने यहां चले आए।''

''हम दिल्ली वाले हैं।'' उसने झूम कर जोर से कहा, ''दिल्ली वाले हैं। हैं, दिल वाले हैं। हम उन आतंकियों को बता देना चाहते हैं कि हम उनके कायरतापूर्ण आक्रमणों से डरते नहीं हैं। हम सामान्य रूप से अपनी मस्ती मनाएंगे। खाएंगे, पिएंगे, नाचेंगे, गाएंगे। पटेंगे, पटाएंगे। हम नहीं डरते उन आतंकवादियों से ... वे मार लें, जितने भी लोगों को मार सकें। हम उनके भय से नाचना-गाना, पीना-पिलाना छोड़ नहीं देंगे ...''

वह जोश में गिरने-गिरने को थी कि उसके साथी लड़कों ने उसे थाम लिया। वह न भी गिरती, तो भी वे उसे थाम लेते। वे दसे थामने के लिए ही तो इतनी रात गए, घर से बाहर यहां, अपने बाप का पैसा शराब पर बहा रहे थे ...

''तुम्हारे मन में तनिक भी करुणा और शोक नहीं है। अपने देश के अपमान पर आहत नहीं हो तुम लोग ?'' ''हम वीर लोग हैं।'' एक लड़का बोला, ''हमें शराब मिल जाए तो हम लाशों पर बैठ कर भी नया वर्ष मना सकते हैं।''

''मनाओ। प्रत्येक वर्ष मनाते ही हो; किंतु इस वर्ष।...'' मेरे गले में कुछ अटकने लगा था, ''राष्ट्री य स्वाभिमान के नाम पर कोई तो भाव होगा, तुम्हांरे मन में भी। थोड़ा दुख, थोड़ा शोक, थोड़ी पीड़ा ...।''

''पागल हो तुम।'' उनमें से एक लड़का बोला, ''दिल्ली वालों का दिल नहीं देखते। कैसे साहस से हम अब भी शराब पी रहे हैं। नाच रहे हैं, गा रहे हैं। हम नहीं डरते किसी से ।''

''यह तुम्हारा साहस है या अपने देश और मानवता के प्रति तुम्हारी उदासीनता।'' मैंने कुछ आवेश में कहा, ''लोगों के घर में शोक पसरा है और ...''

''पी ले गुरु, हमारे खर्चे पर ही पी ले। '' उनमें से एक लड़का बोला, '' तेरा भी राष्ट्रीय स्वाभिमान थिरकने लगेगा।''

''इनमें से एक भी लड़की तुझ से लिपट गई, तो तेरा सारा आतंकवाद पिघल जाएगा।'' दूसरा लड़का खिलखिला रहा था, ''जब तक नहीं लिपटती ...''

''निर्लज्ज हो तुम लोग।''

''हम निर्लज्ज हैं।'' उनमें से एक कुछ संभले हुए स्वर में बोला, ''और वे टी.वी. चैनल्स वाले बहुत सलज्ज हैं, बहुत राष्ट्राभिमानी हैं, जो दिल्ली-मुंबई के खुले हुए बाजार, कार्य करते हुए कार्यालय, भागते-दौड़ते लोग और नाचती हुई बार-बालाएं दिखा कर गला फाड-फाड़ कर चिल्लासते हैं कि दिल्ली -मुंबई वालों का साहस देखो। वे नहीं डरते किसी से। वे क्या कर रहे होते हैं ?''

वह दहाड़ कर बोला, '' वे संसार को देश का कौन सा रूप दिखा रहे होते हैं ? वे तो समाज के मार्गदर्शक हैं।''

मैं चुप हो गया। क्या कहता। जो आंखें साहस और जड़ता में अंतर नहीं कर सकतीं, पर-दुख-कातरता और आत्म केन्द्रीयता में भेद नहीं कर सकतीं; वे देश के लिए सपने देखने और देश के हृदय की धड़कनों को सुनाने का दावा करती हैं।

संगत दानिशमंदों की
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