रचनाः तरुण विजय
तिथिः 21 मार्च 2013
श्रेणीः  मेहमान कोना
टैगः  निबंध

लब्बोलुआबः

तरुण विजय हिंदी के साहित्यिक और भाषायी संस्कारों से समृद्ध बिरले संसद सदस्यों में से एक हैं। पत्रकारिता और साहित्य सृजन का लंबा अनुभव और राजनेता के रूप में संघर्ष और जन-संपर्क का अनवरत सिलसिला उनकी रचनात्मकता को बहुआयामी और विलक्षण बनाता है। इलाहाबाद में महाकुंभ से लौटकर उनकी एक प्रखर टिप्पणी।

महाकुम्भ में भारतमाता

- तरुण विजय

पांव में चप्पल नहीं, सर पर गठरी, हाथों में पोते−पोती की अंगुलियां और अम्मा चली जा रही थीं कुम्भ स्नान के लिए संगम की ओर। उनकी आंखें सिर्फ त्रिवेणी देख रही थीं। बच्चों के दादा और माता−पिता झोले में कुछ खाने का सामान और कुछ जोड़ी कपडे़ लिए एक हाथ में चप्पल थामें, नंगे पांव ही अम्मा के साथ त्रिवेणी घाट की ओर बढ़े जा रहे थे। रास्ते में कीचड़, धूल, सर पर तपता सूरज और इर्द−गिर्द लाखों लोगों की भीड़।

उन्हें किसी का कुछ भान नहीं था। वे महाकुम्भ के लिए आए। कैसे रेलगाड़ी में बैठे होंगे, उससे पहले टिकट के लिए कितनी देर लाइन में खड़े रहे होंगे, प्रयाग स्टेशन पर रेलगाड़ी से बच्चों को सही सलामत उतारते हुए कितना आस−पास के यात्रियों का दबाव अपने कंधों और बाहों पर झेला होगा और फिर प्लेटफार्म से बाहर सड़क तक आने के लिए कितनी भयानक मशक्कत की होगी और फिर पूछ−पूछ कर त्रिवेणी घाट की ओर पइयां−पइयां चले होंगे, इसका अंदाजा वे लोग नहीं लगा सकते, जो मेले में जहां−तहां अपनी नेतागिरी की फोटुएं छापते हुए होर्डिंग और बैनरों में यह लिखवाए रहते हैं- कुम्भ मेले में आपका स्वागत।सच यह है कि वे तमाम लोग बेईमान हैं। उनका कुम्भ मेले में आने वालों का स्वागत करने से मीलों-मील तक का कोई सरोकार नहीं होता। ये तो कुम्भ मेले का इस्तेमाल करते हैं अपनी बिगड़ी हुई छवि मीडिया में कुछ चमकाने, कुछ सुधारने के लिए।

महाकुम्भ का स्नान तो उस अम्मा का होता है जो दुनियाभर की आपदाओं के सामने हिम्मत के साथ खड़े होते हुए बिना तम्बू और रिजर्वेशन का एडवांस इन्तजाम किए बच्चों और पोतों को त्रिवेणी घाट तक लाने का साहस करती है। भारतमाता का दर्शन न किया हो, तो कुम्भ नहाने आयीं इन मइया के पांव छू लीजिए। वहीं भारत स्नान हो जाएगा।

कुम्भ नहाने कौन कहां से आया, किस जाति का है, किसको क्या पता? कोई तमिलनाडु से है, या आसाम, अरुणाचल या गुजरात से या अंडमान, नेपाल या अमरिका से, वह ब्राह्मण है कि ठाकुर या यादव अथवा बाल्मीकि और तांग, मणिपुर या बस्तर का जनजातीय। त्रिवेणी तो सबको नहला देती है। समरसता का सबसे बड़ा संगम मंत्र ही त्रिवेणी में मिलता है। यह किसी को परवाह नही है कि आप कितने अमीर है या कितने गरीब। आप अपने शानदार और लक्जरी स्विस तंबुओं में फिल्मस्टारों के साथ कुम्भ स्नान के लिए रुके हैं या त्रिवेणी घाट के आसपास पुआल बिछाकर धर्मादा तम्बुओं में रातभर कीर्तन और भजन करते हुए पुण्य पा रहे हैं। किसी को यह देखने या उसकी समीक्षा करने की फुर्सत नहीं है।

चीन, जापान, कोरिया या अमेरिका या यूरोपीय देशों से आए पत्रकार या फोटोग्राफर हो अथवा नए श्रद्धालु। वे फोटो खींचते रहे तो खींचते रहें, सन्यासियों का नग्न−अर्धनग्न, वीडियो उतारते रहे तो उतारते रहे, किसी की दृष्टि में क्या छिपा है। और कौन कुम्भ आने वाले करोड़ों हिन्दुओं को किस तरह से देख रहा है, यह भी वह स्वयं या उसका भगवान जाने। हम तो बस अपनी गंगा मइया, अपने सीताराम, अपने शिवशंकर भोलेनाथ में ही मगन हैं। हमारा विश्व यही है−कुम्भ। और यही कुम्भ हममें समा गया है। हर यात्री जो श्रद्धा लेकर यहां आया स्वयंभू कुम्भ बन बैठा, वह भारत हो गया।

हजारों वर्ष की यह परम्परा, उस परम्परा में उठा हुआ अपना यह भारत वर्ष जिसमें वेद हैं, पुराण है, माता जानकी हैं, वनवासी राम हैं, गोवर्धनधारी कन्हैया है, तो भस्म शरीर पर लपेटे जटाधारी पिनाकपाणि भोलेनाथ हैं। इस माटी में उठे अगर बुद्ध और महावीर हैं तो आदिशंकर भी हैं, बाल्मीकि हैं तो कृष्ण को दीवार तोड़कर अहंकारी ब्राह्मणों का मान मर्दन करते हुए दर्शन देने पर मजबूर करने वाले कनकदास भी हैं। या चांडाल, श्वान में उसी गोविन्द का दर्शन करने वाले शंकराचार्य परम्परा के संत हैं, तो गुरुनानक और तीर्थंकर भी हैं। यहां मंथन है, चिंतन है जिज्ञासा है, मतभेद हैं तो उनका समाधान भी है। यहां यम का सत्य भी यदि विद्यमान है तो उसको ललकारने वाले नचिकेता का वीर वैराग्य भी है। यहां वह सब कुछ है जो भारत को भारत बनाता है। कुंभ का सत्व भारत का भारततत्व है। यहां जो आया वह निहाल हुआ, जो नहीं आ पाया और मात्र स्मरण ही कर पाया वह भी निहाल हुआ। जिसने श्रद्धा से कुम्भ देखा वह भी सत्व पा गया। और जिसने मात्र निर्धार्मिक कौतूहल से ही कुम्भ को देखा, जानने का प्रयास किया वह भी अपने उस सत्व की ओर पहुंचा जो उसने अपने लिए निर्धािरत कर रखा होगा।

अगर सरकार पूरी तरह से भी इस भारत उत्सव से अनुपस्थित रहती तो भी तो कुम्भ होता ही और ऐसा ही होता। वे कितने बौने, क्षुद्रऔर गर्वोमत राजनीति के खिलाड़ी हैं, जो कहते हैं उन्होंने इतनी रेलगाडि़यां चला दीं, कितने हजार पुलिसकर्मियों और तंबुओं का बंदोबस्त किया या ये सुविधा दी या वो सुविधा दी। भाड़ में गया तुम्हारा बड़ा पद और तुम्हारी सुविधाएं। क्या कुम्भ में आने वाले हिन्दू श्रद्धालु तुम्हारी इस सुविधाओं और घोषणाओं के भरोसे आते हैं? सारी दुनिया की सरकारें और ताकतें भी इकट्ठा हो जाएं तो भी वे ऐसा कोई कृत्रिम आयोजन भी नहीं कर पाएंगे, जैसा हजारों सालों से भारत की मिट्टी और हवा स्वतरू अपनी ताकत से अनवरत करती आ रही है।

यह हिन्दू की शक्ति है। यह उस भारत की शक्ति है जो सनातन धर्मी है, यह उस जमीन की ताकत है जो सेक्युलरवाद के मिलावटी प्लास्टिक−पालीथीन की थैली की जहर बुझी चमक से दूर, गंगा, यमुना, कावेरी और सिंधु को जीती है। आपकी बहसें आपको मुबारक। आपके झंडे आपको मुबारक। हम तो संगम स्नान को चले।

चारों तरफ अखिलेश यादव के होर्डिंग थे। तना हुआ चेहरा, गर्वीली उक्तियां। कुम्भ में आने वालों का स्वागत करने की जाहिर मंशा से लगाए गए मोहम्मद आजम खां के बड़े−बड़े बैनर थे−स्टाइल कुछ ऐसा था दोनों हाथों से धूप का चश्मा पकड़ा हुआ है, आंखें कहीं और देख रही हैं और बोर्ड पर लिखा है−आपका स्वागत है। हम तो भीग गए इस भावभीनी स्वागत को देखकर। ये हिन्दू ही है कि जिनकेसबसे बड़े आयोजन का सरकारी परभारी कोई ईसाई या मुसलमान भी हो जाए तो भी वे संगम की ओर यूं बढ़ते ही चले जाते हैं, मानो कह रहे हों कि हमें तुम्हारे परभारी से मतलब ही क्या? तुम किसी को भी बना दो हम तो गंगा स्नान को चले। ये सारी बातें तो राजनीति की फाइलों के लिए ही होती हैं, कुम्भ से उनका कोई सरोकार थोड़े ही होता है। कुम्भ में वे अपनी फोटुएं लगाते हैं, अपने फायदे के लिए, उससे कुम्भ का भला कहां होता है।

हम महाकुम्भ स्नान कर आए। 144 साल के बाद यह महाकुम्भ आया था। गंगा मइया से यही प्रार्थना की कि मइया अगले 144 साल बाद जब अगला महाकुम्भ आए तब हमें भारतवासी ही बनाना। सारी दुनिया का सुख, वैभव, विद्या और सैन्य शक्ति एक ओर अपने भारत का यह जल, यह हवा, ये लोग और अपनी परम्परा का सनातन सुख दूसरी ओर। हारी भारत की इस मिट्टी का कण ही होगा, बाकी सारी दुनिया के आगे, जो यहां है वह कहीं नहीं। जो यहां नहीं उसकी चाह नहीं। यह विराटता जो भारत की मइया के आंचल में वह और कहां!

वे लोग बौने और हेय है, जो इसे पहचान नहीं पाते और कुम्भ की भीड़ को वोट के तराजू पर आंकते हैं। इस बार कुम्भ में सरकारी व्यवस्था ऐसी थी कि यह कहने को मन हुआ कि भगवान न करे कि अगर कभी इस्लामी सरकार भी होती तो वह भी इससे बेहतर व्यवस्था करती। पूरा शहर गंदगी का ढेर बनाकर रख दिया, जिस प्रयाग का कुम्भ सम्राट हर्षवर्धन की दान वीरता से सुगंधित हुआ था उसी सम्राट की प्रतिमा प्रयाग का सबसे गंदा स्नान बन गए। उनकी भुजाओं को लपैटते हुए पुलिस निगरानी चौकी बना दी गयी, जिन्हें श्रद्धालु भी अचिनेह श्रद्धालु की मृत्यु हो गयी जो उसकी निरजीव देह को बिना कफन तक लपेटे उसे बाजार से ले जाया जा रहा था, कुम्भ नगर में चारों तरफ कीचड़ और कचरा बिखरा हुआ था, कभी किसी पुल से यातायात बंद किया जा रहा था तो कभी दूसरे पुल से, लेकिन किसी वीर पुलिसकर्मी के पास यह बताने का कोई साधन नहीं था कि किस पुल से यातायात जारी हो गया है, वे यह कहते थे कि जाओ 16 नम्बर से देख लो या 14, शायद वहां खुला हो। धूल, परेशानी और धूप में लिपटे यात्री चुपचाप आगे बढ़ जाते। स्टेशन पर 36 लोगों के मरने के बाद थोड़ी बहुत सुरक्षा और सहायता व्यवस्था दिखने लगी। 12 साल पहले पता था कि कुम्भ इस साल और इस तारीख को शुरू होगा। लेकिन कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हुई, जिससे लगे कि दुनिया का सबसे बड़ा हिन्दू आयोजन इस हिन्दू बहुल देश की वरीयता सूची में प्रमुख स्थान रखता है। इससे ज्यादा गंभीरता और संजीदगी से ये लोग सैफई महोत्सव या कांग्रेस अधिवेशन कर डालते हैं।

यह मानसिकता भारत पर सेक्युलरवादी प्रहार है। और ये लोग उन हिन्दुओं को भी सेक्युलरवाद सिखाने चले हैं, जिनकी विराटता नेसहस्रशताब्दियों पूर्व घृणा को रौंद बर्बर विजेताओं के दर्प पर अट्टहास करना सिखा दिया था, जिसने प्रयाग का नाम इलाहाबाद होते भी देखा और वह दृश्य भी झेल लिया कि जब प्रयाग का नाम पुनरू प्रयाग रखने का प्रस्ताव हुआ तो उसका विरोध भी उन सेक्युलर हिन्दुओं ने यह कहते हुए किया कि अगर प्रयाग का नाम पुनः प्रयाग रखेंगे तो इससे मुसलमान नाराज हो जाएंगे। उस भारत में कुछ वक्त और इन आत्मदैन्य और दास मानसिकता सेक्युलर राजाओं का राज भी झेल लिया जाएगा, जो इस विराट भारत के सनातनकाल प्रवाह में अणु के सहस्त्रांश से भी छोटा और नगण्य होगा।

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