Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 20 मार्च 2013
श्रेणीः  जीवनशैली
प्रकाशनः प्रभासाक्षी.कॉम
टैगः  समाज

लब्बोलुआबः

हमें अपने आप पर शर्म आनी चाहिए कि हम आज तक अपने पूर्वोत्तरवासी भाई-बहनों को इस बात के लिए आश्वस्त नहीं कर सके कि वे अपने गाँव, शहर या राज्य से दूर अपने नए शहर में भी पूरी तरह सुरक्षित हैं। हम आज तक उन्हें यकीन नहीं दिला सके कि हम उन्हें किसी 'अलग' दृष्टि से नहीं देखते और उन्हें 'अकेला' और 'असहाय' नहीं समझते।

Summary:

If North-Eastern students and people feel unsafe in other parts of our country, we Indians need to seriously introspect our behaviour towards them. It is a shame that even after six decades of India's independence a section of people feel unsafe while visiting other parts of their own country.
पूर्वोत्तरवासियों के असुरक्षा बोध में किसका कितना हिस्सा

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

पूर्वोत्तर भारतीय छात्र और लोग अगर खुद को भारत के दूसरे हिस्सों में असुरक्षित महसूस करते रहे हैं तो इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है। सिर्फ इन शहरों में ही क्यों, भारतीय राजनीति और कारोबार के केंद्रों- दिल्ली और मुंबई में भी वे अपनी हिफाजत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। ऐसा नहीं कि कमजोर हैं। ऐसा भी नहीं कि संसद, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की तरफ से की जाने वाली अपीलें और सुरक्षा के आश्वासन उन तक नहीं पहुँच रहे। इन सबके बावजूद यदि वे अपने ही देश में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो इसकी कोई खास, बड़ी वजह होनी चाहिए। वह वजह है उत्तर-पूर्व के नागरिकों को महानगरों में मिलने वाली उपेक्षा, अकेलापन, भेदभाव, प्रताड़ना, छींटाकशी, शोषण, ठग लिए जाने तथा अपराधों के शिकार हो जाने के दशकों से चले आए अनुभव। मौजूदा सामाजिक संकट के लिए वे लोग तो जिम्मेदार हैं ही जो मोबाइल फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल कर अफवाहें फैला रहे हैं, मनोवैज्ञानिक अत्याचार कर रहे हैं, लेकिन खुद हम नागरिक, हमारी सरकारें, प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियाँ भी इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं।

ऐसा बेवजह नहीं है कि आप अपने शहरों की सड़कों पर उत्तर-पूर्वी युवकों और युवतियों को अपने अलग समूह में देखते हैं। उनके मित्रों में गैर-पूर्वोत्तर लोगों की संख्या न्यूनतम होती है तो इसकी भी कोई वजह होगी। सिर्फ संकोची होना, एकाकीपन पसंद करना या सामाजिकता का अभाव इसका कारण नहीं हो सकता। यदि वे सामाजिक न होते तो पूर्वोत्तर के दूसरे लोगों से भी नहीं मिलते-जुलते। इसकी वजह है वह असुरक्षा बोध जो हम दिल्ली, लखनऊ, गुड़गाँव, मुंबई और दूसरे शहरों के लोगों ने उन्हें प्रदान किया है। हमें अपने आप पर शर्म आनी चाहिए कि हम आज तक उन्हें इस बात के लिए आश्वस्त नहीं कर सके कि वे अपने गाँव, शहर या राज्य से दूर अपने नए शहर में भी पूरी तरह सुरक्षित हैं। हम आज तक उन्हें यकीन नहीं दिला सके कि हम उन्हें किसी 'अलग' दृष्टि से नहीं देखते और उन्हें 'अकेला' और 'असहाय' नहीं समझते। वे बस, मेट्रो, सड़क, दुकानों, स्कूल-कॉलेजों, पुलिस थानों, रेस्टोरेंटों, ऑटो-रिक्शा, किराए के मकानों और सरकारी दफ्तरों तक में एक अजीब सी निगाह से देखा जाना तथा शोषण व भेदभाव का शिकार होना उनकी जीवनचर्या का हिस्सा है। उनके साथ भेदभाव, बदसलूकी, जुल्म और अपराध पर ढंग से कार्रवाई नहीं होती। अपने हर संकट का मुकाबला उन्हें अकेले करना पड़ता है क्योंकि न पुलिस, न ही प्रशासन और न नागरिक उनके साथ खड़े होने वाले हैं। ऐसे में किस आधार पर वे खुद को सुरक्षित मानें? सिर्फ आश्वासनों और वायदों के आधार पर?

अफसोस कि दूसरों की शांति को कभी भंग न करने वाले हमारे उत्तर-पूर्वी भाई-बहन निराशा और आशंकाओं के शिकार होकर घर लौट रहे हैं। अगर हम बाकी देश के लोगों में इंसानियत, भारतीयता और भाईचारे की भावना शेष है तो आज हमें एक बेहतरीन मौका मिला है जब हम घर लौटने वाले अपने इन साथियों को रोकें। लेकिन सिर्फ इन खोखले सरकारी वायदों के आधार पर नहीं कि वे सुरक्षित हैं। आज जरूरत है हमें उनके साथ खड़े होने की। उत्तर पूर्व से जुड़े अपने हर सहकर्मी, सहपाठी, पड़ोसी, सहयात्री तथा अपने मोहल्ले या कॉलोनी में रहने वाले व्यक्ति की सुरक्षा के लिए एक अभेद्य दीवार बन जाइए। उन्हें यकीन दिलाइए कि वे भी आपमें से ही एक हैं। उन्हें यकीन दिलाइए कि स्कूल के दिनों में असेंबली के दौरान ली गई 'समस्त भारतीय मेरे भाई बहिन हैं' की शपथ कोई रस्म-अदायगी नहीं थी और वह करने के लिए तैयार रहिए जो आप अपने भाई-बहिन के लिए कर सकते हैं। क्योंकि जैसा कि पेस्टर नीमोलर की कविता (नीचे) में लिखा है, ऐसा करके आप उनकी नहीं बल्कि खुद अपनी हिफाजत कर रहे हैं।

चुप्पी के विरुद्ध

First they came for the Jews and

I did not speak out

because I was not a Jew.

Then they came for the Communists and

I did not speak out

because I was not a Communist.

Then they came for the trade unionists and

I did not speak out

because I was not a trade unionist.

Then they came for me and there was no one left

to speak out for me.

- Pastor Niemoller

आपराधिक किस्म की इस सामाजिक चुप्पी में हिस्सेदारी करने वाले हम लोगों को रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों को भी नहीं भूलना चाहिए-

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।

कुछ असहज सवाल

पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में कुछ असहज सवालों के जवाब ढूंढने का भी यह मुफीद समय है। क्या कारण है कि पूर्वोत्तर में होने वाली विदेशी घुसपैठ हमारी सरकारों के लिए कोई मुद्दा नहीं है? प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और भाजपा नेता जसवंत सिंह जैसे नेता, जो किसी न किसी रूप में पूर्वोत्तर भारत के मतदाताओं का समर्थन पाकर संसद में पहुँचे हैं, आज उन्हीं मतदाताओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिए एक जुनून की तरह जनसंपर्क का सिलसिला नहीं शुरू करते? क्या कारण है कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में विपक्षी दलों का समर्थन पाने वाले पीए संगमा, जो स्वयं को उत्तर पूर्व के आदिवासियों का उम्मीदवार करार देते रहे, अपने राजनैतिक संबंधों और संपर्कों का इस्तेमाल करते हुए उस क्षेत्र की जनता के 'एम्बेसडर' के रूप में सक्रिय होकर हर उस जगह पर पहुँचते जहाँ ये लोग खुद को असुरक्षित मान रहे हैं? क्या कारण है कि भारत के प्रधानमंत्री और संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री उनकी सुरक्षा को निजी दायित्व के रूप में नहीं लेते? क्यों इस देश के गृह मंत्री तुरंत उन लोगों के पास पहुँचकर उन्हें आश्वस्त नहीं करते? आखिर क्यों प्रभावित इलाकों में भारी सुरक्षा तैनाती और फ्लैग मार्च नहीं हो रहे? बंगलुरु से लौट रहे एक युवक ने कितना सही कहा है कि हमें हर कोई रुक जाने को कह रहा है लेकिन हम सुरक्षित कैसे महसूस करें जब रेलवे स्टेशन तक पर (जहाँ हजारों उत्तर पूर्वी नागरिक मौजूद हैं) दस पुलिसवाले भी दिखाई नहीं दे रहे! जबानी जमाखर्च राजनीति के लिहाज से तो ठीक है, लेकिन हकीकत के हिसाब-किताब में उसका मोल शून्य से बहुत अधिक नहीं है।

फिर भी, इस बार लगता है कि हमने कुछ सबक सीखे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों ने कम से कम यह तो दिखाया है कि वे इस उभरते हुए संकट की गंभीरता से वाकिफ हैं। संसद पर सबने एक स्वर में उत्तर भारतीयों की सुरक्षा की बात कही है, फेसबुक-ट्विटर और एसएमएस पर अंकुश लगाने का कदम उठा है, वापसी को आतुर लोगों की मदद के लिए रेलगाड़ियाँ लगाई गई हैं, अफवाह फैलाने वाले कुछ लोग गिरफ्तार हुए हैं और पुलिस अधिकारियों ने भी अपने शहरों में पूर्वोत्तर भारतीयों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता और मुस्लिम संगठनों के लोग भी आगे आकर सद्भाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। बाल ठाकरे और राज ठाकरे ने मुंबई की हिंसा के जवाब में कोई आक्रामक कदम नहीं उठाया है। असम के मुख्यमंत्री और दूसरे स्थानीय नेताओं ने सकारात्मक बयान देकर, आशंकित पूर्वोत्तर भारतीयों में विश्वास पैदा करने की कोशिश की है। असम के कुछ मंत्री बंगलुरु भी पहुँचे हैं।

यह सुखद है। लेकिन बहुत कुछ और किए जाने की जरूरत है क्योंकि समस्या की मूल जड़ को नष्ट किए बिना सिर्फ उसके लक्षणों को समाप्त किया जा सकता है और वह भी थोड़े समय के लिए। सबसे ज्यादा जरूरी तो इस बात का उद्घोष करना है कि देश हर एक नागरिक के जीवन का मूल्य समझता है और वह अपने नागरिकों की हिफाजत के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। अपने लोगों की सुरक्षा में नाकाम राष्ट्र और समाज, भले ही कितनी भी भौतिक तरक्की क्यों न कर लें, इतिहास की किताब में महज औपचारिकता के लिए दर्ज होते हैं।

यह तो हुई व्यवस्था की बात, लेकिन नागरिकों के तौर पर हमें भी संवेदनशील होना सीखना है। हमें सिद्ध करना होगा कि हमें इस बात का अहसास है कि खुद को किसी भी दूसरे भारतवासी से श्रेष्ठ समझने का हक हमें किसी ने नहीं दिया। न ईश्वर ने और न ही लोकतंत्र ने। माना कि सामाजिक अन्याय के मामले में हमारा रिकॉर्ड अस्पृश्यता के स्तर तक खराब है, लेकिन देर से ही सही हम अपने आपको बदलकर रहेंगे। सिर्फ मौजूदा संकट के गुजर जाने तक ही नहीं बल्कि हमेशा के लिए।

लीक से हटकर
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