Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 20 मार्च 2013
श्रेणीः  पर्यावरण
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  स्वास्थ्य

लब्बोलुआबः

आशंका है कि बीटी बैंगन का प्रयोग करने वाले लोगों के फेफड़ों और गुर्दों पर दुष्प्रभाव हो सकते हैं और जमीन की उपजाऊ क्षमता घट सकती है। यह भी संभव है कि दो−चार फसलों के बाद कीटाणुओं में इस बैंगन के आंतरिक तत्वों की प्रतिरोध क्षमता पैदा हो जाए और वे पहले से अधिक मजबूत होकर हमला करने लगें।

Summary:

While India is encouraging farmers to grow BT bringal, some scientists in the western countries have come out openly against the genetically modified vegetable citing its harmful effects on human health.
हमारी आने वाली पीढ़ियों को भारी न पड़े बीटी बैंगन

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

बीटी कॉटन (2002) की बुवाई के नफे−नुकसान पर बहस अभी खत्म भी नहीं हुई और भारत का राजनीतिक, वैज्ञानिक और कृषक समाज बीटी बैंगन को लेकर विभाजित हो गया है। बीटी बैंगन के भारी विरोध के मद्देनजर पर्यावरण मंत्रालय ने उसकी व्यावसायिक बुवाई पर बेमियादी रोक लगाकर वाहवाही लूट ली है मगर मौजूदा हालात में संभवतः उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था। तेरह राज्य इसके लिए तैयार नहीं थे। ऊपर से पर्यावरण लॉबी, मीडिया, किसान संगठन, देसी−विदेशी वैज्ञानिक, अंतरराष्ट्रीय संगठन और कुछ केंद्रीय मंत्री भी। यदि इसके बावजूद बीटी बैंगन की बुवाई को मंजूरी दे दी जाती तो कोपेनहैगन करार और हिमालय के ग्लेशियरों संबंधी विवाद को लेकर पहले ही सार्वित्रक आक्रोश झेल रहे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की स्थिति और भी विकट हो जाती। अंततः उन्होंने राजनैतिक दृष्टि से सुविधाजनक वही कदम उठाया जो अनेक यूरोपीय देशों ने किया था− यानी मानवीय स्वास्थ्य पर बीटी बैंगन के प्रभावों का और अध्ययन करने की बात कर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना। ध्यान रहे, यूरोपीय देशों ने लंबे अध्ययन के बाद सभी बीटी उत्पादों पर स्थायी प्रतिबंध लगा दिया है।

इधर भारत सरकार का फैसला न तो बीटी बैंगन से जुड़े विवाद का समापन है और न ही उससे जुड़े पर्यावरणीय एवं सुरक्षा संबंधी मुद्दों का समाधान। भले ही फौरी तौर पर इसका स्वागत किया गया हो, बड़ी अजीब बात है कि इससे दोनों ही पक्ष असंतुष्ट हैं। जहां बायोकान की प्रमुख किरण मजूमदार शॉ के अनुसार इससे भारत में जैव प्रौद्योगिकी को करारा आघात लगा है वहीं ग्रीनपीस जैसे संगठनों की राय में यह इस मसले का स्थायी समाधान नहीं है। कुछ साल बाद यही विवाद फिर उठ खड़ा होगा। कुछ साल का अर्थ यहां कम से कम छह साल है। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) के सदस्य और प्रसिद्ध वैज्ञानिक पीएम भार्गव के अनुसार बीटी बैंगन संबंधी स्वतंत्र परीक्षणों के लिए विशेष प्रयोगशाला के निर्माण में कम से कम इतना समय लगेगा। वह भी तब जब यह काम तुरंत शुरू हो जाए। तब तक तो चुनाव होकर नई सरकार आ जाएगी। तब की वह जाने।

ऐसे संगठनों की कमी नहीं है जो जीईएसी पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में पूर्वाग्रहग्रस्त होने का आरोप लगाते हैं। कृषि मंत्री शरद पवार और पूर्व विज्ञान एवं टेक्नॉलाजी मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण के बारे में भी इन संगठनों के बीच ऐसी ही धारणा है। श्री चव्हाण ने खुले आम बीटी बैंगन का समर्थन किया है।

परीक्षण कितने भरोसेमंद

अब यह जगजाहिर हो चुका है कि जुलाई 2009 में श्री चव्हाण ने तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रामदास को बीटी बैंगन से जुड़े स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर जो पत्र लिखा था उसमें दिए गए तथ्य जैव−प्रौद्योगिकी कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय लॉबी इंटरनेशनल सर्विस फार एक्वीजिशन आफ एग्री बायोटेक एप्लीकेशंस (आईएसएएए) की प्रचार सामग्री से लिए गए थे। उधर जीईएसी को देखिए। कहा जाता है कि उसने स्वतंत्र रूप से कोई अनुसंधान नहीं करवाया बल्कि, माहीको और मोनसेंटो नामक जैव−प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा बीटी बैंगन की सुरक्षा के मुद्दे पर किए गए परीक्षणों और अनुसंधान को ही मान लिया है। ऐसे परीक्षण कितने भरोसेमंद हो सकते हैं? माना कि जैव प्रौद्योगिकी जरूरी है, माना कि धरती की बढ़ती आवश्यकताओं के लिहाज से वह भविष्य में कृषि क्रांति का सूत्रपात कर सकती है, मगर इंसानी स्वास्थ्य से जुड़े गंभीर मुद्दों पर फैसला सुनाने वाले जिम्मेदार लोग इतने गैर−जिम्मेदार कैसे हो सकते हैं!

लगता है देर से ही सही, पर्यावरण मंत्रालय को मामले की नजाकत का अहसास हो गया है। इसीलिए जैव प्रौद्योगिकी संबंधी फैसले लेने का अधिकार जीईएसी के हाथ से छीना जा रहा है। मानवता के भविष्य से जुड़े मुद्दों को सिर्फ चंद वैज्ञानिकों के हाथ में छोड़ देना उचित भी नहीं था, खास कर तब तो बिल्कुल नहीं जब वे इन मामलों के संबंधित पक्षों के साथ किसी न किसी रूप में जुड़े हों। अब यह समिति सिर्फ मूल्यांकन का काम करेगी और मंजूरी का जिम्मा सरकार का होगा। हालांकि 'सरकार' एक व्यापक शब्द है। बेहतर हो, यदि यह काम करने के लिए बाकायदा एक वैधानिक संस्था बना दी जाए जो जैव−प्रौद्योगिकी से जुड़े मुद्दों पर निर्णय का अधिकार रखती हो। इसमें वैज्ञानिकों के अलावा कृषि, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ, राज्यों के प्रतिनिधि, कारोबारी प्रतिनिधि और राजनेता भी हो सकते हैं। जैव प्रौद्योगिकी एक तेजी से उभरती तकनीक है जो कृषि, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। यह मानवीय सभ्यता की जरूरत है लेकिन मानवता के लिए उसके दूरगामी एवं अपरिवर्तनशील परिणाम हो सकते हैं। यदि उससे जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर हम अभी से सतर्क नहीं हुए तो आने वाली पीढि़यों को क्या उत्तर देंगे?

यूरोप ने क्यों लगाया प्रतिबंध

रूपर्ट शेल्ड्रेक, जाइल्स एरिक शेरालिनिम और माइकल एंटोनियू जैसे अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक, जो स्वयं जैव प्रौद्योगिकी उत्पादों पर अनुसंधान कर रहे हैं, आनुवांशिक दृष्टि से परिमार्जित फसलों का प्रबल विरोध कर रहे हैं। डॉ. शेल्ड्रेक ने तो बीटी बैंगन का विरोध करते हुए भारत सरकार को पत्र भी लिखा है। मुद्दा बहुत गंभीर है। आशंका है कि इस बैंगन का प्रयोग करने वाले लोगों के फेफड़ों और गुर्दों पर दुष्प्रभाव हो सकते हैं और जमीन की उपजाऊ क्षमता घट सकती है। यह भी संभव है कि दो−चार फसलों के बाद कीटाणुओं में इस बैंगन के आंतरिक तत्वों की प्रतिरोध क्षमता पैदा हो जाए और वे पहले से अधिक मजबूत होकर हमला करने लगें। इतना ही नहीं, किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से बीज खरीदने पर मजबूर होना पड़ सकता है और सामान्य बैंगन की फसल भी प्राकृतिक कारणों (परागण आदि) से बीटी बैंगन के प्रभाव में आ सकती है। लेकिन सकारात्मक बात यह है कि ऐसे बैंगन की पैदावार अधिक होगी तथा वह अधिक स्वस्थ होगा। भारत में जिस दूसरी हरित क्रांति की जरूरत महसूस की जा रही है, बीटी बैंगन उस दिशा में मील का पहला पत्थर सिद्ध हो सकता है।

आइए, समझते हैं कि आखिर यह अवधारणा क्या है। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आजकल आनुवांशिक (जीन्स) कणों को लेकर अनुसंधान हो रहे हंै। हर जीवित वस्तु में जीन्स होते हैं जो उसके जीवन से जुड़े अधिकांश पहलुओं को प्रभावित करते हैं। यदि इंसान जीन्स में संशोधन या परिमार्जन करने की शक्ति पा जाए तो मानव सभ्यता को अधिक स्वस्थ, दीर्घायु एवं क्षमतावान बनाया जा सकता है। यही बात पेड़−पौधों, फसलों, जानवरों आदि पर लागू होती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग या आनुवांशिक अभियांत्रिकी (जीएम) के जरिए ऐसा ही किया जा रहा है। माहीको ने बैंगन में एक खास बैक्टीरिया बैसीलस थरीन्जीनेसिस (बीटी) को प्रवेश कराते हुए उसकी नई किस्म विकसित की है जिसे बीटी बैंगन नाम दिया गया है।

कीटनाशक का कार्य करने वाला यह बैक्टीरिया बैंगन के भीतर मौजूद होने से पौधे कीटों की समस्या से कम पीडि़त होंगे। तर्क दिया जा रहा है कि इससे कीटनाशकों पर आने वाला खर्च घटेगा और पौधों का स्वास्थ्य बेहतर होने के कारण पैदावार काफी बढ़ जाएगी। इस संदर्भ में बीटी कॉटन का उदाहरण दिया जा रहा है जिसके पौधे सामान्य कपास की तुलना में अधिक स्वस्थ थे और उन पर कीटनाशकों का अपेक्षाकृत कम प्रयोग करना पड़ा। लेकिन विडंबना यह है कि विदर्भ के जिन क्षेत्रों में बीटी कॉटन का प्रयोग हुआ उनमें भी किसानों को आत्महत्या पर मजबूर होना पड़ा। माना कि उनकी आत्महत्याओं के पीछे बीटी कॉटन का कोई संबंध नहीं है। मगर वह अपनी 'अच्छी फसलों के जरिए' उन्हें आत्महत्या से रोकने में भी तो सफल नहीं हुई। कहीं बीटी बैंगन भी आगे जाकर हमें पछताने पर मजबूर न कर दे। इसलिए तटस्थ लोगों द्वारा स्वतंत्र प्रयोगशालाओं में परीक्षणों के बाद ही इसे मंजूरी दी जा सकती है। यहां यातायात विभाग का नारा बड़ा सटीक प्रतीत होता है कि 'दुर्घटना से देर भली।'

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