Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 20 मार्च 2013
श्रेणीः  वर्ल्ड वाइड वेब
प्रकाशनः नवभारत टाइम्स
टैगः  प्राइवेसी

लब्बोलुआबः

गूगल की नई प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर तकनीकी विशेषज्ञों, प्राइवेसी के हिमायतियों, कानून के दिग्गजों और राजनीति के पंडितों के बीच हंगामा सा बरपा है। आपकी प्राइवेट जानकारियां अब गूगल के डेटाबेस का हिस्सा बन जाएंगी।

Summary:

Google's new privacy policy has evoked strong reactions from technology experts, privacy activists, legal eagles and political personalities as this exposes your private information for blatent business (mis)use by Google and associates.
इंटरनेट अपनाने के लिए प्राइवेसी खोना ज़रूरी क्यों है

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

गूगल की नई, एकीकृत पॉलिसी कोई तकनीकी चीज़ नहीं है, यह आप−हम जैसे इंटरनेट उपयोक्ताओं को सीधे प्रभावित करेगी। इसके तहत गूगल की तमाम सर्विसेज में आपका दिया ब्यौरा, आपकी इंटरनेट सर्च, आपके देखे मसालेदार वीडियोज, पोर्नोग्राफिक तसवीरें, आपकी ईमेल में आने वाले संदेश, गूगल मैप्स में ढूंढे गए ठिकाने, कैलेंडर में दर्ज की गई तारीखें, गूगल प्लस में हुई बातें और बने दोस्तों का ब्यौरा इकट्ठा करके आपके निजी डेटा का भंडार बना लिया जाएगा। इसके आधार पर आपके बारे में ज्यादातर बातें गूगल को पता चल जाएंगी, जैसे आपका काम, जगह, लिंग, उम्र, पसंद−नापसंद, वैवाहिक स्थित, कामिकाज, इंडस्ट्री, शौक, आर्थिक स्थित, अच्छिाइयाँ, कमजोरियाँ, बीमारियाँ, आपका शिड्यूल, यात्रा की तारीखें, नेट पर खोजी गई तसवीरें, देखे गए वीडियो, देखी गई वेबसाइटें और न जाने क्या−क्या। पहले भी गूगल आपकी जानकारियों पर नजर रखता था, उन्हें सहेजता भी था लेकिन फिर भी अलग−अलग सर्विस में वे अलग−अलग रहती थीं। अब वे सब मिलने जा रही हैं। यानी आँख, नाक, कान, मुँह, सिर, धड़, टांगें.. सब अलग−अलग जरियों से लाकर एक साथ मिलाए जा रहे हैं। इस तरह बन जाएगी आपकी पूरी तसवीर। आप चाहें या न चाहें। जानकारियों का यह भंडार दूसरों के भी हवाले किया जा सकता है, गूगल से बाहर की कंपनियों, संगठनों, लोगों और विज्ञापनदाताओं को भी जो किसी न किसी रूप में गूगल के सहयोगी या एफीलिएट हैं।

नई पॉलिसी को लेकर पश्चिम और पूरब के तकनीकी विशेषज्ञों, प्राइवेसी के हिमायतियों, कानून के दिग्गजों और राजनीति के पंडितों के बीच हंगामा सा बरपा है। आम यूज़र्स की तो बात ही छोड़ दीजिए। आपकी प्राइवेट जानकारियां अब 'प्राइवेट' नहीं रह जाएंगी, बल्कि गूगल के डेटाबेस का हिस्सा बन जाएंगी। सवाल उठे हैं कि गूगल इन सूचनाओं का क्या करेगा? उन्हें कब और किसे मुहैया करा देगा? उनकी कितनी सुरक्षा कर पाएगा? उनके आधार पर आपसे कब और कैसा फायदा उठाएगा? सबसे बड़ा सवाल जो उठा है वह यह कि तब आपकी प्राइवेसी का क्या बचा रह जाएगा?

आपको भी फर्क पड़ेगा

जिन लोगों का कामकाज, दायरा और इंटरनेट सर्फिंग बहुत सीमित है, उन्हें शायद बहुत फर्क़ न पड़े। अगर आप एक आदर्श इंसान हैं, जिसने कभी कोई गलत काम नहीं किया और जिसका सब कुछ ठीकठाक है, उसे भी अपनी सूचनाओं के लीक हो जाने की शायद ज्यादा चिंता न हो। लेकिन दुनिया में सब लोग आदर्श नहीं हैं। सबके पास छिपाने को कुछ न कुछ है।

जो दिन का अच्छा खासा हिस्सा इंटरनेट पर खर्च करते हैं, सोशियल नेटवर्किंग से लेकर ईमेल तक जिनके लिए सिटी ट्रांसपोर्ट से कहीं ज्यादा अहम हैं, जिनके कारोबार में इंटरनेट सर्च की भूमिका है या जो गूगल के एंड्रोइड अएपरेटिंग सिस्टम से युक्त स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं, उन्हें इससे खासा फर्क़ पड़ सकता है। वही क्यों, गूगल टॉक, चैट, जीमेल, यू−ट्यूब, गूगल प्लस, मैप्स और ऐसी ही ढेरों दूसरी सेवाओं पर लॉगिन करने वाले बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी के पास खोने के लिए एक अदद प्राइवेसी है। अएनलाइन संदेश लेने−देने वाले प्रेमियों से लेकर अपनी बीमारियों के बारे में विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करने वालों और गूगल कैलेंडर के जरिए अपने शिड्यूल्स का हिसाब−किताब रखने वालों से लेकर ब्लॉगों में टिप्पणियाँ करने वालों तक के पास चिंतित होने की कई वजहें हैं।

आपकी आपत्तिजनक बेनामी टिप्पणी का सोर्स भले ही ब्लॉग चलाने वाले को पता न चले लेकिन याद रखिए, गूगल को पता है। आपकी बीमारी के बारे में भले ही घरवालों तक को पता न हो, मगर.. गूगल सब कुछ जानता है। आपको अचानक कितना आर्थिक लाभ हुआ जिसे आपने बड़े जतन से सेपरेट अकाउंट में रखा हुआ है, यह तथ्य भले ही आपके घरवाले न जानें लेकिन बहुत संभव है कि गूगल उसे जानता हो। शायद आपने अपने किसी ईमेल संदेश में किसी से इसका जिक्र किया हो। आपने किसी बड़े लेनदेन पर टैक्स बचा लिया है या फिर जाने−अनजाने में किसी गलत इंसान से संपर्क कर बैठे हैं या फिर क्रेडिट कार्ड डिफॉल्ट करके किसी दूसरे शहर में आ बैठे हैं तो कम से कम गूगल से दूर रहिए। अगर आपके पास एंड्रोइड बेस्ड फोन है तो फिर टेलीफोन कॉल्स का ब्यौरा भी जोड़ लीजिए। आपने किसे, कब, कितनी देर तक फोन किया, आपके फोन का ब्रांड, टेलीफोन सर्विस वगैरह सबकी जानकारी गूगल तक पहुंचेगी।

आपकी वह जानकारी संयोग या कुयोग से कब किसी गलत हाथ में पड़ जाए, कौन जाने? बहुत से लोग हैं जिनकी दिलचस्पी ऐसी जानकारी में होगी। मार्केटिंग करने वाले, प्रतिद्वंद्वी कारोबारी समूह और यहाँ तक कि अपराधी भी। सरकार को तो संदेहास्पद जानकारी मुहैया कराना ईमेल कंपनियों की की कानूनी बाध्यता है ही। और चलिए ये सूचनाएं अगर किसी और के पास न भी पहुँचें तो क्या गूगल को आपका जुड़ा निजी डेटा अपने पास सहेजकर रखने का हक है? वह भी बरसों बरस? कौन जाने कुछ साल बाद वह इस जानकारी का किसी और ढंग से इस्तेमाल करने का फैसला कर ले, जिसका आज हमें अनुमान भी नहीं है?

अगर आप सोचते हैं कि आप इस अएप्शन को सक्रिय ही नहीं करेंगे तो यह संभव नहीं है। इस ब्रह्मास्त्र में बचाव का विकल्प यूज़र को नहीं दिया जा रहा। अगर आप गूगल की किसी भी सेवा का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आपको इसे मानना ही होगा। अगर नहीं मानना चाहते तो बस एक ही विकल्प है और वह है गूगल से पूरी तरह अलग हो जाना।

ताज्जुब होता है न? अगर आपकी ईमेल को दफ्तर का कोई साथी, पड़ोसी और यहाँ तक कि आपके घर का कोई सदस्य भी आपकी पीठ पीछे पढ़ रहा हो तो यह साइबर क्राइम माना जाएगा। पुलिस और सीबीआई को भी अगर किसी का टेलीफोन टेप करना है तो उसे केंद्र या राज्य सरकार की इजाजत लेनी पड़ती है। लेकिन यहाँ गूगल हमारी निजी जानकारियों पर नजर रखने और उन्हें सहेजने के लिए आज़ाद है। वजह है उसकी प्राइवेसी पॉलिसी, जिसे हम जीमेल और दूसरी गूगल सेवाओं के सदस्य बनते समय आम तौर पर बिना पढ़े ही मंजूर कर लेते हैं। कानूनी तौर पर गूगल सुरक्षित है लेकिन नैतिक तौर पर?

दुनिया भर में विरोध

अमेरिका में करीब चालीस राज्यों के एटॉर्नी जनरलों ने इस प्राइवेसी पॉलिसी का विरोध किया है। यूरोप के कई देशों ने इस पर विरोध जताया है और प्राइवेसी राइट्स एक्टीविस्ट इस बात पर ऐतराज कर रहे हैं कि गूगल अपने सभी यूज़र्स को अपने उत्पाद के रूप में दुनिया भर में फैले विज्ञापनदाताओं के सामने पेश कर रहा है। माइक्रोसॉफ्ट ने भी इसकी कड़ी आलोचना की है। दुनिया भर के अखबारों, टेलीविजन चैनलों और सोशियल नेटवर्किंग ठिकानों और ब्लॉगों पर लोगों का गुस्सा फूटा पड़ रहा है।

लेकिन गूगल टस से मस होने को तैयार नहीं। कुछ महीनों से जीमेल, ब्लॉगर वगैरह के यूज़र्स को ऐसी विंडोज दिखाई जा रही थीं, जिनमें उनका टेलीफोन नंबर मांगा जा रहा था। बहुतों ने दे भी दिया, हालाँकि उसी पेज पर छोटा सा लिंक इसे अनदेखा करते हुए आगे बढ़ने का भी था जो ज्यादातर लोगों की नजर में नहीं आया। शायद आपको अंदाजा लगा हो कि जानकारी कितनी स्पेसीफिक है।

गूगल की सफाई है कि नई प्राइवेसी पॉलिसी लाने के दो खास मकसद हैं− पहला, बहुत सारी पॉलिसीज को एक अकेले दस्तावेज में बदलकर सिम्पल बना देना, और दूसरा, यूज़र्स को बेहतर सर्च और सुविधाएँ मुहैया कराना (देखें बॉक्स)। लेकिन आईटी जगत के जानकारों का कहना है कि इसकी कारोबारी वजहें हैं। फेसबुक तेजी से आगे बढ़ रहा है और दुनिया की नंबर एक इंटरनेट कंपनी के रूप में गूगल का साम्राज्य खतरे में है। उसकी सोशियल नेटवर्किंग साइट गूगल प्लस के यूज़र्स की संख्या अभी फेसबुक के आठवें हिस्से तक ही पहुंची है। उधर मुनाफे के मामले में एपल ने कमाल कर दिया है। दिसंबर 2012 में खत्म हुई तिमाही में उसने रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज किया है। फेसबुक का भारी−भरकम आईपीओ आने वाला है जो 2012 में आईटी जगत की सबसे बड़ी खबर बनेगा। टि्वटर भी लगातार खबरों में बना हुआ है। इधर गूगल की पिछली तिमाही की आय अनुमान से कम रही है।

गूगल पर दबाव है अपने विज्ञापनों को ज्यादा असरदार और प्रोफिटेबल बनाए, जिसके लिए जरूरी है कि हर यूज़र को उसकी जरूरतों तथा पसंद−नापसंद के लिहाज से विज्ञापन दिखाए जाएँ ताकि वह उन्हें क्लिक करे और गूगल की आमदनी बढ़े। आपके बारे में जितना ज्यादा डेटा उसके पास होगा, उसकी विज्ञापन प्रणाली उतने ही बेहतर नतीजे देगी। दूसरा दबाव है अपनी सर्विसेज को और बेहतर बनाने का ताकि उससे जुड़ने वाले यूज़र्स की संख्या बढ़ती रहे। अब यह बात अलग है कि गूगल का ताजा फैसला उल्टा भी पड़ सकता है क्योंकि प्राइवेसी को अहमियत देने वाले बहुत से यूज़र गूगल से अलग होने का फैसला कर सकते हैं। माइक्रोसॉफ्ट और फेसबुक मौके का फायदा उठाने में जुट भी गए हैं। वे अपनी−अपनी सेवाओं को ज्यादा सुरक्षित बताते हुए प्रचार अभियान चला रहे हैं।

सवाल उठता है कि यूज़र क्या करे? गूगल की कई सेवाएँ इतनी अच्छी हैं कि उनसे पूरी तरह हाथ झाड़ लेना संभव नहीं है। लेकिन जिसे आप अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त समझते थे वह सरे−बाजार आपकी ही बोली लगाए दे रहा है! आखिर करें तो क्या करें? कहते हैं कि दुनिया में कोई चीज़ मुफ्त नहीं मिलती। सबकी कोई न कोई कीमत है। गूगल के मामले में वह कीमत है आपकी प्राइवेसी। फैसला आपको ही करना है कि क्या आप यह कीमत अदा करने के लिए तैयार हैं?

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