Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 20 मार्च 2013
श्रेणीः  वैकल्पिक राजनीति
प्रकाशनः प्रभासाक्षी.कॉम
टैगः  जनरल वीके सिंह

लब्बोलुआबः

जनरल सिंह ने अन्ना हजारे के साथ मुंबई में बोलते हुए कहा कि जिस अंदाज में मौजूदा सरकार लोगों को लूटने में लगी हुई है उसे देखते हुए संसद को तुरंत भंग कर दिया जाना चाहिए ताकि नए नेताओं का नया समूह सत्ता में आ सके। फिर वे संसद घेरने के एक कार्यक्रम में भी शामिल हुए। अधिकांश पूर्व सेनाध्यक्षों ने संसद के खिलाफ उनकी टिप्पणियों की आलोचना की है।

Summary:

General V K Singh is known as an exceptional soldier and honest and able army general but his recent political activities have raised many eyebrows.
सियासत की सरजमीन पर जड़ें जमाते जनरल साहब

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

जनरल वीके सिंह का भारत के सैन्य इतिहास में अहम स्थान रहेगा। न सिर्फ उनकी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के लिए बल्कि इसलिए भी कि वे सेना के आत्मसम्मान को सुरक्षित रखने के लिए इस देश की व्यवस्था के सामने खुलकर खड़े होने का साहस कर पाए। जन्मतिथि के विवाद में भले ही वे अपने पक्ष में फैसला न करवा सके हों लेकिन अपने कार्यकाल के अंतिम क्षणों तक इस मुद्दे पर अपनी प्रखरता से उन्होंने लाखों प्रशंसक बनाए। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जाकर, उन्हें की गई रिश्वत की पेशकश के संबंध में सार्वजनिक बयान देकर और भारत की सैन्य क्षमताओं तथा तैयारियों की कमियों पर खुले आम टिप्पणी करके उन्होंने विवाद भी खूब खड़े किए। वे ऐसे थलसेनाध्यक्ष के रूप में जाने जाएँगे जिसने अपनी ईमानदारी और बुलंदी की तो छाप छोड़ी ही, सरकार की नाक में भी ऐतिहासिक किस्म का दम कर दिया- कभी सही कारण से तो कभी गलत कारण से। स्वाभाविक था कि सरकारी व्यवस्था के भीतर रहते हुए उसका इतना बड़ा आलोचक और वह भी अच्छी छवि वाला, विपक्षी दलों के लिए एक उपहार की तरह था, जिसे अपने साथ लेने के लिए भारतीय जनता पार्टी से लेकर अन्ना हजारे-अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव तक आतुर थे। जनरल सिंह ने अब तक सभी दरवाजे और खिड़कियाँ खुली रखी हैं। वे हर उस जगह जा रहे हैं, जहाँ उन्हें स्पेस मिल रहा है। इस प्रक्रिया में उन्होंने जहाँ इस बात का स्पष्ट संकेत दिया है कि वे देर-सबेर राजनीति का रुख करेंगे, वहीं कुछ ऐसी खबरों को भी जन्म दिया है जो उनकी पारंपरिक छवि के साथ विरोधाभास रखती है।

हालाँकि जनरल सिंह एक स्वतंत्र नागरिक के तौर पर कुछ भी कहने, कुछ भी करने और कोई भी स्टैंड लेने के लिए स्वतंत्र हैं वहीं एक पूर्व थलसेनाध्यक्ष के नाते उनके आचरण की कुछ स्वाभाविक सीमाएँ हैं। हालाँकि वे सीमाओं में बंधने के लिए नहीं जाने जाते लेकिन उनकी छवि सत्यनिष्ठा, अनुशासन, नैतिकता और निष्पक्षता की रही है। उनसे यह उम्मीद करना अनुचित नहीं है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय एक्टिविस्ट के नाते वे अपने साथियों, विपक्षियों, मुद्दों और लक्ष्यों को तय करते समय सही बात कहने वाले सही इंसान' की छवि से विचलित नहीं होंगे। बहरहाल, रिटायरमेंट के बाद जनरल सिंह का हाइपरएक्टिव अंदाज उनके प्रशंसकों को कन्फ्यूज़ करेगा।

जनरल सिंह ने अन्ना हजारे के साथ मुंबई में बोलते हुए कहा कि जिस अंदाज में मौजूदा सरकार लोगों को लूटने में लगी हुई है उसे देखते हुए संसद को तुरंत भंग कर दिया जाना चाहिए ताकि नए नेताओं का नया समूह सत्ता में आ सके। कुछ महीने पहले तक व्यवस्था का हिस्सा रहे व्यक्ति के लिए संसद और व्यवस्था पर इस तरह का हमला करना कितना उचित या अनुचित है, वह एक अलग बहस का मुद्दा है। अलबत्ता, नए नेताओं का वह समूह कैसा होगा, इस बारे में जनरल सिंह ने कोई बड़ी उम्मीदें नहीं जगाई हैं। क्या ये नेता हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला जैसे होंगे, जिनके साथ हाल ही में उन्होंने मंच साझा किया है? क्या ये नेता दूसरे विपक्षी दलों के होंगे जो खुद भी विवादों और आरोपों से मुक्त नहीं हैं? या फिर ये नेता अन्ना हजारे के साथी होंगे जो फिलहाल राजनीति में उतरने के लिए तैयार नहीं दिखते? या फिर अरविंद केजरीवाल के साथी जो टेलीविजन पर तो अच्छी-खासी उपस्थिति रखते हैं लेकिन जिनके लिए जमीनी राजनीति में पाँव जमा पाना लगभग अव्यावहारिक है। बचते हैं बाबा रामदेव जो दो-चार महीनों में एकाध धमाका कर कुछ और महीनों के लिए विलुप्त हो जाते हैं और फिलहाल स्वयं विभिन्न प्रकार के उलझावों में घिरे हैं। जनरल सिंह की दृष्टि में यदि ओम प्रकाश चौटाला एक आदर्श राजनीतिज्ञ हैं तो उनके बारे में सिर्फ दो संभावनाएँ दिखती हैं- या तो वे हरियाणा की राजनीति से अनभिज्ञ हैं, या फिर वे भी राजनीति सीख गए हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनरल सिंह की मुहिम यदि ऐसे साथियों के सहयोग पर आधारित है तो ऐसी मुहिम की साख पर सवाल उठने तय हैं।

सक्रियता की जल्दी

जनरल सिंह की बहुत सी दलीलें और मुद्दे सही हैं। तीस जनवरी से अन्ना हजारे के साथ देश भर के दौरे पर निकलने का निर्णय उन्हें आम लोगों के साथ सीधे संपर्क और उनकी समस्याओं पर समझबूझ विकसित करने में मदद देगा। लेकिन संसद भंग करने की उनकी मांग 'राजनैतिक' है। इसी तरह संसद का घेराव करने का उनका फैसला अभी-अभी सेवानिवृत्त हुए सेनाध्यक्ष के लिए ठीक नहीं है। हालाँकि जनरल अब सरकारी बंधनों और उत्तरदायित्वों से आज़ाद हैं लेकिन जिस शख्स के नाम के साथ 'जनरल' शब्द जुड़ा हो, वह अपने नैतिक उत्तरदायित्वों से मुक्त कैसे हो सकता है? कम से कम रिटायरमेंट के तुरंत बाद तो बिल्कुल नहीं, क्योंकि आज भी सेना का एक बड़ा तबका उनके क्रियाकलाप में सीधी दिलचस्पी रखता है और उनका अनुसरण करता है। जनरल ने सरकार पर सीएजी, सीवीसी, न्यायपालिका के अतिरिक्त सेना को कमजोर करने का आरोप लगाया है। इस तरह उन्होंने सरकार और सेना के बीच पैदा हुई उस खाई को पाटने का प्रयास नहीं किया है जो थलसेनाध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल के अंतिम दौर में बनी थी। बेहतर हो यदि वे सेना को अब किसी विवाद में शामिल करने से बचें।

सेना हो या सिविलियन व्यवस्था, उसके शीर्ष पदों से रिटायर हुए लोगों के लिए एक 'ठंडी अवधि' की बात इसीलिए कही जाती है ताकि वे कुछ समय के लिए सार्वजनिक जीवन में कोई भी संवेदनशील कदम उठाने से बचें। हालाँकि ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब संवैधानिक पदों पर कार्यरत लोग रिटायरमेंट के बाद सक्रिय राजनीति में आ गए, लेकिन किसी सेनाध्यक्ष ने ऐसा किया हो, इसका उदाहरण नहीं मिलता। भले ही ऐसे संयम की कोई कानूनी या संवैधानिक बाध्यता नहीं है लेकिन नैतिकता और स्थापित परिपाटी के लिहाज से वह वांछनीय है।

यदि जनरल सिंह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होते हैं और भ्रष्टाचार, कालेधन, पक्षपात और अकर्मण्यता जैसे मुद्दों पर सकारात्मक मुहिम चलाते हैं तो वह पूरी तरह जायज है। लेकिन वह काम संवैधानिक स्तंभों और जनता द्वारा चुनी हुई संसद पर हमला किए बिना भी संभव है। आपको याद होगा, समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीज की तरफ से तिब्बतियों के मुद्दे पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति स्व. ज्ञानी जैलसिंह के शामिल होने पर न सिर्फ भारत सरकार बल्कि विदेशी हल्कों से भी आपत्ति जाहिर की गई थी क्योंकि फर्नांडीज तिब्बती संघर्ष के प्रबल समर्थक रहे हैं जबकि भारत सरकार ने तिब्बत को चीन का स्वायत्त क्षेत्र मान लिया है। ज्ञानीजी केंद्र सरकार की नीति के विरुद्ध जाने वाले मंच पर उपस्थित होने वाले थे और भले ही वे तब तक राष्ट्रपति पद से मुक्त हो चुके थे लेकिन फिर भी इसने बड़े विवाद को जन्म दिया। वह अलग बात है कि ज्ञानीजी ने केंद्र सरकार के विरोध के बावजूद वही किया जो उन्हें ठीक लगा।

कहीं सही, कहीं गलत

जनरल की यह दलील जायज है कि संविधान के अनुसार सरकार का काम गरीब जनता के हक में नीतियां और कार्यक्रम बनाना तथा फैसले करना है लेकिन न सिर्फ सत्तारूढ़ दल बल्कि विपक्ष भी जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह बेपरवाह है। सत्ताधारी लोग निजी कंपनियों को मुनाफा कमाने में मदद कर रहे हैं और संसद में कोई भी उनके फैसलों पर सवाल नहीं उठा रहा। चौतरफा जारी भ्रष्टाचार और भूमि अधिग्रहण के मुद्दों पर भी श्री सिंह ने सत्तारूढ़ पक्ष को उचित खरी-खरी सुनाई है। किंतु विरोधाभास यह है कि उन्होंने जिन ओमप्रकाश चौटाला के मंच से ये बातें कहीं वे खुद इसी तरह के आरोपों से घिरे रहे हैं, खासकर ज्ञात स्रोतों से बहुत अधिक आय और शिक्षकों की भर्ती में हुए घोटाले संबंधी आरोपों से। उनकी ग्रीन ब्रिगेड तो अपने शक्ति-प्रदर्शनों के लिए मशहूर है ही।

अब सुना है कि जनरल सिंह गन्ना किसानों के आंदोलन से जुड़ने जा रहे हैं जो रंगराजन समिति की उस रिपोर्ट से नाराज है जिसने चीनी उद्योग को विनियंत्रित करने और गन्ने के राज्य परामर्शी मूल्य की व्यवस्था खत्म करने की सिफारिश की है। समिति ने कहा है कि चीनी मिलों के राजस्व का 70 फीसदी हिस्सा किसानों के गन्ना मूल्य के रूप में दे दिया जाए। शायद ही कोई उद्योग हो जिसमें कच्चे माल के लिए 70 फीसदी कीमत अदा की जाती हो। लेकिन कुछ किसान संगठन इसे भी कम मान रहे हैं। वे भूल गए हैं कि उत्तर प्रदेश की ज्यादातर चीनी मिलें घाटे में चल रही हैं और उनमें से कई तो उनके पुराने बकायों को भी चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। राज्य सरकार की मिलों की हालत तो और भी नाजुक है।

गन्ने के परामर्शी मूल्य का मुद्दा राजनैतिक दलों के लिए किसानों के वोट बटोरने का जरिया है। राज्य सरकारें हर साल बढ़ा-चढ़ाकर गन्ने की कीमत अदा करने का निर्देश देती हैं भले ही चीनी की कीमत स्थिर हो, चीनी उद्योग के खर्च बढ़ रहे हों और चीनी की मांग में लगातार ठहराव चल रहा हो। बढ़ते मूल्यों और घटते मुनाफे के कारण चीनी मिलों की आय छीजती चली जा रही है। पिछले दो साल से तो स्थिति बहुत विकट है और प्रदेश की मिलें अपने इतिहास के सबसे गंभीर संकट से गुजर रही हैं। चीनी उद्योग खुद 70 फीसदी राजस्व किसानों को सौंप देने की रंगराजन समिति की सिफारिश से चिंतित है लेकिन यह सिफारिश किसानों के हितों के खिलाफ कैसे हो सकती है? मिलों का राजस्व जितना बढ़ेगा, किसानों का भुगतान भी उतना ही बढ़ता चला जाएगा। बेहतर होता कि इस मुद्दे पर संसद का घेराव करने से पहले जनरल सिंह पूरे मामले को समझने की कोशिश करते। यदि मिलें बंद ही हो जाएँ और गन्ना मूल्यों का भुगतान करने की स्थिति में ही न हों तो क्या वह किसानों के हित में होगा?

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