Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 20 मार्च 2013
श्रेणीः  चुनाव 2014
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  प्रधानमंत्री प्रत्याशी

लब्बोलुआबः

अगर भाजपा लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली या नितिन गडकरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ती है तो कांग्रेस राहुल गांधी को आगे लाने में कोई संकोच नहीं करेगी। लेकिन मोदी प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार हुए तो उसकी रणनीति बदल सकती है। उधर खुद मोदी एक मजबूत शख्सियत हैं लेकिन भाजपा उन्हें अभी से पार्टी प्रत्याशी घोषित करने की स्थिति में नहीं है।

Summary:

Congress and BJP are both show as if the issue of next PM candidate is not an issue for them at all but fail to come out with a clear name. Why?
प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी पर जितने आश्वस्त उतने ही भ्रमित!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर के चित्रों में जो बात सहज ही आपका ध्यान खींचती है, वह है विशाल मंच पर बैठे वरिष्ठ नेताओं की कतार के पीछे लगे विशाल बैनर पर प्रमुखता से लगी पार्टी महासचिव राहुल गांधी की तसवीर। शिविर में राहुल फैक्टर की प्रधानता और युवा कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों को मिली विशेष अहमियत से स्पष्ट है कि पार्टी नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। श्री गांधी को अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उतारने की मांग अब अपने चरम पर है और ऐसा होना कमोबेश तय ही है भले ही इस बारे में औपचारिक घोषणा आज हो या साल भर बाद। कांग्रेस जिस तरह पिछले एक दशक से क्रमिक परिवर्तन के मार्ग पर है, उसके लिए राहुल गांधी अपरिहार्य हैं। क्रमिक परिवर्तन का एक दौर, अप्रत्यक्ष स्तर पर ही सही, भारतीय जनता पार्टी में भी जारी है जहाँ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी मजबूत से और मजबूत होते चले गए हैं। दोनों को आगे लाने की मांग उठ रही है, लेकिन दोनों ही दलों में कुछ उलझन है जो उन्हें इस बारे में तुरंत कोई स्पष्ट सार्वजनिक घोषणा करने से रोक रही है। जहाँ नरेंद्र मोदी खुद ही कुछ हद तक कांग्रेस की समस्या हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी बाधा है- महत्वाकांक्षी नेताओं की लंबी कतार जो किसी भी नाम पर आसानी से सहमत होने वाले नहीं हैं, भले ही वह लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव जीतने वाले नरेंद्र मोदी ही क्यों न हों।

राहुल गांधी की तरफ से कांग्रेस के लिए रखे गए दस सूत्री प्रस्तावों में से एक यह भी है कि लोकसभा चुनाव के उम्मीदवारों की घोषणा एक साल पहले कर दी जाए। सवाल उठता है कि क्या यही बात पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर भी लागू होती है? इसका स्पष्ट उत्तर मिलना फिलहाल मुश्किल है क्योंकि कांग्रेस का फैसला प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से मिलने वाले संकेतों पर निर्भर करेगा। अगर राजग नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाता है तो कांग्रेस की रणनीति और तैयारी किसी और शैली में होगी, बनिस्पत राजग द्वारा किसी अन्य नेता को प्रत्याशी बनाए जाने के। तब पार्टी चाहेगी कि कुशल रणनीतिकार और धुआँधार प्रचारक नरेंद्र मोदी के साथ आमने-सामने की लड़ाई के लिए सीधे राहुल गांधी को न उतारा जाए। पार्टी प्रधानमंत्री पद के मुद्दे को कम महत्व देते हुए चुनाव में सोनिया गांधी को ही आगे रखे और कहा जाए कि प्रधानमंत्री के बारे में फैसला चुन कर आने वाले संसद सदस्य करेंगे। मोदी की मौजूदगी की स्थिति में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पर भ्रम बनाए रखना कांग्रेस को ज्यादा मुफीद महसूस होगा। हालाँकि कांग्रेसी नेता यह दावा करते हैं कि नरेंद्र मोदी को प्रधान प्रत्याशी बनाने पर भाजपा को अंदरूनी चुनौतियों के साथ-साथ राजग को एकजुट बनाए रखने की मुश्किल का भी सामना करना पड़ेगा, लेकिन हकीकत यह है कि पार्टी 2014 की लड़ाई को 'मोदी बनाम राहुल' की जंग का रूप देने से बचना चाहती है। अगर भाजपा लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली या नितिन गडकरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ती है तो कांग्रेस राहुल गांधी को आगे लाने में कोई संकोच नहीं करेगी। लेकिन मोदी प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार हुए तो उसकी रणनीति बदल सकती है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी संभवतः नेता के मुद्दे पर अपने इतिहास के सबसे कठिन चुनौती का सामना कर रही है। नरेंद्र मोदी हाल के वर्षों में पार्टी के भीतर सर्वाधिक लोकप्रिय और आक्रामक नेता बनकर उभरे हैं। लेकिन उनके नाम पर पार्टी नेतृत्व की अग्रिम कतार में उस तरह की सर्वानुमति नहीं है, जैसी कांग्रेस में राहुल गांधी के लिए है। बल्कि भाजपा की भावी दिशा तय करने वाले लगभग सभी प्रमुख नेता खुद ही प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की दौड़ में हैं। ये नेता यह तो जरूर चाहेंगे कि पार्टी को किसी तरह नरेंद्र मोदी के करिश्मे का लाभ मिले लेकिन श्री मोदी के पक्ष में अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं का बलिदान करने को शायद ही तैयार हों। गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह कई वरिष्ठ नेताओं ने श्री मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वथा उपयुक्त बताने के बाद बड़ी सफाई से रुख बदला, वह इसका स्पष्ट संकेत देता है। मूलभूत मुद्दे पर सौहार्दपूर्ण ढंग से फैसला न होने की सूरत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, जिसके साथ नरेंद्र मोदी के रिश्ते 'कभी धूप, कभी छाँव' जैसे रहे हैं। हालाँकि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद पर आना संघ की ही विचारधारा को आगे बढ़ाएगा, लेकिन उनका प्रभुत्ववादी दृष्टिकोण और अकेले चलने की प्रवृत्ति संघ की शक्ति में कोई इजाफा करेगी, इसमें संशय है। उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में कमजोर स्थिति के कारण भारतीय जनता पार्टी का अपने दम पर बहुमत लाने में सक्षम न होना श्री मोदी के खिलाफ जाता है।

मोदी के लिए उलझनें अनेक

भारतीय जनता पार्टी राजग के उन घटक दलों को नाराज नहीं कर सकती जिनके वोट बैंक में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका है। राजग का आधार लगातार सिकुड़ता गया है और उसके लिए पुराने साथियों को जोड़े रखने के साथ-साथ नए साथी तलाशने की भी मजबूरी है। तब ऐसे नेता का मुद्दा प्रधान हो जाता है जिसे समाज के सभी वर्गों में स्वीकार्यता हासिल हो। श्री मोदी को अहसास है कि ज्यों ही वे कोई बड़ा कदम उठाएँगे, राजग और भाजपा दोनों में विरोध के कई स्वर उठने तय हैं। यहीं पर लालकृष्ण आडवाणी जैसे अनुभवी नेताओं के लिए अवसर की खिड़की खुलती है, जो भले ही आज हाशिए पर हों लेकिन सही अवसर पर अपनी मौजूदगी का अहसास करा सकते हैं।

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना तभी संभव है जब पार्टी इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार हो कि भले ही 2014 में वह सत्ता में न आए लेकिन उससे अगले चुनाव में (2019) वह पासा पलट देगी। कारण? तब तक श्री मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर अपना आधार बहुत मजबूत करने का मौका मिल जाएगा। लेकिन दो चुनावों में सत्ता से दूर रही भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन आखिर किसलिए इस तरह का बलिदान करने को तैयार होंगे? संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के विरुद्ध पिछले दो साल में जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है, उसका राजनैतिक लाभ उठाने का मौका भला वह क्यों चूकना चाहेगी?अंततः काफी संभव है कि पार्टी श्री मोदी को अगले चुनावों के बरक्स कोई राष्ट्रीय भूमिका थमा दे और प्रधानमंत्री के मुद्दे पर हालात अस्पष्ट बनाए रखते हुए लोकसभा चुनावों में उतरे। शायद आपने भी नरेंद्र मोदी को भाजपा की राष्ट्रीय चुनाव समिति का संयोजक बनाए जाने की चर्चा सुनी हो।

घटा या बढ़ा राहुल का करिश्मा

राहुल गांधी का 2014 में प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी करना तय है। अब यह एक तकनीकी मुद्दा है कि ऐसा चुनाव से पहले होगा या चुनाव के बाद। एक बात स्पष्ट है कि मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कांग्रेस की भावी चुनावी योजनाओं में फिट नहीं बैठते। प्रधानमंत्री पद के मुद्दे पर कांग्रेस के सामने गठबंधन के दूसरे दलों की तरफ से कोई चुनौती या आपत्ति भी नहीं है क्योंकि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के घटक दलों में कम से कम सांप्रदायिकता के विरोध के मुद्दे पर मतैक्य है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों की कोशिशों के बाद राष्ट्रीय नेता की छवि बनाने में सफल हुए हैं? कांग्रेस संगठन के भीतर उनका प्रभाव स्पष्ट है और केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी उनके विश्वस्तों का अनुपात काफी बढ़ गया है। लेकिन चुनावी रणनीतिकार के रूप में और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर रुख लेने के मामले में वे विशेष प्रभावित नहीं कर पाए हैं। कई महत्वपूर्ण मौकों पर उन्होंने अपनी चुप्पी से न सिर्फ चौंकाया बल्कि निराश भी किया है, खासकर युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जिनके प्रतिनिधि होने का दावा राहुल गांधी करते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट और अजय माकन को छोड़कर दूसरे युवा केंद्रीय मंत्रियों ने भी कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ा है।

ऐसे में कांग्रेस के भीतर इस मुद्दे पर भी मंथन होना चाहिए कि क्या राहुल गांधी का कद सोनिया गांधी की तरह उतना बढ़ चुका है कि वे पार्टी को चुनावी जीत दिला सकें। पार्टी के भीतर दबदबा होना और संगठन पर पकड़ होना मात्र ही काफी नहीं है। पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान अच्छा प्रभाव छोड़ा था। जिन लोकसभा क्षेत्रों का उन्होंने दौरा किया, वहाँ पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन विधानसभा चुनावों में स्थिति इसके विपरीत थी। इस संदर्भ में बिहार और उत्तर प्रदेश के उदाहरण सामने हैं। शायद इसीलिए उन्होंने गुजरात में नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देने की बजाए चुनाव प्रचार से दूर रहना श्रेयष्कर समझा। यह सावधानीपूर्ण और सुविधाजनक रणनीति फौरी तौर पर भले ही कांग्रेस के अनुकूल रहती हो, लेकिन उस आत्मविश्वास का परिचय नहीं देती जिसे लेकर वह राहुल गांधी को अगले चुनाव में सबसे आगे रखने की सोच रही है।

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