Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 20 मार्च 2013
श्रेणीः  न्यू मीडिया
प्रकाशनः मीडिया मीमांसा
टैगः  कनवरजेंस

लब्बोलुआबः

ऐसे समय में जब पाठक, दर्शक, उपभोक्ता तक पहुंचने के नए−नए माध्यमों का विस्फोट सा हो रहा है, मीडिया कंपनियां अपने पुराने काम और पुराने आकार तक सीमित रहने को अभिशप्त नहीं रह गई हैं। जमाना कनवरजेंस का है।

Summary:

Media houses are increasingly taking advantage of convergence which is not just helping reduce their expenses at a time of financial pressures but also in finding new sources of growth.
कनवरजेंसः तकनीक की ताकत से कारोबारी समझदारी तक

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अब वह जमाना नहीं रहा जब अखबार निकालने वाली कंपनी अखबार तक और टेलीविजन चैनल चलाने वाली कंपनी चैनल तक सीमित रहती थी। किसी एक क्षेत्र में सक्रिय कंपनी अगर तकनीकी संसाधनों का उपयोग करते हुए अन्य क्षेत्रों में भी पांव पसार सके और अपने कारोबार व प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर सके तो बुरा क्या है। ऐसे समय में जब पाठक, दर्शक, उपभोक्ता तक पहुंचने के नए−नए माध्यमों का विस्फोट सा हो रहा है, मीडिया कंपनियां अपने पुराने काम और पुराने आकार तक सीमित रहने को अभिशप्त नहीं रह गई हैं। बाजार भी बढ़ रहा है और टेक्नॉलॉजी ने समय, श्रम और खर्च घटाते हुए सब कुछ बहुत आसान और संभव बना दिया है। तकनीक का थोड़ा सा बुद्धिमत्तापूर्ण इस्तेमाल किया जाए तो बड़ी मीडिया कंपनियां और भी ज्यादा बड़ी हो सकती हैं। कनवरजेंस नए मीडिया का अभिन्न पहलू है।

कनवरजेंस दिखने में भले ही तकनीक या संचार से जुड़ी फेनोमेनन प्रतीत हो, वास्तव में यह एक दूरदर्शितापूर्ण वित्तीय रणनीति है। कनवरजेंस के दो स्पष्ट रूप हैं। अगर एक संस्थान की अनेक मीडिया इकाइयां हैं और सब एक साथ आकर ऐसी परियोजनाओं में योगदान देती हैं जो संस्थान के हितों को आगे बढ़ाए, तो यह कनवरजेंस है। दूसरे, एक संस्थान अपने पास मौजूद विषय−वस्तु और संसाधनों को विभिन्न रूपों में मीडिया के अलग−अलग क्षेत्रों में इस्तेमाल कर उसका अधिकतम संभव उपयोग करता है तो वह भी कनवरजेंस है। दोनों ही रूपों में संस्थान को उल्लेखनीय व्यावसायिक लाभ होता है।

दैनिक जागरण का उदाहरण लीजिए। भारत का पहले नंबर का दैनिक अखबार होते हुए उसने इंटरनेट के क्षेत्र में भी कदम बढ़ाया और जागरण.कॉम वेबसाइट लांच की जिसमें जागरण के सभी संस्करणों से सामग्री ली गई। इस अखबार के तीस से ज्यादा संस्करण हैं और सबके पास अपने−अपने क्षेत्र की खबरों, लेखों, चित्रों आदि का भंडार है। अखबार के पास यह ढांचा पहले से ही मौजूद था और उसने तकनीक का इस्तेमाल करते सभी संस्करणों से चुनिंदा सामग्री वेबसाइट में डाले जाने की व्यवस्था कर दी। उत्तरी राज्यों के कोने−कोने की खबरें आने से उसका आकार तेजी से बढ़ा और जागरण ने इंटरनेट के क्षेत्र में अपने लिए बाजार पैदा कर लिया। बाद में उसका याहू! से गठजोड़ हो गया जिसका परिणाम भारी आर्थिक लाभ के रूप में सामने आया। यह कनवरजेंस का कमाल था कि बहुत बड़ा स्वतंत्र संस्थान स्थापित किए बिना जागरण ने असीमित संभावनाओं से भरे एक नए क्षेत्र में अपनी मजबूत जगह बना ली। अब वह रेडियो के क्षेत्र में भी कदम बढ़ा रहा है और पत्रकारिता की शिक्षा के क्षेत्र में भी।

एक आर्थिक और प्रबंधकीय रणनीति के रूप में कनवरजेंस के लाभ ही लाभ हैं। इसकी बदौलत न सिर्फ कर्मचारियों के वेतन, प्रबंधन और दफ्तर व सामग्री संबंधी खर्च घटाया जा सकता है बल्कि एक ही विषय वस्तु (कन्टेंट) को अलग−अलग मीडिया इकाइयों में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह नए मीडिया और तकनीकी क्षेत्रों में पांव फैलाने की संभावनाएं पैदा करती है तो संबंधित मीडिया ब्रांड को और मजबूत भी बनाती है। ऐसे संस्थान विज्ञापनों के मामले में भी लाभ उठा सकते हैं। वे अपनी विभिन्न मीडिया इकाइयों को एक पैकेज के रूप में पेश करके सबके लिए विज्ञापन जुटा सकते हैं जो उनकी मूल इकाई की तुलना में कहीं अधिक होंगे। इतना ही नहीं, उसकी विभिन्न इकाइयां एक दूसरे को प्रमोट कर आपस में भी लाभ उठा सकती हैं। कनवरजेंस का प्रयोग करने वाले संस्थान निरंतर बड़े और मजबूत होते चले जाते हैं जिन्हें चुनौती देना नए संस्थानों के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है।

टाइम्स समूह का उदाहरण

भारत में कनवरजेंस के अनेक सफल उदाहरण मौजूद हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह को ही लीजिए। वह विश्व का सबसे बड़ा अंग्रेजी अखबार तो था ही, 1997−98 में उसने इन्डियाटाइम्स के नाम से पोर्टल भी शुरू कर दिया जिसे टाइम्स घराने के सभी अखबारों का पूरा सहयोग, समर्थन और योगदान मिला। इंडियाटाइम्स की प्रमोटर कंपनी टाइम्स इंटरनेट लिमिटेड आज भारत की सर्वाधिक सफल इंटरनेट कंपनियों में से एक है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आने वाले विज्ञापनों से लाभ उठाते हुए उसने टाइम्सजॉब्स.कॉम (नौकरियों के विज्ञापन), सिम्प्लीमैरी.कॉम (वैवाहिक विज्ञापन), मैजिकब्रिक्स.कॉम (जमीन−जायदाद के विज्ञापन), ट्रैवल.इंडियाटाइम्स.काम, टेन्डर्स.इंडियाटाइम्स.कॉम, टाइम्समनी.कॉम (निवेश पोर्टल), शॉपिंग.इंडियाटाइम्स.कॉम जैसी कई इंटरनेट आधारित इकाइयां खड़ी कर लीं। इन सबका टाइम्स समूह की सभी मीडिया इकाइयों में खूब प्रचार किया गया और आज उनमें से ज्यादातर परियोजनाएं अपने−अपने क्षेत्र की सबसे सफल इकाइयों में गिनी जाती हैं। सिर्फ इंटरनेट ही क्यों, टाइम्स समूह ने टेलीविजन (टाइम्स नाऊ और जूम), एफएम रेडियो (रेडियो मिर्ची), प्लेनेट एम (संगीत− यह कंपनी अब वीडियोकॉन को बेच दी गई है) के क्षेत्रों में सफलता हासिल की है। वह मोबाइल वेल्यू एडेड सेवाओं के क्षेत्र में भी सक्रिय है और '58888' मोबाइल शॉर्ट कोड से भी उसने खासी आय अर्जित की है। टाइम्स समूह का प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में पहले ही व्यापक और बहुभाषी उपस्थित हिै। कनवरजेंस की बदौलत आज 'बोरीबंदर की यह बुजुर्ग महिला' भारत की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी बन चुकी है, संभवतरू सबसे बड़ी न्यू मीडिया कंपनी भी।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पास देश भर में फैले रिपोर्टरों, संपादकों और फोटोग्राफरों का बेहद समृद्ध नेटवर्क है। आखिर क्यों उसकी खबरें और फोटोग्राफ सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया तक सीमित रहें? वे टाइम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट टाइम्सऑफइंडिया.कॉम में भी जा सकती हैं, तो अनूदित होकर नवभारत टाइम्स और महाराष्ट्र टाइम्स में भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। फिर नवभारत टाइम्स और महाराष्ट्र टाइम्स की भी अपनी−अपनी वेबसाइटें हैं जिनमें यही विषय−वस्तु थोड़ी रूपांतरित होकर प्रयुक्त हो सकती है। इंडियाटाइम्स.कॉम पोर्टल भी तो उन्हें इस्तेमाल कर सकता है। फिर टाइम्स नाऊ टेलीविजन चैनल और उसकी वेबसाइट भी क्यों पीछे रहें? थोड़ा परिमार्जन, थोड़ा संशोधन, थोड़ा विस्तार, या थोड़ा संपादन करके ये खबरें इकॉनॉमिक टाइम्स में, फिर उसके हिंदी संस्करण में और अंत में इकॉनामिकटाइम्स.कॉम वेबसाइट में भी तो प्रयुक्त हो सकती हैं। फिर इन सब अखबारों के ई−पेपर। उन सब में भी तो ये खबरें, ये लेख और ये चित्र इस्तेमाल होंगे। और आखिरकार रेडियो मिर्ची भी किसी से पीछे क्यों रहे? सरकार द्वारा एफएम रेडियो चैनलों को खबरों के प्रसारण की अनुमति दिए जाने के बाद अब टाइम्स की मूल खबरें रेडियो के फॉरमेट में कतरब्योंत के बाद वहां भी प्रसारित हो सकेंगी। उधर टाइम्स नाऊ चैनल की खबरों के वीडियो इंडियाटाइम्स.कॉम पर डालकर उसे और भी समृद्ध बनाया जा सकता है। वहीं क्यों रुकें, मोबाइल फोन पर खबर अलर्ट और मोबाइल−पेपर के जरिए उन्हें वेल्यू एडेड सर्विस के रूप में भी तो पेश किया जा सकता है। यह है कनवरजेंस का कमाल। इस प्रक्रिया में कितना स्टाफ, कितना समय, कितना श्रम और कितने संसाधनों की बचत हुई? और कितने अलग−अलग माध्यमों से आय प्राप्त हुई? और तो और, अगर टाइम्स ऑफ इंडिया अपनी खबर एजेंसी भी खोल ले तो फिर इन खबरों को दूसरे अखबारों को भी बेचा जा सकता है (टाइम्स ने कुछ साल पहले एजेंसी का विचार बनाया भी था लेकिन वह न्यू मीडिया के जमाने से पहले की बात थी)।

सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया ही क्यों, एनडीटीवी, सीएनएन−आईबीएन, मिड−डे, आजतक, समाचार एजेंसियां आईएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका आदि सभी किसी न किसी रूप में कनवरजेंस से लाभान्वित हो रहे हैं। टेलीविजन इंडस्ट्री के ज्यादातर बड़े चैनल इन दिनों मोबाइल प्लेटफॉर्म में दिलचस्पी ले रहे हैं। भारत में 3जी और 4जी मोबाइल सेवाओं के आगमन के साथ ही मोबाइल फोन पर टेलीविजन कार्यक्रम देखना संभव हो गया है। आजतक हो या एनडीटीवी सभी को आय के इस नए स्रोत का लाभ उठाना है। टीवी18 तो कनवरजेंस के मामले में औरों से काफी आगे बढ़ चुका है। वेब18 नामक एक स्वतंत्र इंटरनेट कंपनी खोलकर उसने अलग−अलग क्षेत्रों में कई बड़ी−बड़ी वेबसाइटें और पोर्टल शुरू किए हैं जिनमें मनीकंट्रोल.कॉम, कमोडिटीजकंट्रोल.कॉम और आईबीएनलाइव.कॉम तो बहुत सफल माने जाते हैं। उसका हिंदी पोर्टल जोश18.कॉम, सूचना प्रौद्योगिकी आधारित पोर्टल टेक2.कॉम आदि भी धीरे−धीरे सफलता की ओर बढ़ रहे हैं। टीवी18 का दावा है कि उसके इंटरनेट आधारित कारोबार में छह सौ फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। कनवरजेंस का प्रभाव विज्ञापनदाताओं पर भी पड़ रहा है और अब वे ऐसी कंपनी से अनुबंध करना पसंद करते हैं जो विभिन्न माध्यमों (टेलीविजन, प्रिंट, वेब, मोबाइल और रेडियो) पर एक साथ उनका संदेश प्रसारित कर सके।

कनवरजेंस में है समझदारी

कनवरजेंस का अर्थ है सम्मिलन। विषय वस्तु (कन्टेंट) के अलावा मीडिया के संदर्भ में इसके और भी रूप हो सकते हैं। टेलीविजन और प्रिंट की टीमों का एक ही दफ्तर में बैठना, आपसी चर्चाओं से अपनी−अपनी सामग्री को समृद्ध बनाना, जरूरत पड़ने पर एक दूसरे के लिए रिसोर्स परसन (जानकारी के स्रोत) के रूप में काम करना (एनडीटीवी.कॉम के संपादक का एनडीटीवी प्रोफिट पर होने वाली चर्चा में हिस्सा लेना) आदि भी कनवरजेंस का एक रूप है जिसे न्यूजरूम कनवरजेंस कहते हैं। कई मीडिया घराने अलग−अलग माध्यमों की टीमों को साथ−साथ बैठकें करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

मीडिया की कनवरजेंस का एक और रूप है न्यूज−गैदरिंग कनवरजेंस, जिसमें विभिन्न माध्यमों से जुड़े रिपोर्टर अपने मूल प्रकाशन या चैनल के लिए काम करने के साथ−साथ गाहे−बगाहे अपने समूह की अन्य मीडिया इकाइयों को भी सहयोग दे देते हैं। जैसे वायस ऑफ अमेरिका की रिपोर्टर आजतक टेलीविजन चैनल के लिए भी रिपोर्टिंग कर देती है क्योंकि आजतक और वायस ऑफ अमेरिका के बीच सहयोग का समझौता है। अगर टाइम्स ऑफ इंडिया का संवाददाता लंदन में हो रहे किसी सम्मेलन को कवर करने के लिए इंग्लैंड जाता है तो फिर टाइम्स नाऊ को वहीं पर अपना संवाददाता भेजने की जरूरत नहीं है। बेहतर यही होगा कि वह टाइम्स के संवाददाता से ही खबर ले ले और इस प्रक्रिया में बचे अपने मानव संसाधनों को कहीं और इस्तेमाल करते हुए अपने कवरेज का दायरा और भी विस्तृत कर ले। अलग−अलग माध्यमों के लिए अलग−अलग ढंग से काम करने की इस प्रक्रिया को 'मल्टी−टास्किंग' कहा जाता है। कनवर्जेंस का लाभ उठाने वाले मीडिया हाउस अपने स्टाफ को जरूरत पड़ने पर विभिन्न भूमिकाएं निभाने का प्रशिक्षण भी देते हैं। कनवरजेंस यह सब शुद्ध बचत और शुद्ध लाभ में रूपांतरित हो जाती है।

राजदीप सरदेसाई सीएनएन−आईबीएन चैनल पर एंकरिंग करने के साथ−साथ आईबीएनलाइव.कॉम पर स्तंभ भी लिख देते हैं। यदि इंडिया−एब्रोड के किसी संपादक की पश्चिम एशिया संबंधी मुद्दों पर विशेषज्ञता है तो गाजा पट्टी के हालात पर टिप्पणी करने के लिए रीडिफ.कॉम के अपने किसी कम अनुभवी विदेश संवाददाता की बजाए इस विशेषज्ञ संपादक से संपर्क करने में ही समझदारी है। कनवरजेंस विषय वस्तु की गुणवत्ता में भी सुधार करती है।

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