Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 19 मार्च 2013
श्रेणीः  भाषा
प्रकाशनः शुक्रवार पत्रिका
टैगः  यूनिकोड

लब्बोलुआबः

तकनीकी विश्व में हिंदी की बहार दिखाई देती है- सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग में। इनमें से पहला माध्यम चढ़ाव पर है तो दूसरे में ठहराव है। हर नए कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम (विंडोज, मैकिन्टोश, लिनक्स आदि) में यूनिकोड की कृपा से हिंदी-देवनागरी पहले से ही विद्यमान हैं। अधिकांश हैंडहेल्ड डिवाइसेज (टैबलेट्स, स्मार्टफोन्स आदि) में भी हिंदी लिखना नहीं तो कम से कम पढ़ना और हिंदी की इंटरनेट साइट्स को देखना तो संभव है ही।

Summary:

Thanks to Unicode, Hindi support is now visible almost eevrywhere: in the operating systems, in desktops, in tablets, in smartphones, in ordinary mobile phones and on Internet. However, there are certain important issues that need to be addressed if Hindi is to reach its ideal destination in the technological world.
तकनीक में हिंदीः तरक्की के बीच उभरती नई चिंताएँ

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

तकनीक की दुनिया में हिंदी की स्थिति उतनी दयनीय नहीं है, जितनी कि दूसरे कारोबारी क्षेत्रों में। खासकर पिछला एक दशक हिंदी के तकनीकी विकास की दिशा में अहम सिद्ध हुआ है। दस साल पहले हिंदी में डिजिटल युक्तियों पर काम करने के इच्छुक लोगों को जिस किस्म की उलझन और बेचारगी के अनिवार्य अहसास से गुजरना पड़ता था, वैसा अब नहीं रहा। थोड़ी-बहुत कोशिश कीजिए तो आप अधिकांश तकनीकी माध्यमों पर हिंदी में काम कर ही लेंगे। हालाँकि हिंदी आज भी अंग्रेजी, यूरोपीय भाषाओं, जापानी, रूसी और अरबी जितनी सबल, सक्षम और सशक्त नहीं हुई है, लेकिन उसने तरक्की निस्संदेह की है।

यह तरक्की नज़र भी आती है। हर नए कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम (विंडोज, मैकिन्टोश, लिनक्स आदि) में यूनिकोड की कृपा से हिंदी-देवनागरी पहले से ही विद्यमान हैं। अधिकांश हैंडहेल्ड डिवाइसेज (टैबलेट्स, स्मार्टफोन्स आदि) में भी हिंदी लिखना नहीं तो कम से कम पढ़ना और हिंदी की इंटरनेट साइट्स को देखना तो संभव है ही। हिंदी समर्थित वेब सर्विसेज (ईमेल, अनुवाद, टेक्स्ट टू स्पीच, ई-कॉमर्स, क्लाउड आधारित सर्विसेज) का उपभोग करना आसान है। अपने आसपास की तकनीकी सेवाओं में भी यदा-कदा हिंदी दिखने लगी है, जैसे एटीएम मशीनों पर। देवनागरी में टेक्स्ट इनपुट करने के ऑफलाइन, ऑनलाइन टूल्स की कोई कमी नहीं रही और करीब-करीब हर आधुनिक सॉफ्टवेयर पर, चाहे वह माइक्रोसॉफ्ट परिवार से आया हो या फिर एडोब परिवार से, यूनिकोड हिंदी में पूरा या थोड़ा काम किया जा सकता है। हालाँकि पेजमेकिंग, ग्राफिक्स, एनीमेशन आदि से जुड़े सॉफ्टवेयरों में हिंदी का शत-प्रतिशत समर्थन न होना थोड़ा सा निराशाजनक है।

अद्यतन टिप्पणीः एडोबी, क्वार्क और कोरल ड्रॉ के नए संस्करणों में हिंदी यूनिकोड समर्थन है किंतु उसके लिए अलग से कन्फीगरेशन की जरूरत पड़ती है या फिर अतिरिक्त टूल्स का प्रयोग करना पड़ता है।

तकनीकी विश्व में हिंदी की बहार दिखाई देती है- सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग में। इनमें से पहला माध्यम चढ़ाव पर है तो दूसरे में ठहराव है। जिस अंदाज में हिंदी विश्व ने फेसबुक को अपनाया है, वह अद्भुत है। दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों को भूल जाइए, लखनऊ, पटना और जयपुर जैसी राजधानियों को भी भूल जाइए, छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों तक के युवा, बुजुर्ग, बच्चे फेसबुक पर आ जमे हैं और खूब सारी बातें कर रहे हैं- हिंदी में। सोशल नेटवर्कों की हिंदी भी अपने आप में विलक्षण है- हिंदी, अंग्रेजी, देशज, तकनीकी, चित्रात्मक और अनौचपारिक शब्दावली से भरी हुई। लेकिन है बहुत दिलचस्प। आप चाहें तो इस हिंदी का छिद्रान्वेषण कर उसकी भाषायी सीमाओं, त्रुटियों और विसंगतियों पर थीसिस लिख सकते हैं लेकिन यदि आप हिंदी के प्रसार में दिलचस्पी रखते हैं तो यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह है तो हिंदी ही। शायद हिंदी की एक अलग खुशबू। कौन जाने आगे चलकर सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग से उपजी शब्दावली, वाक्य-विन्यास और भाषिक प्रवृत्तियाँ मुख्यधारा की हिंदी पर भी कोई न कोई असर डालें।

सोशल क्रांति के साथ बढ़ती भाषा

पिछले तीन-चार साल में यदि तकनीकी दुनिया में हिंदी से जुड़ी कोई क्रांति दिखाई देती है तो वह है सोशल नेटवर्किंग की क्रांति। चूँकि संदेशों का आदान-प्रदान नेटवर्किंग की मूलभूत अनिवार्यता और पहचान है, इसलिए वह एक से दो, दो से चार लोगों को आपस में संपर्क करने के लिए प्रेरित कर रही है। और संदेश जब तक अपनी भाषा में न हों, अपने आसपास के परिवेश से जुड़े हुए न हों तब तक न तो बात कहने वाले को तसल्ली देते हैं और न ही उसे सुनने वाले को। अंग्रेजी में संदेश भेजकर देखिए। अगर आपकी मातृभाषा हिंदी है तो आपको एक कसक सी महसूस होगी। लगेगा कि अभिव्यक्ति में वह बात नहीं आई। लेकिन उसी को हिंदी, बंगला, गुजराती या तमिल में भेजकर देखिए तो सुकून महसूस होगा। अपनी मातृभाषा माँ के समान है, जिसके साथ कोई संकोच, कोई परदा, कोई औपचारिकता और कोई आडम्बर करने की जरूरत नहीं है। जैसा सोचते हैं, वैसा लिख सकते हैं। तकनीकी दुनिया में हिंदी जैसी भाषाओं को आगे बढ़ाने के लिए फेसबुक एक बहुत अच्छा उपकरण सिद्ध हो सकता है।

हजारों लोग जो हिंदी में टाइपिंग करना नहीं जानते थे, वे सिर्फ इसलिए टाइपिंग के टूल्स की तलाश में लगे हैं ताकि वे हिंदी में संदेश भेज सकें। दूसरे हजारों लोग ऐसा सफलतापूर्वक कर भी चुके हैं। बहुतों ने खास तौर पर इसीलिए हिंदी में टाइपिंग सीखी है। उनकी छोटी-छोटी टिप्पणियाँ हिंदी की समन्वित शक्ति में इजाफ़ा कर रही हैं।

क्या सोशल नेटवर्किंग हमारी भाषा को विकृत भी कर रही है? हाँ, यकीनन। क्योंकि जिस अंदाज में वह हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनती जा रही है, उसमें प्रयुक्त भाषा का बहाव दैनिक जीवन तक भी होना स्वाभाविक है। बहुत से लोग धीरे-धीरे उन शब्दों को अपना लेंगे जिनकी रचना फेसबुक की उर्वर भूमि पर हुआ है। किंतु यह भाषा पर है कि वह किस समझदारी के साथ अपने आपको विकृतियों से मुक्त रखते हुए नए शब्दों को अपनाती है। आवश्यक नहीं कि ये शब्द परिनिष्ठित हिंदी का हिस्सा बनें लेकिन हमारी समग्र शब्दावली का हिस्सा वे जरूर बन सकते हैं क्योंकि भाषा वही आगे बढ़ती है जो तरल और बहती हुई है, जो नए तत्वों से वितृष्णा नहीं रखती बल्कि ‘सार सार को गहि रहे, थोथा देहि उड़ाय’ वाली प्रवृत्ति से युक्त है।

हिंदी में अभिव्यक्ति की उत्कंठा सिर्फ यहीं नहीं है। जहाँ कहीं भी संचार की आवश्यकता है, वहाँ-वहाँ यह उत्कंठा, यह आकांक्षा, यह बेचैनी दिखाई देती है।

इंटरनेट के संदर्भ में मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि कन्टेन्ट या विषय वस्तु ने हिंदी का जितना प्रसार किया है, उससे कहीं अधिक उसका प्रसार संचार के तकनीकी साधनों ने किया है। आज टैबलेट्स और स्मार्टफोन्स के युग में भी हम उसी परिघटना को अनुभव कर रहे हैं जो कुछ साल से सोशल नेटवर्किंग और ब्लॉगिंग के संदर्भ में देखते आए थे।

भारत में प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोत्तरी हुई है, शिक्षा का भी प्रसार हुआ है और तकनीकी चीज़ों के प्रति संदेह का भाव कम हुआ है। ये चीजें आर्थिक दृष्टि से भी लोगों की पहुँच में आ रही हैं। उसी के साथ-साथ संवाद की जरूरत भी पढ़ रही है और वहाँ अपनी भाषा की जरूरत पड़ ही जाती है। लोग लंबे समय तक रोमन में एसएमएस मोबाइल संदेश भेजते रहे सिर्फ इसलिए कि उनके मोबाइल फोन में हिंदी टाइप करने का कोई जरिया नहीं था और बिना हिंदी में अपनी बात कहे संतुष्टि नहीं होती।

दूरसंचार और हिंदी

इस बीच मोबाइल फोन, खासकर स्मार्टफोन की क्षमता बढ़ी है तो उनमें एक से अधिक भाषाओं की सुविधाएँ समाहित करना अपेक्षाकृत आसान हो गया है। कोई तकनीकी रुकावट नहीं है। अगर रुकावट है तो कंपनियों के स्तर पर, जो अलग-अलग उत्पाद को अलग-अलग वर्ग को ध्यान में रखकर बाजार में उतारती हैं। उन्हें लगता है कि किसी खास मोबाइल फोन में हिंदी होनी जरूरी है क्योंकि यह आम लोगों तक पहुँचने वाला है। दूसरी ओर कुछ महँगे, आधुनिक और स्मार्ट किस्म के फोन्स में हिंदी टेक्स्ट इनपुट की अनिवार्यता उन्हें महसूस नहीं होती क्योंकि उन्हें लगता है कि जो वर्ग इन्हें खरीदने वाला है वह तो पहले ही अंग्रेजीदाँ बन चुका है, और उसे हिंदी में संदेश भेजने की क्या जरूरत पड़ेगी? जैसे-जैसे हम खाँटी हिंदी प्रेमियों की आर्थिक क्षमता बढ़ रही है, उनकी यह धारणा टूटेगी और एक-एक कर सब हिंदी की शरण में आ जाएंगे। हिंदी के पास संख्या बल और बाजार जो है।

इस बीच, दूरसंचार जगत में एंड्रोइड ऑपरेटिंग सिस्टम काफी लोकप्रिय हो गया है। यह गूगल की तरफ से शुरू की गई ओपन सोर्स परियोजना है जिसमें दुनिया भर के लाखों डेवलपर्स हाथ बँटाते हैं लेकिन इसके विकास को सही दिशा में सुसंगठित ढंग से आगे बढ़ाने का दायित्व गूगल का है। फ्री और ओपन सोर्स होने के नाते इसे कोई भी मोबाइल डिवाइस निर्माता अपने उत्पाद में निःशुल्क इस्तेमाल कर सकता है। अच्छी बात यह है कि यह बेहद ताकतवर भी है, लगभग एपल के आईओएस जितना ही, जो एपल की निजी संपदा (प्रोपराइटरी ऑपरेटिंग सिस्टम) है। एपल के उत्पादों का सुंदर-सुघड़ चेहरा-मोहरा, कामकाज की तेजी व सहजता, और सबसे अहम टच-स्क्रीन आधारित कमांड्स इसी आईओएस ऑपरेटिंग सिस्टम की बदौलत हैं। लेकिन एपल का ऑपरेटिंग सिस्टम सिर्फ उसी के उत्पादों (आईफोन, आईपैड) आदि में इस्तेमाल हो सकता है।

अच्छी बात यह है कि आईओएस और एंड्रोइड दोनों के नए संस्करणों में हिंदी-देवनागरी समर्थन मौजूद है। इस बीच माइक्रोसॉफ्ट परिवार की ओर से भी विंडोज 8 के रूप में नया ऑपरेटिंग सिस्टम जारी किया जा रहा है जो डेस्कटॉप के साथ-साथ टैबलेट्स और स्मार्टफोन्स के भी अनुकूल है। अपने उत्पादों में हिंदी समर्थन देने के मामले में माइक्रोसॉफ्ट दूसरी कंपनियों से आगे है और विंडोज 8 में भी यही स्थिति है। जाहिर है, टैबलेट की दुनिया में होने वाली उसकी पहली पेशकश ‘सरफेस’ के लिए भी हिंदी अनजान नहीं रहेगी।

एंड्रोइड की अहमियत

विंडोज 8 और आईओएस तो ठीक है, लेकिन एंड्रोइड में हिंदी की मौजूदगी की खास अहमियत है। निःशुल्क होने के कारण आज ज़्यादातर टैबलेट्स और स्मार्टफोन्स में, भले ही उन्हें नोकिया-सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियों ने निर्मित किया हो या फिर कार्बन मोबाइल जैसी छोटी कंपनियों ने, एंड्रोइड का खूब इस्तेमाल हो रहा है। उसमें हिंदी की मौजूदगी का अर्थ है, इन सभी मोबाइल डिवाइसेज में हिंदी का समर्थन। कंप्यूटरों में लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम भी फ्री और ओपन सोर्स मॉडल को लेकर आया था, लेकिन नाकाम हो गया था। सौभाग्य से उसी लिनक्स पर आधारित एंड्रोइड मोबाइल डिवाइसेज में कुछ यूँ छा गया है कि जिस स्मार्टफोन या टैबलेट में देखो एंड्रोइड ही नजर आता है। भारत सरकार की तरफ से जारी किए गए आकाश टैबलेट में भी यह था तो बीएसएनएल और एमटीएनएल की तरफ से जारी किए गए टैबलेट्स में भी मौजूद है। एंड्रोइड का सबसे ताजा संस्करण है एंड्रोइड 4.1, हालाँकि एंड्रोइड 2.3 के जमाने से ही उसमें हिंदी समर्थन मौजूद है। आकाश में हिंदी नहीं थी क्योंकि उसमें एंड्रोइड 2.2 इस्तेमाल किया गया था। नए संस्करणों में एंड्रोइड 2.3 (जिंजरब्रैड) मौजूद होगा। हार्डवेयर कंपनियाँ जितने बेहतर ऑपरेटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करेंगी, हिंदी के प्रति अनुकूलता उतनी ही बढ़ती जाएगी।

मोबाइल और टैबलेट्स के क्षेत्र में एप्लीकेशन्स ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है और जिन मोबाइल डिवाइसेज में ऑपरेटिंग सिस्टम के स्तर पर हिंदी का समर्थन मौजूद नहीं है उनमें एप्लीकेशन्स और इंटरनेट ब्राउज़र के जरिए हिंदी का इस्तेमाल संभव हो गया है। हालाँकि अभी तक दूरसंचार उपकरणों में उस किस्म का सार्वत्रिक यूनिकोड हिंदी समर्थन मौजूद नहीं है जैसा कि डेस्कटॉप, लैपटॉप, अल्ट्राबुक्स और नेटबुक्स (जिन्हें कंप्यूटर की श्रेणी में गिना जाता है) में है। अलबत्ता, जैसे-जैसे प्रयोक्ताओं की संख्या बढ़ेगी, उसका आना तय है। इस लिहाज से अगले दो-तीन साल महत्वपूर्ण रहेंगे।

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