Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 19 मार्च 2013
श्रेणीः  साइबर वार
प्रकाशनः शुक्रवार पत्रिका
टैगः  इंटरनेट

लब्बोलुआबः

भारत सरकार ने साइबर चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया है। बदलते जमाने में, जब सब कुछ इंटरनेट और संचार नेटवर्कों पर निर्भर हो गया है, अपने साइबर तंत्र को सुरक्षित रखना राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शुमार हो चुका है।

Summary:

India is finally realising that challenges coming from the cyber space need to be taken more seriously. Not just for cyber crime and cyber terrorism, Internet is certain to be used for cyber war as destroying any country's communication system today can virtually turn it into a sitting duck.
साइबर कमान, क्योंकि अगली जंग इंटरनेट पर होगी

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अमेरिका ने सन 2009 में अपनी सेना की ‘साइबर कमान’ का गठन किया था। इस फैसले ने सबको चौंकाया था। इंटरनेट के जरिए होने वाले छोटे-मोटे वायरस अटैक और हैकिंग के हमले सुने थे लेकिन क्या हालात इतने गंभीर हैं कि विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति को जल, थल और वायुसेना की तरह बाकायदा साइबर जगत के लिए अलग से फौजी शाखा बनानी पड़े? बाद के तीन साल में दुनिया को समझ आ गया कि साइबर हमलों की चुनौती कितनी बड़ी है। आज दुनिया की बड़ी-बड़ी सैन्य शक्तियाँ ‘साइबर युद्ध’ और ‘साइबर आतंकवाद’ से निपटने की रणनीतियाँ बनाने में जुटी हैं। अब भारत भी उनमें शामिल हो गया है।

हमारे यहाँ अब तक दो सरकारी एजेंसियाँ साइबर चुनौतियों के समाधान में लगी थीं- प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत चलने वाला नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एनटीआरओ) और केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पोंस टीम (सीईआरटी-इन)। लेकिन ये एहतियाती संस्थान हैं और पिछले पाँच साल में गंभीर से गंभीरतम होते साइबर हमलों ने सिद्ध कर दिया है कि समस्या सिर्फ हमलों को किसी तरह रोकने की नहीं है। जरूरत है, डिजिटल माध्यमों से होने वाले युद्ध (डिजिटल वारफेयर) में दक्षता हासिल करने की क्योंकि बदले हुए जमाने में जंग का मतलब सिर्फ हथियारों से लड़ी जाने वाली जंग नहीं है। अगली जंग का एक बड़ा हिस्सा साइबर स्पेस में लड़ा जाना है। वहाँ रक्षात्मक होने से काम नहीं चलेगा क्योंकि आक्रमण ही सर्वश्रेष्ठ बचाव है।

भारत सरकार ने साइबर चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के नक्शेकदम पर चलने का फैसला किया है। बदलते जमाने में, जब सब कुछ इंटरनेट और संचार नेटवर्कों पर निर्भर हो गया है, अपने साइबर तंत्र को सुरक्षित रखना राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शुमार हो चुका है।

हमारी साइबर कमान न सिर्फ साइबर हमले रोकने के लिए जरूरी सिस्टम का विकास करेगी बल्कि हमलों की स्थिति में तुरत-फुरत हालात को जल्दी से जल्दी सामान्य करने और नुकसान को न्यूनतम स्तर तक सीमित करने में भी जुटेगी। अगर जरूरत पड़ी तो ऐसे हमलों के जवाब में 'हमलावर कदम' भी उठाए जाएंगे। भारत सरकार ने साफ किया है कि हम दूसरे देशों के विरुद्ध साइबर जासूसी या साइबर हमलों में लिप्त नहीं होंगे। लेकिन दुनिया का कोई भी देश घोषणा करके साइबर जासूसी या हमलावर कार्रवाइयाँ नहीं करता। साइबर हमलों के लिए सर्वाधिक बदनाम चीन ने आज तक स्वीकार नहीं किया है कि ऐसी किसी घटना में उसका हाथ है। एक बार तो खुद चीनी टेलीविजन पर गलती से उनके साइबर हमलों की फिल्म प्रसारित हो गई थी। लेकिन चीन सरकार ने तब भी ऐसे हमलों में अपनी भूमिका को स्वीकार नहीं किया। वह कभी मानेगी भी नहीं।

बहरहाल, भारत इस कार्रवाई को और टालता तो बड़ा जोखिम होता। पिछले चार साल में हमारे सरकारी ठिकानों पर होने वाले साइबर हमलों की संख्या पाँच गुना हो चुकी है। सन 2007 में यह 217 थी जो सन 2010 में 966 और सन 2011 में 1000 से ज्यादा हो गई। पिछले साल हम ‘स्टक्सनेट’ के हमले से परेशान रहे तो इस बार ‘फ्लेम’ से। ये दोनों खास मकसद के लिए तैयार किए गए बेहद खतरनाक वायरस हैं जो कंप्यूटर और संचार नेटवर्कों को ठप कर सकते हैं।

भारत सरकार की जवाबी रणनीति के तहत डिफेन्स इंटेलीजेंस एजेंसी (डीआईए) और नेशनल टेक्निकल रिसर्च ओर्गनाइजेशन (एनटीआरओ) को जरूरत पड़ने पर जवाबी साइबर कार्रवाइयाँ करने का जिम्मा सौंपा जाएगा। दूसरी खुफिया एजेंसियों को भी दुनिया भर से इंटरनेट के जरिए खुफिया सूचनाएँ जुटाने का काम सौंपा जाएगा, लेकिन हमलावर कार्रवाइयों में उनकी भूमिका नहीं होगी। कंप्यूटर इमरजेंसी रेस्पोंस टीम इंडिया या सीईआरटी-इन (जिसे सर्ट-इन भी कहते हैं) का जिम्मा साइबर जगत की एहतियाती सुरक्षा का होगा। वह हमारे इंटरनेट, संचार और सरकारी सूचना नेटवर्क को सुरक्षात्मक कवच मुहैया कराएगा। एनटीआरओ के जरिए नेशनल क्रिटिकल इन्फॉरमेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर सेंटर (एनसीआईपीसी) भी कायम किया जा रहा है जो सारे संवेदनशील ढांचे की लगातार निगरानी करेगा। चौबीसों घंटे चलने वाला यह केंद्र हमारे साइबर ढांचे में सेंध लगाने की कोशिशों का मौके पर ही जवाब देता रहेगा। खुफिया ब्यूरो (आईबी), केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई), नेशनल इन्टेलीजेंस एजेंसी (एनआईए) और यहाँ तक कि पुलिस बलों को भी, जहाँ जरूरत हुई, कार्रवाई की प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा।

कितनी गंभीर है यह समस्या

प्रतिद्वंद्वी देशों के गुप्त राज इकट्ठे करने और उनके प्रशासनिक तंत्र को छिन्न-भिन्न करने का दायित्व अब साइबर जासूसों और हैकरों की ऐसी फौज़ों ने संभाल लिया है जिसे सामने आने की जरूरत ही नहीं। इंटरनेट युग में दूरी का कोई अर्थ नहीं रहा। हजारों किलोमीटर दूर बैठे कुछ दक्ष कंप्यूटर विशेषज्ञ दुनिया की बड़ी से बड़ी शक्तियों पर साइबर हमले कर इतनी सफाई से निकल जाते हैं कि सबूत ढूंढे से भी नहीं मिलते। इन हमलों में कभी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बेशकीमती राज चुरा लिए जाते हैं, कभी तकनीकी प्रणालियों को नुकसान पहुँचाकर कंप्यूटर नेटवर्क ठप कर दिए जाते हैं और कभी प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र के सर्वरों पर कब्ज़ा जमा लिया जाता है। साइबर अपराध, साइबर आतंकवाद, साइबर जासूसी और हैकिंग अब कोई तकनीकी शब्द नहीं रहे। लगभग रोजाना ही सरकार, प्रशासन और कारोबार के किसी न किसी अहम हिस्से को हैकिंग के हमलों से गुजरना पड़ रहा है, फिर भले ही वह हमारा रक्षा मंत्रालय हो, सेना हो, मिसाइल प्रणालियाँ हों, विदेश मंत्रालय हो या फिर खुद प्रधानमंत्री का कार्यालय। जिस साइबर वार का जिक्र पहले विज्ञान कथाओं में होता था, वह शीतयुद्ध-पश्चात के इस दौर में हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

नए जमाने की लड़ाई अप्रत्यक्ष रूप से लड़ी जानी है जिसमें हथियारों का इस्तेमाल किए बान ही प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र के सुरक्षा, संचार, ऊर्जा, बैंकिंग, कारोबारी तथा प्रशासनिक ढांचे को पंगु बना दिया जाए। कंप्यूटर, इंटरनेट और संचार के शक्तिशाली साधन इस तरह के विध्वंसक एजेंडा को लागू करने के उपयोगी औजार बन गए हैं। ऐसे अनजान हमलावरों की पहचान बहुत मुश्किल है, जवाबी कार्रवाई की तो बात ही छोड़ दीजिए।

अफसोस की बात है कि आईटी की बहुत बड़ी ताकत होने के बावजूद हम साइबर सुरक्षा के मामले में न तो जागरूक हैं और न ही तैयार। इतने बड़े ठिकानों पर इतनी आसानी से सालों-साल होने वाले विदेशी हैकरों के क्या हमारी आई-टी विशेषज्ञता पर सवालिया निशान खड़ा नहीं करते? और क्या वे एक उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय ताकत होने के हमारे दावे की कलई नहीं खोलते?

कैस्परस्की नामक एंटीवायरस कंपनी के संस्थापक यूजीन कैस्परस्की ने हाल ही में कहा था कि भारत सरकार और यहाँ के संगठनों के विरुद्ध विशाल साइबर हमले होना रोजमर्रा की बात है। और इनमें से ज्यादातर हमले सफल रहते हैं। जाने-माने एंटी वायरस विशेषज्ञ मिक्को हिप्पोनेन का कहना है- मुझे नहीं लगता कि भारत सरकार को इस बात का अहसास भी है कि उसके सामने साइबर हमलों की चुनौती कितनी बड़ी है!

ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 2010-11 में यहाँ 2.99 करोड़ लोग साइबर हमलों के शिकार हुए और इनसे लगभग 34,110 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

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