Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 19 मार्च 2013
श्रेणीः  व्यक्तित्व
प्रकाशनः नवभारत टाइम्स
टैगः  एपल

लब्बोलुआबः

स्टीव जॉब्स का भारत से संक्षिप्त किंतु गहरा संबंध रहा। विशेषकर धर्म और अध्यात्म के प्रति समझबूझ पैदा करने की उनकी आकांक्षा के संदर्भ में। लेकिन बाद में भारत से उनका ऐसा मोहभंग हुआ कि उन्होंने समाजवाद और स्पिरिचुअल एनलाइटनमेंट जैसे चैप्टर बंद ही कर दिए और उस रास्ते पर चल पड़े जिसने कुछ साल बाद उन्हें तकनीकी दुनिया का महारथी बनाया।

Summary:

Steve Jobs had a special relationship with India as in his initial years he was inquisitive about concepts such as spiritual enlightenment. However, in the later part of his life he was disillusioned from India and the country did not figure in his list of countries to expand Apple footmarks to.
भारत और स्टीव जॉब्सः विरोधाभासों भरा रिश्ता रहा जीवन भर

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के आइकन्स में से एक, स्टीव जॉब्स ने अपनी मशहूर आत्मकथा ‘द लिटिल किंग्डमः द प्राइवेट स्टोरी ऑफ एपल कंप्यूटर’ में भारत से वापसी का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘संभवतः पहली बार मुझे अहसास हुआ कि टॉमस एल्वा एडीसन ने दुनिया को बेहतर बनाने के लिए उससे कहीं ज्यादा योगदान दिया है जितना कि कार्ल मार्क्स और नीम करोली बाबा ने मिलकर दिया होगा।’ कुछ अरसा बाद जिन्हें दुनिया ने शीर्ष कंप्यूटर कंपनी ‘एपल’ के संस्थापक के रूप में जाना, उन स्टीव जॉब्स की यह प्रतीकात्मक टिप्पणी तीन अलग-अलग ध्रुवों, अलग-अलग विचारधाराओं और दुनियाओं के बरक्स उनकी फिलॉसफिकल पोजीशन को साफ कर देती है। यह उनके उस मोहभंग को अभिव्यक्त करती है जो आध्यात्म का प्रकाश पाने और तीसरी दुनिया को जानने-समझने की उनकी किशोर-सुलभ कोशिश की नाकामी के समय हुआ था, जब 1970 के दशक में वे पहली बार भारत आए और लौटे थे।

भारतीय आध्यात्म ने उन्हें छुआ जरूर था, उनके व्यक्तित्व पर भी इसका असर रहा होगा जो जीवन के अंतिम वर्षों में किए गए उनके फिलॉसफिकल कमेंट्स और बिल गेट्स को दी गई उनकी इस सलाह से जाहिर होता है कि अगर गेट्स कुछ समय के लिए सबकुछ छोड़कर किसी आश्रम में चले गए होते तो वे और माइक्रोसॉफ्ट आज के जैसे संकीर्ण नहीं बल्कि उदार होते। लेकिन एक बार भारत से लौटने के बाद उन्होंने अपने व्यावहारिक या व्यावसायिक जीवन में भारतीय दर्शन और आध्यात्म को कोई विशेष महत्व दिया हो, ऐसा दिखाई नहीं देता। बल्कि ऐसा लगता है कि जाने या अनजाने में खुद उन्होंने और ‘एपल’ ने भारत से रणनीतिक दूरी बनाए रखी। कंप्यूटर, संगीत, संचार और मनोरंजन के क्षेत्रों में दुनिया को मुट्ठी में कर लेने वाले स्टीव जॉब्स को भारत ने फिर कभी उस तरह नहीं खींचा। न हमारे बाजार ने, न यहाँ अपने उत्पादों की इकाइयाँ लगाने के शानदार व्यावसायिक अवसरों ने और न ही इतनी बड़ी जनसंख्या ने। भारत में माइक्रोसॉफ्ट, सन, ओरेकल, गूगल, आईबीएम, डेल और एक्सेंचर जैसी कंपनियों की विशाल उपस्थिति को देखते हुए ‘एपल’ की निठुराई को समझना मुश्किल है।

अठारह साल की उम्र में भारत से वापसी के समय उनके मन पर इस देश का जो अक्स बना वह एक गरीब और कोलाहल भरे देश का था। इसने न सिर्फ उन्हें निराश किया बल्कि शायद उनके मन पर अंत तक हमारी यही तसवीर बनी रही। उन्होंने हाल तक हमें अपने अहम बाज़ार के रूप में नहीं लिया, जो एक तरह से सही भी था। ‘एपल’ के ज्यादातर उत्पाद क्रांतिकारी और उपयोगी होते हुए भी सामान्य भारतीय नागरिक की आर्थिक पहुँच में नहीं रहे हैं। मैकिन्टोश को एक वर्ग विशेष के लिए बनाया गया कंप्यूटर माना गया जो मध्यवर्गीय जनसंख्या के हाथों संचालित भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मुफीद नहीं था। यह अलग बात है कि पिछले कुछ साल में भारत में आर्थिक तरक्की हुई है और आबादी का एक तबका सक्षम बन गया है। यह तबका आइ-पॉड, आइ-फोन और आइ-पैड का खरीददार है। लेकिन यह आज की तसवीर है, जो स्टीव के देखे भारत की तसवीर से अलग है।

भारत के प्रति उनके उपेक्षापूर्ण रुख का एक और कोण है जो उनकी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान देखे गए विरोधाभासों और भारतीय समाज की विषमताओं से जुड़ा है। संभवतः यहाँ आकर उन्होंने जाना कि दर्शन और आध्यात्म जमीनी स्तर पर लोगों का जीवन बदलने वाली चीज़ नहीं है? शायद उन्होंने महसूस किया कि कर्म आध्यात्म से ज्यादा बड़ी चीज़ है जो खुद अपने साथ-साथ बाकी दुनिया को भी बहुत कुछ देता है। इसी ‘कर्म’ का जिक्र उन्होंने कई अहम अवसरों पर किया है और इसी के जरिए वे ‘एपल’ तथा पिक्सर एनीमेशन को कामयाबी के शिखर तक ले गए। उस लिहाज से, भारत यात्रा ने उनके सोच को इस तरह से नहीं तो उस तरह से जरूर प्रभावित किया था।

भारत से लौटने के बाद उन्होंने समाजवाद और स्पिरिचुअल एनलाइटनमेंट जैसे चैप्टर बंद ही कर दिए और उस रास्ते पर चल पड़े जिसने कुछ साल बाद उन्हें तकनीकी दुनिया का महारथी बनाया।

सन 2006 में ऐसी खबरें आई थीं कि एपल बंगलुरु में 3000 कर्मचारियों वाला मैक सपोर्ट सेंटर खोलने जा रहा है। इसके लिए कुछ लोगों की भर्तियाँ भी कर ली गई थीं और उम्मीद थी कि गाहे बगाहे भारत यात्रा पर आने वाले माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स की तरह स्टीव भी अब जरूर भारत आएंगे और यहाँ के हालात का नए सिरे से आकलन करेंगे। लेकिन कहा जाता है कि एपल को नया भारत महंगा महसूस हुआ। यहाँ खर्चे ज्यादा थे, अच्छे कर्मचारियों को ढूंढने की प्रतिद्वंद्विता भी ज्यादा थी। स्टीव की नज़र में यहाँ केंद्र खोलना उतना सस्ता नहीं रह गया था जितना कि कुछ साल पहले था। यह एक और विरोधाभास था, जिसने स्टीव को भारत के करीब नहीं आने दिया। भारत के अनुकूल न होने की किशोरावस्था में बनी छवि शायद अंत तक उनके मन पर कायम रही। यही वजह है कि आइ-पॉड, आइ-फोन और आइ-पै जैसे क्रांतिकारी उत्पादों को लांच करने और लोकप्रिय बनाने के मामले में भी भारत पर उनकी नज़र नहीं गई। यहाँ के बाजार में नोकिया और ब्लैकबेरी की ही धूम रही, एपल ने उन्हें टक्कर देने की खास कोशिश ही नहीं की।

काश! स्टीव ने भारत को उसके नए संदर्भों में समझने की एक गंभीर कोशिश की होती। वे उसी तरह इस देश के युवाओं के भी आइकन थे, जैसे कि बाकी दुनिया के। भारत में भी उनकी तकनीकी प्रतिभा, व्यावसायिक कौशल और सौंदर्यशास्त्र के वैसे ही मुरीद हैं, जैसे कि बाकी दुनिया में। एपल से इतनी दूरी के बावजूद आज भी आइ-फोन के एप्लीकेशंस का दसवाँ हिस्सा भारत में विकसित किया जाता है। विरोधाभासों से भरे भारत और स्टीव के अनोखे रिश्ते में नुकसान दोनों का हुआ। अगर वे कुछ और करीब होते तो कौन जाने एपल की सफलता में भी भारतीयों का उतना ही योगदान होता जितना कि माइक्रोसॉफ्ट और गूगल में है। जो भी हो, एक अद्वितीय तकनीकी शिखर पुरुष, विज़नरी, क्रांतिकारी उद्यमी और विद्रोही विचारक के रूप में भारत को स्टीव जॉब्स से आज भी उतना ही प्यार है, जितना कि तब होता।

महज 56 साल की उम्र में स्टीव जॉब्स का चला जाना न सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी जगत बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा आघात है। वे सिर्फ सपने देखने वाले ही नहीं थे, वे सपनों को सच करके दिखाने वाले ऐसे अद्वितीय इंसान थे जिन्होंने अपनी तकनीकों, उत्पादों और विचारों के जरिए विश्व में क्रांतिकारी बदलावों को जन्म दिया। स्टीव जॉब्स सामान्य वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और तकनीशियनों से अलग थे। वे एक अन्वेषक, शोधकर्ता और आविष्कारक थे। आईटी की दुनिया में तकनीक का सृजन करने वाले तो बहुत हैं लेकिन उसे सामान्य लोगों के अनुरूप ढालने और तकनीक को खूबसूरत, प्रेजेन्टेबल रूप देने वाले बहुत कम। स्टीव जॉब्स एक बहुमुखी प्रतिभा, एक पूर्णतावादी, करिश्माई तकनीकविद् और अद्वितीय 'रचनाकर्मी' थे, तकनीक के संदर्भ में उन्हें एक पूर्ण पुरुष कहना गलत नहीं होगा।

हर कोई उनके काम और जीवन से कितना कुछ सीख सकता है। तकनीक में वे शीर्ष पर पहुंचे, डिजाइन में उनका कोई सानी नहीं था, मार्केटिंग तथा ब्रांडिंग के दिग्गज भी उनकी रणनीतियों का विश्लेषण करने में लगे रहते थे, मैन्यूफैक्चरिंग में उनका कोई जवाब नहीं था, उत्पादों की यूजेबिलिटी पर उन्हें चुनौती देना मुश्किल था। वे आगे चलने वाले व्यक्ति थे, बाकी लोग बस उनका अनुगमन करते थे- येन महाजनो गतः सः पंथा। स्टीव इस सहस्त्राब्दि की प्रतिभाओं में गिने जाएंगे जैसे लियोनार्दो द विंची, टामस एल्वा एडीसन, डार्विन, आइंस्टीन, न्यूटन आदि हैं। खासतौर पर वे लियोनार्दो द विंची के बहुत करीब खड़े दिखते हैं, जिन्होंने विज्ञान और तकनीक ही नहीं, और भी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा की चिरंजीवी छाप छोड़ी।

तरक्की के रास्ते के नए-नए राही हम भारतीयों को उनके कर्म और इस दर्शन से बहुत कुछ सीखना है कि ‘तुम्हारा जीवन बहुत सीमित है, इसे दूसरों का जीवन जीते हुए नष्ट मत करो। दूसरों के विचारों के शोर को अपनी अंदरूनी आवाज़ पर हावी मत होने दो। और सबसे जरूरी यह कि अपने दिल की बात सुनो, उसे साकार करने की हिम्मत दिखाओ। वही सबसे जरूरी है, बाकी सब बाद में आता है।‘

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