Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 19 मार्च 2013
श्रेणीः  टैबलेट्स
प्रकाशनः शुक्रवार पत्रिका
टैगः  आकाश

लब्बोलुआबः

नए 'आकाश' टैबलेट में कैपेसिटिव स्क्रीन के कारण टच कमांड बेहतर हो गई हैं, प्रोसेसर पहले से कहीं ताकतवर, मेमरी पहले से ज्यादा और नतीजतन स्पीड भी बाजार में उपलब्ध महंगे टैबलेट्स के मुकाबले की। लेकिन हार्डवेयर जितना ही ज़रूरी है, इस टैबलेट के जरिए छात्रों तक अच्छा कन्टेन्ट पहुँचाना। उस मोर्चे पर कितना काम हुआ है?

Summary:

Aakash tablet is here in its better, fast and much more responsive avatar which is undoubtedly a commendable effort. But what about the content that is to be delivered by these gadgets? How fast are we moving on that front?
'आकाश': हार्डवेयर ज़रूर बेहतर हुआ मगर कन्टेन्ट कहाँ है

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत के आकाश टैबलेट का नया अवतार पहले से काफी बेहतर है। कैपेसिटिव स्क्रीन के कारण टच कमांड बेहतर हो गई हैं, प्रोसेसर पहले से कहीं ताकतवर, मेमरी पहले से ज्यादा और नतीजतन स्पीड भी बाजार में उपलब्ध महंगे टैबलेट्स के मुकाबले की। ऐसा नहीं कि वह एपल के मशहूर आई-पैड का विकल्प बन गया है, लेकिन हाँ आम उपभोक्ता की सामान्य कंप्यूटर-इंटरनेट आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है आकाश-2, जिसे लंबे विवादों, खबरों और इंतजार के बाद पिछले महीने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने जारी किया था।

आकाश ने अपनी नगण्य कीमत और प्रोफेशनल क्वालिटी की क्षमताओं के चलते भारत के शिक्षा जगत में बहुत उम्मीदें जगाई थीं। भारत ही क्यों, दुनिया भर में उसकी जितनी चर्चा हुई, हाल फिलहाल शायद टाटा नैनो के अलावा किसी अन्य भारतीय उत्पाद की ऐसी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं हुई हो। लेकिन आकाश को जितनी सकारात्मक पब्लिसिटी मिली, उससे कहीं अधिक नकारात्मक पब्लिसिटी मिल गई। इसके पीछे राजनैतिक कारण भी होंगे और कारोबारी वजहें भी, लेकिन खुद आकाश की कमियों तथा उनसे भी बढ़कर सारी परियोजना की बद-इंतजामी ने भी इस महत्वाकांक्षी और सार्थक गैजेट को बदनाम करने में कसर नहीं छोड़ी। अच्छी बात है कि सरकार ने नकारात्मक पब्लिसिटी से प्रभावित होकर आकाश को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला नहीं किया और इसके पहले संस्करण की गलतियों से कुछ सबक सीखने की कोशिश की है। अब जब आकाश-2 आ गया है तो उम्मीद करनी चाहिए कि कम से कम तकनीकी स्पेसीफिकेशन, बिक्री और वितरण व्यवस्था के स्तर पर उसकी उड़ान रोकने वाली अड़चनें अब दूर हो जानी चाहिए।

आकाश हो या कोई और, टैबलेट्स अपने आपमें बहुत उपयोगी और दमदार गैजेट है। न लैपटॉप की तरह महँगा, न डेस्कटॉप की तरह भारी। बहुत हल्का और सुविधाजनक लेकिन क्षमताओं के लिहाज से काफी हद तक लैपटॉप या डेस्कटॉप जैसा ही। हालाँकि यह उनका विकल्प नहीं बन सकता, लेकिन जिनके पास बड़े कंप्यूटर न हैं और न होंगे, उनके लिए एक शक्तिशाली तकनीकी विकल्प। कंप्यूटिंग और स्टोरेज शक्ति सीमित होने तथा इनपुट के लिए हार्डवेयर कीबोर्ड और माउस न होने के बावजूद टैबलेट्स में आम यूज़र के मतलब के ज्यादातर काम संभव हैं और जिन छात्रों की जरूरतों के लिहाज से इसे पेश किया गया है, उन्हें तो इसके इस्तेमाल में कोई दिक्कत पेश नहीं आनी चाहिए। वीडियो लैक्चर देखने, इंटरएक्टिव पाठ्य-पुस्तकें पढ़ने, इंटरनेट पर मौजूद अथाह जानकारियों को खंगालने, ऐनीमेटेड चैप्टर्स को देखने-पढ़ने, होमवर्क स्टोर करने, ई-बुक्स डाउनलोड करने तथा सहेजने, कंप्यूटर सॉफ्टवेयरों को सीखने तथा इस्तेमाल करने जैसी गतिविधियों में कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। ये बहुत सस्ते हैं इसलिए स्कूलों के सामने कंप्यूटर लैब पर भारी-भरकम निवेश करने की बाध्यता नहीं रही। हर छात्र अपना अलग टैबलेट रख सकता है। क्या कहा आपने? गाँवों में बिजली ही नहीं आती? कोई बात नहीं, एक बार चार्ज होने के बाद आकाश चार घंटे तक बैटरी से चल सकता है!

तो क्या आकाश हमारे स्कूल-कॉलेजों में उस क्रांतिकारी बदलाव का आगाज़ करने जा रहा है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह परियोजना शुरू की गई थी? अंततः गाँव-गाँव में बच्चों के हाथ में कंप्यूटिंग पावर वाला गैजेट थमाकर उन्हें पढ़ाई-लिखाई के बेहतर तौर-तरीकों से लैस करने और तकनीकी सक्षमता प्रदान करने की यात्रा का समय आ गया है? हाँ, आकाश में इंटरनेट एक्सेस, वर्ड प्रोसेसिंग, टेक्स्ट इनपुट, ई-बुक रीडिंग, प्रेजेन्टेशन डिस्प्ले और इंटरएक्टिव लर्निंग के लिहाज से जरूरी सुविधाएँ और क्षमताएँ मौजूद हैं। प्रश्न उठता है कि क्या हम उससे वह सब काम लेने के लिए तैयार हैं? शायद नहीं, और वहीं सरकार तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय की लंबी-चौड़ी योजना पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।

यदि आकाश का उत्पादन तेजी से बढ़ जाए और कुछेक वर्षों में वह लाखों छात्रों तक पहुँच भी जाए तो क्या सरकार अपने डिजिटल पाठ्यक्रम को लेकर तैयार है? जिन वीडियो लैक्चर्स, ऐनीमेटेड चैप्टर्स, इंटरएक्टिव लर्नंग और ई-बुक्स की बात की जा रही है, उन पर काम कितना आगे बढ़ा है? फिलहाल इस बारे में कोई सुनियोजित तैयारी या योजना दिखाई नहीं देती। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कुछ समय पहले कहा था कि बदलते दौर में पाठ्यक्रम और शिक्षक का स्वरूप बदलने की जरूरत है, सिर्फ हार्डवेयर ही सबसे बड़ी चुनौती नहीं है। सबसे खर्चीला और सबसे चुनौतीपूर्ण काम तो उस सामग्री को तैयार करने का है, जो हार्डवेयर के जरिए पेश की जाएगी। जाहिर है, आकाश के जरिए डिलीवर की जाने वाली शैक्षणिक सामग्री पर बड़े पैमाने पर परियोजनाएँ शुरू करनी होंगी। देश भर के, अलग-अलग भाषाओं, संकायों, कक्षाओं तथा आयु-वर्ग के छात्रों की जरूरतों और विविधताओं को ध्यान में रखते हुए इंटरएक्टिव तथा ऑडियो-विजुअल डिजिटल पाठ्य-सामग्री तैयार करना आसान काम नहीं है।

लाखों शिक्षकों के लिए भी यह एक नया अनुभव होगा जो अध्यापन के पारंपरिक तौर-तरीकों से जुड़े हुए हैं। उनमें से ज्यादातर के लिए तकनीक एक बड़ी चुनौती है। शिक्षा के नए दौर के लिए पहले खुद शिक्षकों को तैयार करने की जरूरत है जो आनन-फानन में होने वाला काम नहीं है। छात्रों से पहले हमें खुद अध्यापकों के प्रशिक्षण की योजनाएँ चाहिए और वे भी दीर्घकालीन। यदि वे ही डिजिटल तौरतरीकों और अवधारणाओं से परिचित नहीं होंगे तो हमारी सुखद परिकल्पनाओं का आकाश ही भरभराकर नीचे आ गिरेगा।

आईआईटी मुंबई ने हाल ही में आकाश के बारे में प्रशिक्षण देने के लिए इंजीनियरिंग कॉलेजों के अध्यापकों के लिए दो दिन का वर्कशॉप लगाया था। शुरूआत में इस टैबलेट को चुनिंदा इंजीनियरिंग कॉलेजों में लागू किया जा रहा है। ऐसे कॉलेजों के शिक्षकों को तकनीक सिखाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके बुनियादी पहलुओं से वे पहले ही परिचित हैं। वे कंप्यूटरों का पहले ही इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके लिए कंप्यूटर से टैबलेट की ओर यात्रा बहुत छोटी और कम चुनौतीपूर्ण है। लेकिन उस अध्यापक के लिए जो पाँच-सात सौ की जनसंख्या वाले गाँव में काम कर रहा है? उसके लिए यही चुनौती विकराल बन जाती है। लेकिन असली बदलाव वहीं से आना है। इसलिए जरूरी है कि हर महत्वाकांक्षी तकनीकी तथा शैक्षणिक योजना उसे ध्यान में रखकर बनाई जाए। वहाँ पृष्ठभूमि की भी चुनौती है और भाषा की भी। इतना बड़ा काम सरकारी विभाग, आईआईटी या दूसरे सरकारी शैक्षणिक संस्थान अकेले नहीं कर पाएँगे।

आकाश अपने आपमें क्रांति लाने वाला नहीं है। क्रांति तो लाएगी वह डिजिटल, इंटरएक्टिव, टेक्नॉलॉजी से परिष्कृत तथा सुसज्जित शैक्षणिक परियोजना जिस पर अभी काम शुरू होना बाकी है। इसके लिए निजी क्षेत्र, बड़ी तकनीकी कंपनियों, शिक्षाविदों को भी साथ लिया जाना चाहिए। गाँव-गाँव, स्कूल-स्कूल, कॉलेज-कॉलेज में आकाश का प्रशिक्षण देने की तैयारी शुरू होनी चाहिए, वर्कशॉप लगने चाहिए। लेकिन सबसे जरूरी है वह सामग्री, आकाश-2 जिसका डिलीवरी मैकेनिज़्म या अंतिम छोर मात्र है। अच्छी बात है कि परिवहन व्यवस्था तैयार है, लेकिन अब वह चीज़ भी आ जाए जिसका 'परिवहन' किया जाना है!

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