Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 18 मार्च 2013
श्रेणीः  ब्लॉगिंग
प्रकाशनः विश्व हिंदी पत्रिका
टैगः  साहित्य

लब्बोलुआबः

जो ब्लॉगर अपने लेखन को 'साहित्य' का दर्जा दिलाने के लिए उतावले होकर दलीलें देते हैं वे संभवत: साहित्य और ब्लॉगिंग दोनों ही अवधारणाओं के साथ न्याय नहीं करते। ब्लॉगिंग का मूलभूत उद्देश्य 'साहित्य−सृजन' नहीं है और न ही साहित्य में 'ब्लॉगिंग' जैसी कोई विधा शामिल हो पाई है।

Summary:

Hindi bloggers have shown a strong tendency to consider their work as piece of 'literature'. While there no denying the fact that some of the blogs have made significant contribution to Hindi literature, the medium on the whole cannot be considered as part of literature. Blogging is not limited to creative writing and doesn't need to wear any other identity.
ब्लॉगिंग को 'साहित्य' कहलाने की अनावश्यक बेताबी

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

हिंदी ब्लॉगिंग ने न सिर्फ इंटरनेट, बल्कि जनसंचार के माध्यमों तथा रचनाकर्म के बीच भी अलग पहचान और जगह बनाई है। हिंदी रचनाकर्म के क्षेत्र में ठहराव और शीतलता के बीच ब्लॉगिंग, जो कि वास्तव में एक तकनीकी परिघटना तथा माध्यम मात्र है, ने वह हलचल और ऊष्मा पैदा की है जिसकी अनुपस्थिति हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और भाषा प्रेमियों को व्यथित करने लगी थी। हिंदी में पिछली बार ऐसी रचनात्मक हलचल टेलीविजन चैनलों के प्रस्फुटन के दौर में देखी गई थी। लगभग बीस साल के वायवीय अंतराल में ब्लॉगिंग ने, जो कि वास्तव में कोई हिंदी−केंद्रित तकनीक नहीं है, हमारे साहित्यिक सूनेपन में दमदार हस्तक्षेप किया। इसके साथ ही रचनात्मकता का एक उफान सा आया जिसने स्तरीय साहित्यिक सामग्री रचने वालों से लेकर घटिया रचनाओं की अंतहीन जुगाली करने वालों तक को हिंदी अभिव्यक्ति संसार के व्यापक कलेवर के भीतर समेट लिया।

आज हिंदी ब्लॉगिंग उत्कृष्ट रचनाओं से लेकर दैनिक जीवन से जुड़ी महत्वहीन निजी टिप्पणियों, राजनैतिक−सामाजिक−सांस्कृतिक घटनाक्रम की उपयोगी मीमांसाओं से लेकर अप्रिय किस्म के बहस−मुबाहिसों, रचनाकर्मियों के एक अद्वितीय मंच से लेकर गुटबाजी, आत्मश्लाघा एवं चापलूसी के अड्डे तथा जागरूकता फैलाने के सार्थक साधन से लेकर आरोप−प्रत्यारोपों के सहज सुलभ माध्यम का रूप ले चुका है। कुछ अच्छा, कुछ बुरा, हिंदी ब्लॉग जगत वह पंचमेल खिचड़ी है जिसे खाने पर हर व्यक्ति को अलग−अलग स्वाद आता है। वास्तव में ब्लॉगिंग की अवधारणा भी यही है! सीमाओं से मुक्त, स्वच्छंद, सरल और सबको एक दूसरे से जोड़ने वाला माध्यम।

हिंदी ब्लॉगिंग का एक अहम कालखंड पूरा हो चुका है। इसने बहुत सी उम्मीदें जगाई हैं और कुछ तोड़ भी दी हैं। किंतु अब हिंदी ब्लॉगिंग के 'तीव्र प्रसार' संबंधी आत्मसंतोष, आने वाले दिनों की सुखद कल्पनाओं और ब्लॉग विश्व की विविधताओं की प्रशंसा करते रहने का समय नहीं रहा। तकनीकी और साहित्यिक दुनिया में आठ--दस साल का अरसा किसी भी विधा या माध्यम को परिपक्व बनाने के लिए छोटा नहीं होता। इससे पहले कि हम हिंदी ब्लॉगिंग के दूसरे तथा अधिक चुनौतीपूर्ण दौर में प्रवेश करें, इस बात का संजीदा, ईमानदार तथा व्यावहारिक मूल्यांकन किए जाने की जरूरत है कि अपने पहले चरण में क्या यह माध्यम वाकई उतना ही सफल तथा क्रांतिकारी सिद्ध हुआ जितनी संभावनाएं इसके भीतर मौजूद थीं। हिंदी ब्लॉगिंग के अधिकांश मंचों पर तथाकथित उपलब्धियों, खुशफहमियों और प्रचारात्मक बिंदुओं पर आधारित मुद्दे हावी हो जाते हैं। ऐसे मंचों पर प्रायः ईमानदार समालोचना और तटस्थ मूल्यांकन का अभाव रहता है। इतने वर्षों बाद ब्लॉगिंग की वाहवाही करते रहने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अंततः हम यह प्रचार उन्हीं लोगों के बीच कर रहे हैं जो स्वयं ब्लॉगर हैं या हिंदी से जुड़े हैं। हिंदी ब्लॉगिंग की वास्तविकताएं उनसे छिपी नहीं हैं। स्वयं को निरंतर आश्वस्त करते रहने से ब्लॉगिंग का विकास होने वाला नहीं है और न ही उसमें आने वाली असुरक्षा की भावना समाप्त होगी। यदि उसे समाप्त करना है तो इस माध्यम की चुनौतियों और विकास के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। ब्लॉगिंग का सुखद, सुदर्शन चित्र खींचते रहने से उसका कोई विशेष लाभ नहीं होगा। बहुत हुआ तो यथास्थित किायम रह जाएगी (हालांकि ताजा चुनौतियों के मद्देनजर इस बात में भी गंभीर संदेह हैं)। आज उसके वास्तविक परिदृश्य को अनावृत्त करने की आवश्यकता है, भले ही वह कितना भी सुखद या अनाकर्षक हो। अंग्रेजी में इसके लिए एक अच्छा शब्द इस्तेमाल किया जाता है− 'रियलिटी चेक।' यदि हम अपनी सीमाओं को स्वीकार ही नहीं करेंगे तो उनसे आगे कैसे बढ़ेंगे?

साहित्य और ब्लॉगिंग

हिदी ब्लॉगिंग के भीतर और बाहर एक सवाल बार−बार उठाया जाता है कि ब्लॉग लेखन साहित्य है? इसी से जुड़ा एक अन्य प्रश्न भी चर्चा में रहता है कि क्या हिंदी ब्लॉगिंग ने हिंदी साहित्य में कितना योगदान दिया है। अलग−अलग मंच पर इसका अलग−अलग उत्तर मिलेगा। यदि ब्लॉगरों की संगोष्ठी में पूछा जाए तो इस बात पर लगभग सर्वानुमति दिखाई देगी कि हिंदी ब्लॉगिंग यकीनन साहित्य है और उसने साहित्य को बहुत समृद्ध बनाया है। किंतु साहित्यकारों के मंच पर उठने पर इसी प्रश्न का उत्तर नकारात्मक होगा।

मेरी दृष्टि में दोनों ही पक्ष कुछ हद तक सही हैं। हिंदी ब्लॉगिंग ने इस मायने में हिंदी साहित्य के प्रति महत्वपूर्ण योगदान दिया है कि उसने लेखन, रचनाकर्म और अभिव्यक्ति के प्रति आम लोगों की अभिरुचि को पुनर्जीवित किया है। आधुनिक युग की व्यस्तताओं, विवशताओं तथा दैनिक जीवन में बढ़ते तकनीकी हस्तक्षेप के कारण आम हिंदीभाषी व्यक्ति लिखना तो छोड़ ही दीजिए, पढ़ने से भी दूर होता जा रहा था। इस स्थिति में कोई बहुत नाटकीय बदलाव आज भी नहीं आया है, लेकिन फिर भी हिंदी ब्लॉगिंग की बदौलत छात्रों, युवकों और अन्य नवोदित लेखकों का ऐसा वर्ग तैयार हुआ है जिसने हिंदी में साहित्य रचना शुरू किया है। यहां गुणवत्ता का प्रश्न गौण है क्योंकि आज नहीं तो कल इनमें से कुछ रचनाकर्मी हिंदी साहित्यकारों की श्रेणी में अवश्य शामिल होंगे।

हिंदी ब्लॉगिंग ने एक बड़ा योगदान इंटरनेट को समृद्ध करने में दिया है। हिंदी तथा भारत से जुड़ी विविधतापूर्ण सामग्री उन्होंने वेब पर डाली है जो सर्च इंजनों के माध्यम से करोड़ों इंटरनेट प्रयोक्ताओं तक पहुंची है। कंप्यूटर पर हिंदी में काम कर उन्होंने हिंदी के प्रसार में भी योगदान दिया है और दूसरे हिंदी भाषियों को भी कंप्यूटर कौशल से युक्त किया है। तकनीकी क्षेत्र में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में उन्होंने जितना बड़ा योगदान दिया है, वैसा न सरकारें दे सकी हैं और न ही कंपनियां। आम हिंदी ब्लॉगर ने इस धारणा को निर्मूल सिद्ध करने में मदद की है कि हिंदी में यह संभव नहीं है या वह नहीं हो सकता। उन्होंने हिंदी−विश्व का आत्मविश्वास बढ़ाया है। उसे स्वयं के प्रति अधिक आश्वस्त किया है।

किंतु जहां तक साहित्य और ब्लॉगिंग का मुद्दा है, सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। हिंदी ब्लॉगिंग में उस किस्म के स्तरीय तथा उत्कृष्ट लेखन की मात्रा कम है, जिसे 'साहित्य' की श्रेणी में गिना जा सके। जो ब्लॉगर अपने लेखन को 'साहित्य' का दर्जा दिलाने के लिए उतावले होकर दलीलें देते हैं वे संभवत: साहित्य और ब्लॉगिंग दोनों ही अवधारणाओं के साथ न्याय नहीं करते। ब्लॉगिंग का मूलभूत उद्देश्य 'साहित्य−सृजन' नहीं है और न ही साहित्य में 'ब्लॉगिंग' जैसी कोई विधा शामिल हो पाई है।

लगभग तीन वर्ष पहले एक वरिष्ठ हिंदी ब्लॉगर ने साहित्य और ब्लॉगिंग का संदर्भ आने पर टिप्पणी की थी कि ब्लॉगिंग साहित्य से भी कहीं आगे बढ़कर है। साहित्य के पाठकवर्ग का दायरा बहुत सीमित है जबकि ब्लॉग इंटरनेट के जरिए भौगोलिक सीमाओ से मुक्त हो चुका है। इस तरह की दलीलें भावुकतापूर्ण ही हैं। कारण, प्रसार का दायरा साहित्य की गुणवत्ता आंकने का पैमाना नहीं है। वह अभिव्यक्ति की गहराई, भाषा सौष्ठव, मनोरंजन, नवीनता, स्तरीयता, चिंतन की गहराई, बौद्धिक विमर्श तथा पाठक के प्रति अवदान जैसे पैमानों पर मापी जाती है। जो लेखन इन मापदंडों पर खरा है, वह 'साहित्य' की श्रेणी में गिना जाएगा, भले ही उसे पाठक के नाम पर एक भला आदमी भी नसीब न हो। दूसरी तरफ, कितने ही लेखकों के उपन्यास लाखों की संख्या में बिकते हैं लेकिन वे साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं गिने जाते। उनका साहित्य मनोरंजक अवश्य है इसलिए लोकप्रिय भी है। किंतु उत्कृष्ट साहित्य कहलाने के लिए आवश्यक अन्य अवयवों के लिहाज से इन रचनाओं की बहुत सी सीमाएं हैं।

स्वच्छंद अभिव्यक्ति के मायने

डिक कोस्टलो के अनुसार, The Internet destroyed most of the barriers to publication. The cost of being a publisher dropped to almost zero with two interesting immediate results: anybody can publish, and more importantly, you can publish whatever you want. अपनी तबीयत के हिसाब से कुछ भी प्रकाशित करने की आज़ादी ब्लॉग की मूलभूत अवधारणा के लिहाज से उसकी बड़ी मजबूती है। किंतु साहित्य के बरक्स देखेंगे तो यही उसकी कमजोरी बन जाती है। यहां प्रकाशित रचना किसी दूसरे व्यक्ति, और वह भी विशेषज्ञ स्तर के व्यक्ति, के हाथ से नहीं गुजरती। साहित्यिक गुणवत्ता का तटस्थ निर्धारण नहीं हुए बिना ही वह प्रकाशित होती है। उसे भाषा−सौंदर्य, त्रुटिहीनता, तथ्यात्मकता, शैली, प्रामाणिकता, मौलिकता, काव्यगत अनुशासन जैसे पैमानों पर कसने की व्यवस्था नहीं है।

हर ब्लॉगर रचनात्मक हो, यह आवश्यक नहीं लेकिन साहित्य के लिए वह आवश्यक है। यहां 'आज तबीयत नासाज है' से लेकर 'लखनऊ में अच्छी बेडमी कहां मिलेगी' जैसे विषयों पर भी पोस्ट लिख सकते हैं और वह भी लिखने का मन न हो तो कहीं से कॉपी−पेस्ट कर सकते हैं। कुछ बहुत अच्छी साहित्यिक परियोजनाएं, कुछ बहुत अच्छे रचनाकर्मी, और उच्च स्तरीय ब्लॉग भी मौजूद हैं, इसमें दोराय नहीं है। लेकिन कहीं कोई सीमा भी तो नहीं है। ब्लॉगिंग एक स्वांत: सुखाय अभिव्यक्ति, रचनात्मकता और संचार का साधन है। वह पत्रकारिता तो है किंतु अनौपचारिक किस्म की, अप्रमाणित पत्रकारिता। वह साहित्य भी हो सकता है, किंतु छिन्न−भिन्न, असंगठित, अपरिमार्जित और स्वच्छंद जिसमें से 'सबस्टेंस' ढूंढने के लिए उसे काफी छानने की जरूरत है।

एक अनावश्यक बेताबी

एक बात, जो मुझे उलझन में डालती है, वह है हम हिंदी ब्लॉगरों के बीच स्वयं को साहित्य−सर्जक कहलाने की आकांक्षा। यह आकांक्षा अन्य भाषाओं के ब्लॉगरों में दिखाई नहीं देती। हां, वे इस माध्यम को साहित्य तथा पत्रकारिता में 'योगदान' देने वाला, उसकी विविधता में हाथ बंटाने वाला माध्यम अवश्य मानते हैं। हिंदी में इस मुद्दे पर एक अनावश्यक छटपटाहट दिखाई देती है। उदाहरण के लिए इन टिप्पणियों को देखिए−

  • अत्यंत दुःख के साथ यह लिखना पड़ रहा है कि ब्लॉग पर उपलब्ध साहित्य की सुधबुध लेने वाला कोई नहीं है। इस पर उपलब्ध साहित्य को हिंदी में कोई तवज्ज़ो भी नहीं दी जाती है। पत्र पत्रिकाओं में उपलब्ध साहित्य की अपेक्षा इसे उपेक्षा भाव से ही देखा जाता है। इसे हल्क़ा फुल्का, चलताऊ व दोयम दर्ज़े का मानकर इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। ब्लॉग के साहित्य लेखक को तो कोई साहित्यकार मानने को भी तैयार ही नहीं है। जबकि वह बिना किसी विवाद, गुट या विमर्श में पड़े लगातार सृजन कर रहा है।
  • ब्लॉग पर अन्य विधाओं में जितनी भी रचनाएं हैं भले ही वह कम हों पर उच्च कोटि की हैं। इन्हें किसी भी तरह से दोयम दर्ज़े की रचनाएं नहीं सिद्ध किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि ब्लॉग पर उपलब्ध साहित्य को भी गंभीर व विचार योग्य साहित्य माना जाए। आलोचक, समीक्षक इन विभिन्न ब्लॉग पर उपलब्ध साहित्य पर विचार कर अपनी महत्वपूर्ण राय दें।
  • अगर देखा जाये तो सभी पत्रिकायें भी तो श्रेष्ठ साहित्य लिये हुये नही होती फिर ब्लॉग तो बहुत विस्तरित मंच है। आज नही तो कल साहित्य के पुरोधा इसे जान लेंगे। अभी शायद उन्हें कम्प्यूटर का ज्ञान नही है।
  • मुझे लगता है कि हमारे ब्लॉगर मित्र सही बिंदु को पकड़ने में चूक गए हैं। वास्तव में ब्लॉग है क्या? लॉरेल ने क्या खूब कहा है− Your blog is your unedited version of yourself. हम न जाने क्यों उसे यह या वह बना देने पर आमादा हैं। सिमोन ड्यूमेंको लिखते हैं− Blogging is just writing — writing using a particularly efficient type of publishing technology. यह तो एक माध्यम है, विविधतापूर्ण माध्यम जिसका जो चाहे, जैसे चाहे, जिस उद्देश्य के लिए चाहे इस्तेमाल कर सकता है। हिंदी के सबसे सफल ब्लॉगों में से एक यशवंत सिंह का 'भड़ास' है जिसे आप साहित्य की श्रेणी में गिनना नहीं चाहेंगे। भारत में अंग्रेजी का सबसे सफल ब्लॉग अमित अग्रवाल का 'डिजिटल इन्स्परिेशन' माना जाता है जो पुन: साहित्य से दूर−दूर का भी रिश्ता नहीं रखता। वे इस माध्यम का सकारात्मक दोहन करने में सफल रहे हैं, साहित्यिकता की बहस में उलझते तो शायद वे यहां तक नहीं पहुंचते।

    कुछ समय पहले वरिष्ठ साहित्यकार और संपादक राजेंद्र यादव ने कहीं टिप्पणी की थी कि ब्लॉग पर उपलब्ध साहित्य दोयम दर्जे का है। इसने ब्लॉग विश्व में उबाल ला दिया। हर टिप्पणी पर भावनात्मक प्रतिकि्रया की आवश्यकता नहीं है। ब्लॉग तो एक लोकतांत्रिक दुनिया है, जिसमें हर विचार का स्वागत होना चाहिए, उसे समझने का प्रयास होना चाहिए। जरा सोचिए, भले ही ब्लॉगिंग का एक हिस्सा साहित्यिक रचनाओं के प्रति समर्पित है, लेकिन क्या उस पर श्रेष्ठ हिंदी साहित्य उपलब्ध है? ब्लॉग विश्व में सक्रिय साहित्यकारों की संख्या आज भी बहुत सीमित है (यहां कविता कोष, अभिव्यक्ति−अनुभूति जैसी वेबसाइटों पर प्रकाशित सामग्री को न गिना जाए क्योंकि वे 'ब्लॉग' नहीं हैं)। इस लिहाज से, ब्लॉगिंग हिंदी साहित्य की एक छोटी सी बानगी मात्र उपलब्ध करा सकती है। जो साहित्यकार यहां सक्रिय हैं, वे भी कौनसे अपनी सभी रचनाओं या उत्कृष्ट रचनाओं को ब्लॉग पर उपलब्ध कराते हैं? नहीं, क्योंकि इस माध्यम पर जिस तरह की 'कॉपी−पेस्ट' अराजकता व्याप्त है, वह अपनी बौद्धिक संपदा की रक्षा के साहित्यकार के अधिकार तथा चिंता में फिट नहीं बैठती। प्राय: उन्हीं रचनाओं को ब्लॉग पर उपलब्ध कराया जाता है जो या तो पारंपरिक माध्यमों में इस्तेमाल की जा चुकी हैं, या फिर जिनके छपने की संभावना नहीं है। सिर्फ यही वे रचनाएं हैं जिन्हें 'उठा' लिए जाने और धृष्टता के साथ अपने नाम के साथ या बिना नाम किसी अन्य ब्लॉग या प्रकाशन में शामिल कर लिए जाने पर उन्हें अफसोस नहीं होगा। ब्लॉग पर सक्रिय बने रहने की आकांक्षा सबकी है, किंतु अपने साहित्यिक तथा कारोबारी सरोकारों के साथ समझौता किए बिना। परिणाम? हिंदी का सर्वश्रेष्ठ साहित्य ब्लॉग पर नहीं आता, आती है तो बस उसकी छोटी सी बानगी। बाकी साहित्य आज भी किताबों और पत्रिकाओं तक सीमित है और काफी समय तक रहने वाला है।

    माध्यम और भी हैं

    पत्रकारिता को देखिए। उसका इतिहास कई सौ साल पुराना है। पत्र−पत्रिकाओं में भी साहित्यिक सामग्री− कहानी, कविता, उपन्यास अंश, समीक्षा, व्यंग्य, साक्षात्कार, निबंध आदि− बहुतायत से प्रकाशित होती है। किंतु पत्रकारिता की मूल प्रकृति साहित्य नहीं है। कहा भी गया है कि यह जल्दी में लिखा गया साहित्य है। पत्रकारिता को 'साहित्य' का दर्जा कभी नहीं मिला और न ही कभी मिलने की संभावना है। किंतु पत्रकारिता वह दर्जा पाने के लिए बेचैन भी नहीं है, न ही ऐसा दर्जा न मिलने पर व्यथित या निराश है। वह ऐसा दावा ही नहीं करती। तब ब्लॉगिंग स्वयं के 'साहित्य' होने या न होने को लेकर इतनी उत्कट क्यों हो? वह क्यों अपनी निजी, अद्वितीय पहचान खोकर दूसरी पहचान ओढ़ लेने को आतुर है, जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं है? ब्लॉगिंग साहित्य नहीं है और न ही उसे 'साहित्य' कहलाने की जरूरत है। क्योंकि ब्लॉगिंग अपने आप में कोई कमज़ोर या महत्वहीन चीज़ नहीं है। वह हमारी सामूहिक अभिव्यक्ति, सामाजिकता, घटनाओं, संवेदनाओं और रचनाओं का वैश्विक समुच्चय है। साहित्य के पास यह सब कहां? लेकिन जो साहित्य के पास है, वह ब्लॉगिंग के पास नहीं है।

    ब्लॉगिंग को साहित्य बनने की जरूरत भी नहीं है। अगर वह 'साहित्य' में घुसी तो एक 'अनवांटेड मेहमान' से ज्यादा कुछ नहीं बन पाएगी क्योंकि साहित्य की दुनिया तो पहले ही खेमेबंदियों, विवादों, गुरु−शिष्य परंपराओं, ईगो−क्लेशेज और किस्म−किस्म की अनिर्धारित बहसों जैसे विभाजनों में बंटी हुई है। उस कोलाहल को कुछ और बढ़ाने की आवश्यकता ही क्या है! ब्लॉग को ब्लॉग ही रहने दो कोई नाम न दो!

    हम ब्लॉगर अपने इस माध्यम का भरपूर इस्तेमाल हिंदी की समग्र संपदा के विकास और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए करें, यही क्या कम है? अपने दैनिक जीवन से एक मिसाल देखिए− विज्ञान में में गेहूं को घास की श्रेणी में गिना जाता है। रोजेट के मशहूर थिसॉरस में वह घास की सूची में ही आता है। उसका वैज्ञानिक आधार हैं। अब गेहूं उत्पादक इस बात को लेकर भिड़ जाएं कि हमें अनाज की श्रेणी में क्यों नहीं डाला गया, तो वह अनावश्यक है। बेहतर हो कि वे इस बात को लेकर अधिक चिंतित तथा उत्सुक हों कि गेहूं का उत्पादन कैसे बढ़े, उसकी गुणवत्ता में कैसे सुधार हो या दूसरे इलाकों में गेहूं को लेकर किस−किस तरह के प्रयोग हो रहे हैं। हम ब्लॉगर भी कुछ−कुछ इसी तरह से क्यों नहीं सोचते? हिंदी ब्लॉगिंग में यह आम प्रवृत्ति है कि हम उसे बढ़ा−चढ़ाकर देखते तथा पेश करते हैं। उसकी मौजूदा दशा को लेकर प्रमुदित हैं।

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