Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 18 मार्च 2013
श्रेणीः  विदेश संबंध
प्रकाशनः प्रभासाक्षी.कॉम
टैगः  इटली

लब्बोलुआबः

क्या भारत की विदेश नीति बहुत कमजोर है या फिर वह हमारी वैश्विक भूमिका के विस्तार की स्वाभाविक उत्कटता से प्रभावित है? क्या हम बहुत सुरक्षित, नरम और सबको खुश रखने वाली असंभव किस्म की विदेश नीति पर चलने की कोशिश कर रहे हैं?

Summary:

With some unpleasant experience we had with Italy, Pakistan, Maldives and Sri Lanka, voices for India going for a stronger foreign policy are getting louder and louder. Have we really become a 'soft state' as is the opinion of the opposition parties?
क्या 'सबको खुश रखने' के लिए है हमारी विदेश नीति?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत सरकार ने अपने नवनियुक्त राजदूत बसंत कुमार गुप्ता को इटली न भेजने का फैसला किया है। स्वाभाविक रूप से सरकार का यह कदम दो भारतीय मछुआरों की हत्या के अभियुक्त इतालवी अभियुक्तों मैसीमिलियानो लैटोरे और सल्वातोर गरोरे को लौटाने का वायदा पूरा न करने के इटली सरकार के रुख के जवाब में है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद कड़ा रुख अपनाने का संकेत दे चुके हैं। इसे दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों को निचले स्तर पर लाने की प्रक्रिया के पहले कदम के रूप में देखा जा सकता है, खासकर प्रधानमंत्री की उस स्पष्ट घोषणा के मद्देनजर कि इटली ने अगर दोनों अभियुक्तों को न लौटाया तो इसके 'नतीजे' होंगे। उधर पाकिस्तान की नैशनल असेंबली द्वारा अफ़ज़ल गुरू को फाँसी देने के खिलाफ प्रस्ताव पास कर खुले आम भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है जिसका सटीक जवाब हमारी संसद ने आम राय से पारित निंदा प्रस्ताव के रूप में दिया है। भारत सरकार और यहाँ के राजनैतिक दलों ने एक मत से एक आतंकवादी को सजा सुनाने का खुलेआम संसदीय स्तर पर विरोध करने को इस बात का सबूत माना है कि वह देश आतंकवाद को सांस्थानिक समर्थन देने में लगा हुआ है। सरकार पर दबाव है कि पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर बनाने की प्रक्रिया पर अब रोक लगा दी जाए क्योंकि हमारा यह पड़ोसी बार-बार सिद्ध कर चुका है कि वह इस किस्म की सदाशयता का हकदार नहीं है।

अरसे बाद भारत में विदेश नीति से संबंधित मुद्दे अखबारों की सुर्खियाँ बन रहे हैं और उसी के साथ सरकार विपक्ष और मीडिया के निशाने पर है जिनका आरोप है कि संयुक्त लोकतांत्रिक सरकार विदेश नीति के मामले में फिसड्डी साबित हुई है और उसने भारत की छवि एक 'सॉफ्ट स्टेट' (नरम राष्ट्र) की बना दी है। विपक्ष का मानना है कि इसी छवि के चलते चाहे इटली हो, पाकिस्तान हो, मालदीव हो या श्रीलंका, हर कोई भारत को हल्के ढंग से ले रहा है, जिससे विश्व में उभरती हुई शक्ति तो छोड़िए, एक क्षेत्रीय ताकत के रूप में भी हमारी स्थिति कमजोर हुई है। इस दबाव का असर भी पड़ा है। पाकिस्तान के साथ होने वाली हॉकी सीरीज रद्द कर दी गई है। दूसरी तरफ सरकार ने इटली के साथ संबंधों के पूरे परिदृश्य की नए सिरे से 'समीक्षा' की प्रक्रिया शुरू की है। राजनयिक अर्थों में ऐसी 'समीक्षा' का अर्थ यह जाँचना है कि संबंधित देश के साथ अपने संबंधों को डाउनग्रेड करने में क्या-क्या जोखिम और नुकसान हैं तथा किस तरह अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखते हुए इन रिश्तों में 'सोचा-समझा ठंडापन' लाया जा सकता है। हो सकता है कि इटली और पाकिस्तान से संबंधित घटनाओं का कुछ न कुछ प्रभाव श्रीलंका और मालदीव के साथ निपटने के तौर-तरीकों पर भी पड़े और आने वाले दिनों में हमें सरकार की 'कड़ाई' के कुछ और उदाहरण देखने को मिलें।

सलमान खुर्शीद ऐसे समय पर विदेश मंत्री का पद संभाल रहे हैं जब चुनौतियाँ हजार और स्थितियाँ विकट हैं। ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा बांध बनाने के विवाद, पाकिस्तान और म्यांमार में चीन द्वारा बनाए जाने वाले बंदरगाहों को लेकर उपजी आशंकाओं, नेपाल सीमा पर चीन की बढ़ी सक्रियता, मालदीव, सेशल्स और श्रीलंका में उसकी बढ़ती मौजूदगी, जो हिंद महासागर में मोतियों की लड़ी (स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स) नामक उसकी रणनीति का हिस्सा है, जैसे विकट मुद्दे उन्हें विरासत में मिले हैं। श्रीलंका के साथ संबंध कमजोर होते जा रहे हैं और अगर भारत ने अगले हफ्ते जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में युद्ध-अपराधों के मुद्दे पर उसके खिलाफ आने वाले अमेरिकी प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया (जिसके लिए संप्रग का घटक दल द्रमुक अपनी क्षेत्रीय राजनीति के चलते हाथ धोकर सरकार के पीछे पड़ा है) तो इनमें और भी गिरावट आनी तय है।

क्या कड़ाई ही है फॉर्मूला

क्या भारत सरकार की विदेश नीति बहुत कमजोर है या फिर वह हमारी वैश्विक भूमिका के विकास के मौजूदा दौर में विभिन्न देशों के साथ संबंध बढ़ाने की स्वाभाविक उत्कटता से प्रभावित है? क्या हम बहुत सुरक्षित, नरम और सबको खुश रखने वाली असंभव किस्म की विदेश नीति पर चलने की कोशिश कर रहे हैं? असल में विदेश नीति पर काले और सफेद की तरह इस या उस तरह का फैसला सुनाना नामुमकिन है क्योंकि यह एक जटिल क्षेत्र है जिसमें कामयाबी के लिए कोई सीधा-सपाट फॉर्मूला उपलब्ध नहीं है। सिर्फ कठोर और आक्रामक रुख किसी भी देश की विदेश नीति की कामयाबी सुनिश्चित नहीं कर सकता। पाकिस्तान के संदर्भ में भारत में ऐसी आवाजें बहुत सुनी जाती हैं कि उसके साथ हर किस्म के संबंध तोड़ लेने चाहिए, या उस पर हमला कर एक बार सारा हिसाब-किताब बराबर कर देना चाहिए। विदेश नीति और कूटनीति में उत्तेजना और भावुकता पर आधारित फैसलों और काल्पनिक परिणामों के लिए न्यूनतम गुंजाइश है, जिसे सिर्फ मौजूदा संप्रग सरकार ही नहीं पिछली राजग सरकार भी अच्छी तरह समझती थी और आने वाली सरकारों को भी समझना होगा। दूसरे देशों के साथ संबंधों में थोड़ा लचीलापन, थोड़ा समायोजन जरूरी होता है, बशर्ते उसमें अपने राष्ट्रीय हितों और आत्मसम्मान के साथ समझौता न किया जाए और बशर्ते आपकी नीति रोलर कोस्टर की तरह अस्थिर न हो बल्कि उसमें निरंतरता हो। जब ऐसा नहीं होता तो आपत्तियाँ उठना स्वाभाविक है, विशेषकर तब जब बात पाकिस्तान या चीन से संबंधित हो, जिनके साथ भारत का इतिहास बहुत कटुतापूर्ण रहा है।

पाकिस्तान भारत के लिए एक शाश्वत समस्या है। उसके साथ आप ऐसे निपटिए या वैसे, दोनों ही परिस्थितियों में बराबर का जोखिम रहने वाला है। भाजपा नेता अरुण जेटली की इस दलील में दम है कि पाकिस्तान उस किस्म की सदाशयता का अधिकारी नहीं है, जैसी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दिखाई है। डॉ. सिंह अतीत में कहते रहे हैं कि भारत पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य बनाने के लिए एक मील अतिरिक्त चलने के लिए तैयार है। एलओसी पर दो भारतीय जवानों की नृशंस हत्या, पाकिस्तानी संसद के प्रस्ताव और श्रीनगर में हुए ताजा आतंकवादी हमले के बाद उनका यह मत जायज लगता है कि अबकी बार संबंध सुधार का जिम्मा पाकिस्तान पर छोड़ दिया जाए। वह दो सकारात्मक कदम आगे बढ़े तब भारत को एक कदम आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि उसके साथ हमारा अब तक का अनुभव होम करके हाथ जलाने वाला ही रहा है। ऐसा लगता है कि हर मामले में कड़ाई या उग्रतापूर्ण रुख अपनाने की बजाए मसला-दर-मसला नरम या गरम रुख तय किया जाना ज्यादा बेहतर होगा। इस संदर्भ में दारोमदार सरकार के विवेक पर ही आता है। सिर्फ कड़ाई हर बार परिणाम दे यह जरूरी नहीं क्योंकि पाकिस्तान लगातार एक नाकाम राष्ट्र बनने की दिशा में जा रहा है और वह भारत के साथ टकराव का जोखिम मोल ले सकता है। ज्यादा से ज्यादा वहाँ थोड़ी और गरीबी आ जाएगी, थोड़ा और पिछड़ापन आ जाएगा, कट्टरपंथ थोड़ा और बढ़ जाएगा। आप इंतजार करते रहिए, वह बात ही नहीं करेगा और अपने नकारात्मक रास्ते पर बढ़ता रहेगा। क्योंकि वहाँ जमीन भले ही कितनी भी कमजोर हो, अहंकार में कोई कमी नहीं है। दूसरे, पाकिस्तान का गरीब, कट्टरपंथी और पिछड़ा बना रहना वहाँ के रहमुनाओं के हित में है। दूसरी तरफ भारत की स्थिति कुछ और है। अपने पड़ोसियों के साथ टकरावों का लंबे समय तक बने रहना उसके आर्थिक-सामाजिक विकास की दृष्टि से महंगा सौदा है।

विवेक ही महत्वपूर्ण

इस संदर्भ में भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास पर नजर डालना दिलचस्प होगा। दो सैनिक शासकों के जमाने में भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों में दूरी बना ली थी- पहले जनरल जिया उल हक के दौर में और फिर जनरल परवेज मुशर्रफ के दौर में। लेकिन दोनों ही मौकों पर क्या भारत को इसका कोई लाभ मिला? दोनों के कार्यकाल में स्थितियाँ और खराब ही हुईँ- खुद पाकिस्तान के लिए भी और भारत के लिए भी। चाहे अटल बिहारी वाजपेयी का कार्यकाल हो या फिर मनमोहन सिंह का, संसद पर हमले और मुंबई के आतंकवादी हमलों के बाद दो लंबे अंतराल तक पाकिस्तान से दूरी बनाए रखने और संबंधों में अधिकतम बिगाड़ की स्थिति में रहने के बाद आखिरकार हमीं को आपसी रिश्ते सामान्य करने के लिए फिर से हाथ बढ़ाना पड़ा। कारण? यह तनाव हम पर आर्थिक बोझ बढ़ाने के साथ-साथ उस देश में भारत विरोधी तत्वों को ही मजबूत कर रहा था। वहाँ फौज के हाथ मजबूत हो रहे थे। भारत को अगर पाकिस्तान से रिश्ते सामान्य बनाने या आपसी विवादों के समाधान के सिलसिले में किसी में कोई उम्मीद किसी से हो सकती है तो वे हैं वहाँ की लोकतांत्रिक ताकतें और चंद समझदार लोग, जो ऐसी परिस्थितियों में कमजोर होते हैं। ऐसे में भारत अपने इस उद्दंड, अहंकारी और नादान पड़ोसी से निपटे तो कैसे? वह भी तब जब उसके पास परमाणु शक्ति हो।

और अब इटली। सरकार ने बदलाव के तौर पर दोनों मरीन के मामले में कड़ाई दिखाकर ठीक ही किया है। सोनिया गांधी के इतालवी मूल की वजह से उस पर वैसे भी इस मामले में कड़ाई दिखाने का नैतिक दबाव है। खासकर बोफर्स प्रकरण में ओत्तावियो क्वात्रोच्चि प्रकरण के आसानी से छूट जाने को देखते हुए। इटली सरकार ने जो किया, वह कानूनी दृष्टि से गलत होने के साथ-साथ नैतिक दृष्टि से भी गलत है और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में जरूरी कदम उठाएगा ही। इटली को अपनी अप्रसन्नता का स्पष्ट संकेत देना जरूरी है जो दे दिया गया है। कूटनीतिक संबंधों में नरमी भी ठीक है। संभवतः इस मामले को ऑस्ट्रेलिया के साथ हमारे विवाद की तरह आपसी समझबूझ और बातचीत से सुलझाने की जरूरत है। कुछ साल पहले भारतीय छात्रों की हत्या के बाद दोनों देशों के संबंध जितने बिगड़ गए थे, बाद में थोड़ी नाराजगी और थोड़ी सुलह की नीति से उनमें सुधार भी आ गया। आज वे लगभग सामान्य हो चुके हैं। इटली के साथ विवाद में आगे बढ़ने से पहले यह तथ्य नहीं भूलना चाहिए कि दोनों अभियुक्तों पर उनकी गैर-मौजूदगी में भी मुकदमा चलाया जाना संभव है और दोषी घोषित होने पर गिरफ्तारी के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मदद भी ली जा सकती है। इस मामले को दो राष्ट्रों के बीच टकराव का रूप दिए जाने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट अपने और भारत के हितों की देखभाल करने में सक्षम है।

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