Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 18 मार्च 2013
श्रेणीः  वर्ल्ड वाइड वेब
प्रकाशनः कादम्बिनी
टैगः  इंटरनेट

लब्बोलुआबः

हॉटमेल का विकास कर उसे 1700 करोड़ रुपए में माइक्रोसॉफ्ट को बेचने वाले सबीर भाटिया से प्रेरणा लेकर और अपने नए विचारों, नई परिकल्पनाओं, तकनीकी कौशल, उद्यमिता की लगन और यौवन के हौंसलों के साथ अनंत संभावनाओं वाले इंटरनेट विश्व में छलांग लगाने वाले जोशीले भारतीय युवकों ने भारत में इंटरनेट की सफलता की पटकथा लिखी है।

Summary:

From Sabir Bhatia to Rajesh Jain and from Ajit Balakrishnan to Sanjiv Bikhchandani, there are a few bright examples of Indian Internet entrepreneurs who defied all odds to become successful and help World Wide Web in setting its feet in India.
डटी रहे सो डॉट कॉमः भारत की 25 सफल वेब परियोजनाएँ (1)

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

सन् 1995 की बात है। वीएसएनएल ने भारत में पहली बार आम लोगों के लिए इंटरनेट नाम की सुविधा जारी करते हुए आगाह किया था कि इसका इस्तेमाल करने के लिए आपके कंप्यूटर में कम से कम चार एमबी रैम और विंडोज 3.1 होना जरूरी है। पांच सौ बारह केबीपीएस की स्पीड से लीज लाइन के जरिए इंटरनेट सर्फिंग के लिए 40,000 रुपए की रजिस्ट्रेशन फीस और 36 लाख रुपए का सालाना शुल्क तय किया गया। इंटरनेट जब तक मुझ जैसे सामान्य भारतीय नागरिक तक पहुंचा तब तक भारत में उसके फैलते साम्राज्य के पहले दो साल गुजर चुके थे।

उन्नीस सौ सत्तानवे की किसी शाम हिंदुस्तान टाइम्स समूह के 'होम टीवी चैनल' के दफ्तर में अपने कंप्यूटर से जब मैंने पहली बार टेलीफोन−माडम के जरिए 2.4 केबीपीएस की गति से चलने वाले इंटरनेट नामक चमत्कार का अनुभव किया तो पहला कनेक्शन मिलते ही आई 'हैंडशेक' की आवाज में मानो निर्वाण प्राप्त हो गया। तब आम भारतीय के लिए इंटरनेट का मतलब याहू, हॉटमेल या बहुत हुआ तो एमएसएन और रीडिफ होता था। मुझे याद नहीं पड़ता कि उन दिनों हमने कभी यह सोचा हो कि कंपनियों की वेबसाइटों, कुछेक समाचार पोर्टलों, ईमेल और चैट से आगे भी इंटरनेट का कोई मतलब है। आज करीब तेरह साल बाद जब अल्प−अवधि में ही पूर्ण−वयस्कता को प्राप्त हो चुके इंटरनेट को देखते हैं तो अहसास होता है कि हम कितने नादान थे।

कंप्यूटर में आज चार एमबी रैम नहीं, उससे सैंकड़ों गुना यानी दो से आठ जीबी तक रैम होती है। इंटरनेट टेलीफोन की सीमा से मुक्त होकर आंखें चौंधियाती रफ्तार वाले ब्रॉडबैंड और फाइबर ऑप्टिक केबल का वरण कर चुका है और उसकी रफ्तार सैंकड़ों गुना बढ़ चुकी है (एअरटेल इन दिनों 32 एमबीपीएस वाले कनेक्शन दे रहा है)। तब 512 केबीपीएस के जिस कनेक्शन के लिए तब 36 लाख रुपए देने पड़ते थे, वह आज ब्रॉडबैंड पर दो-तीन सौ रुपए प्रतिमाह में उपलब्ध है।

'आलवेज ऑन' रहने वाले इंटरनेट के युग में 'हैंडशेक' की ध्वनि अतीत की बात हो गई है। इंटरनेट आज चंद वेबसाइटों−पोर्टलों, ईमेल और चैट तक सीमित नहीं है, कुछेक क्षणों के मनोरंजन तक सीमित नहीं है। अरबों वेबपेजों, करोड़ों निजी ब्लॉगों, लाखों इंटरनेट आधारित सुविधाओं, हजारों सामाजिक नेटवर्कों, लाखों व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और अनगिनत उपभोक्ता सेवाओं को हमारे पास ले आया है। उसने हमारे दायरे को अकल्पनीय विस्तार दिया है और दैनिक जीवन को पहले से अधिक सुविधाजनक व व्यवस्थित रूप। कनेक्टेड भारतीय के दैनिक जीवन की अनिवार्यता हो गया है। सुबह की चाय और अखबार जैसा ही नियमित और जरूरी। फर्क यह है कि चाय और अखबार के न मिलने से भी कोई बड़ी समस्या नहीं होती लेकिन इंटरनेट के न मिलने पर आज दफ्तर ठप्प हो जाते हैं, कारोबार रुक जाते हैं, संचार प्रणाली पंगु हो जाती है, उपभोक्ता सेवाओं में विराम आ जाता है और जिंदगी ठहर जाती है। सर्वव्यापी होते इंटरनेट ने डाक, कोरियर, प्लेसमेंट एजेंसी, ट्रेवल एजेंट जैसे व्यवसायों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है तो नए जमाने के अनगिनत नए कारोबारों को जन्म भी दिया है। और हम किसी पश्चिमी देश की नहीं, भारत की बात कर रहे हैं।

पिछले दिनों आई इस खबर ने सबका ध्यान खींचा था कि भारत में हाल ही में नौकरी बदलने वाले 40 फीसदी लोगों को उनकी नई नौकरी इंटरनेट के जरिए मिली। एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान केली सर्विसेज के ग्लोबल वर्कफोर्स सर्वे का निष्कर्ष था कि नौकरी तलाशने के मामले में भारतीय लोग विश्व के सबसे ज्यादा इंटरनेट−प्रिय लोग हैं। सिर्फ नौकरी ही क्यों, हमारे यहां तो अब दुल्हन ढूंढने से लेकर किराए का मकान ढूंढने तक और रेल टिकट से लेकर हवाई टिकट कटवाने तक के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल हो रहा है।

भारत में इंटरनेट की सफलता अब किसी बहस का विषय नहीं रही, वह एक तथ्य बन चुकी है। पहले सॉफ्टवेयर विकास, फिर आउटसोर्सिंग और अब इंटरनेट आधारित सेवाओं के मामले में बहुत आगे बढ़ चुके हैं। भारत में इंटरनेट उपयोक्ताओं की संख्या 15 करोड़ तक जा पहुंची है और इस सूची में हर साल 40 फीसदी उपभोक्ता और जुड़ जाते हैं। मोबाइल कनेक्शनों के मामले में हम धीरे-धीरे एक अरब के आंकड़े की तरफ बढ़ रहे हैं। तो क्या हमारा संचार ढांचा इतना मजबूत हो चुका है कि वह इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सेवाएं देने में सक्षम है? देखिए, आपको अहसास होने से पहले ही देश में इंटरनेट कितनी बड़ी व्यावसायिक शक्ति बन गया है। क्या आपको यकीन होगा कि भारत में इंटरनेट के जरिए होने वाला कारोबार 96,228 करोड़ रुपए तक पहुंचने वाला है! यानी करीब−करीब एक लाख करोड़।

बुलबुले से दबदबे तक

हॉटमेल का विकास कर उसे 1700 करोड़ रुपए में माइक्रोसॉफ्ट को बेचने वाले सबीर भाटिया से प्रेरणा लेकर और अपने नए विचारों, नई परिकल्पनाओं, तकनीकी कौशल, उद्यमिता की लगन और यौवन के हौंसलों के साथ अनंत संभावनाओं वाले इंटरनेट विश्व में छलांग लगाने वाले जोशीले भारतीय युवकों ने भारत में इस नए माध्यम की सफलता की पटकथा लिखी है। भले ही वे इंडियावर्ल्ड के राजेश जैन (जिन्होंने अपनी वेबसाइट को सिफी को 500 करोड़ रुपए में बेचा) हों, बाजी.कॉम के अवनीश बहल (जिनकी वेबसाइट का अमेरिकी कंपनी ईबे ने 200 करोड़ रुपए में अधिग्रहण किया) हों या फिर संजीव बीखचंदानी (जिनकी नौकरी.कॉम की मार्केट कैपिटल 2000 से 2500 करोड़ रुपए के बीच है) हों, या फिर भारतीय रेलवे कैटरिंग एवं पर्यटन कारपोरेशन हो जो रोजाना इंटरनेट के जरिए करोड़ों रेल टिकट बेच रहा है, ने इंटरनेट आधारित उद्यमिता का लोहा मनवाया है।

आज का इंटरनेट 2000−2001 के डॉट कॉम बुलबुले वाला इंटरनेट नहीं है, वह ग्लोबल विलेज के साथ−साथ विश्वव्यापी सुपर बाजार भी है, ऑफलाइन विश्व की सेवाओं को ज्यादा सुविधाजनक रूप से और अपनी शर्तों पर हासिल करने का जरिया भी है। आज आप बिल जमा करने के लिए लाइन में लगने को बाध्य नहीं हैं। किसी जमाने में परीक्षाफल छापने के लिए अखबारों के विशेष परिशिष्ट निकला करते थे (शायद कुछ अब भी निकल रहे हैं) लेकिन जरा सोचिए कि क्या अब नतीजा देखने के लिए अपने घर या कंप्यूटर से दूर जाने की जरूरत है? आम वेतनभोगी ने कभी सोचा था कि वह शेयर बाजार में पैसा लगाएगा? लेकिन इंटरनेट के जरिए शेयर बाजार खुद आपके करीब आ गया है। मोबाइल फोन रिचार्ज कराने से लेकर डिश टीवी का ग्राहक शुल्क अदा करने तक, घर से बाहर निकलने की जरूरत ही कहां है? जरा याद कीजिए आप पिछली बार किसी मित्र या रिश्तेदार को संदेश भेजने के लिए कब डाकघर गए थे!

इंडियाबुल्स, एडुकोम्प, इंडियाइन्फोलाइन जैसी कंपनियां तो सबको हैरत में डाल रही हैं। न सिर्फ वे करोड़ों का कारोबार करने या करोड़ों को सेवाएं देने वाली सफल इंटरनेट कंपनियां हैं बल्कि अब उनके लिए वर्चुअल विश्व भी छोटा पड़ रहा है। वे इंटरनेट में इतना धन कमा चुकी हैं कि उसे निवेश करने के लिए उन्हें पारंपरिक अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में जाना पड़ रहा है। इंडियाबुल्स को ही देखिए, शेयर कारोबार से कदम बढ़ाकर वह देश में रियल एस्टेट क्षेत्र की बहुत बड़़ी कंपनी बनकर उभर रही है और अब तो विमानन, म्युचुअल फंड, बिजली उत्पादन और रिटेल कारोबार तक में प्रवेश करने जा रही है। इंटरनेट की कोख से जन्मी इस अकेली कंपनी की नेटवर्थ कुछ हजार करोड़ रुपए है और उसने एक विदेशी कंपनी का करीब 1100 करोड़ रुपए में अधिग्रहण किया है।

सफलता का यह दौर आसानी से नहीं आया। इसके पीछे छिपी है अनंत संघर्ष और सफलता अर्जित करने के संकल्प की गाथाएं। भारतीय इंटरनेट योद्धाओं की स्थित उिनके अमेरिकी समकक्षों जैसी नहीं थी। आर्थिक संकटों और तकनीकी समस्याओं के साथ−साथ उन्हें उपेक्षा, दुत्कार और अविश्वास से भी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन उन्होंने डॉट कॉम ध्वंस को भी बखूबी झेला और उसके ताप में कुंदन बनकर निकले। उस दौर में अनगिनत भारतीय वेबसाइटें और पोर्टल आर्थिक ऑक्सीजन की कमी से हांफते−हांफते दम तोड़ गए और हवाई महत्वाकांक्षा के गुब्बारे में सवार न जाने कितने पोर्टल तंगी के तूफान में टूटी डोर वाली पतंग की तरह उड़ गए। लेकिन जिनके पास विजन का वज़न, कामकाज का सफल मॉडल और कारोबारी समझ थी वे विकराल लहरों के प्रवाह में भी तैरते रहे, बढ़ते रहे। इन वेबसाइटों, पोर्टलों और वेब आधारित सेवाओं ने बिजनेस मॉडल की गैर−मौजूदगी के युग में अपनी वेबयात्रा शुरू की और संघर्ष, जीवट, कारोबारी चतुराई और दूरदर्शिता का प्रदर्शन करते हुए न सिर्फ अपना अस्तित्व बचाए रखा बल्कि अपने आकार, कलेवर, संसाधनों, छवि, ब्रांड वेल्यू, नेटवर्क, प्रभाव और मूल्य में सैंकड़ों गुना विस्तार किया। आम जनों को उपलब्ध इंटरनेट के आगमन के लगभग तेरह साल बाद भारत के इन सफल इंटरनेट योद्धाओं पर एक नजर डालने का संभवतरू यह मुफीद मौका है।

(यह आलेख सन 2008 में लिखा गया था। हालाँकि इसका अधिकांश भाग आज भी प्रासंगिक है)

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