Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 17 मार्च 2013
श्रेणीः  अभिव्यक्ति की आज़ादी
प्रकाशनः राष्ट्रीय सहारा
टैगः  मीडिया

लब्बोलुआबः

आशीष नंदी ने जो कुछ कहा, उससे आप असहमत हो सकते हैं, उनकी निंदा भी कर सकते हैं लेकिन उनकी गिरफ्तारी की मांग किस आधार पर की जा सकती है। उनके विरुद्ध मुकदमा किस आधार पर दर्ज किया जा सकता है। क्या विचारकों के इस देश में किसी को अपने शोध और चिंतन का मर्म प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वह कुछ लोगों की विचारधारा के अनुकूल नहीं है?

Summary:

Freedom of expression is again under attack. This time in all forms of media, entertainment and social discource.
ऑनलाइन, ऑफलाइनः कहाँ महफूज है अभिव्यक्ति?

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

सोशल मीडिया के सूचना विस्फोट, अभिव्यक्ति की आजादी बचाने की जिम्मेदारी, कानून-व्यवस्था को दुरुस्त रखने का जिम्मा और राजनैतिक समीकरणों को सुरक्षित बनाए रखने की मजबूरी के बीच भारतीय सत्ता तंत्र लोकतंत्र की कसौटी पर बार-बार इम्तिहान के दौर से गुजर रहा है। यूँ तो अभिव्यक्ति की आजादी पर पारंपरिक रूप से ही संकट रहा है, लेकिन ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया के जरिए हर आमो-खास को सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने के उपकरण मिल जाने के बाद सरकार की हालत कुछ-कुछ वैसी हो गई है जैसे गोवा के बीच पर किसी गँवई पुलिसवाले के पहुँच जाने पर होती है। सैलानियों को उसकी मौजूदगी पर ऐतराज है और उसे उनकी तथाकथित 'आजादी' पर। उसका बस चले तो सबको वहाँ से बाहर करे, मगर वैसा करने की आजादी भी नहीं है। वह भुनभुनाते हुए लौट जाता है, हालाँकि अंत तक उसकी समझ में नहीं आता कि यह हो क्या रहा है।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र एक अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर एक बार फिर खबरों में है। कमल हासन की फिल्म 'विश्वरूपम', से लेकर सलमान रुश्दी के कोलकाता दौरे तक, समाजशास्त्री आशीष नंदी की टिप्पणी के विवाद से लेकर एक चित्र प्रदर्शनी को भंग किए जाने तक और कश्मीर की लड़कियों के बैंड के साथ हुए सलूक से लेकर सोशल मीडिया से जुड़ी गिरफ्तारियों तक हमने ऐसा कतई सिद्ध नहीं किया है कि लोकतंत्र में लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार होता है। ताजा घटनाक्रम ने सोचने-समझने और कहने में सक्षम हर मस्तिष्क को यही संदेश दिया है कि अपनी बात अपने मन में रखना बेहतर है। कौन जाने, समाचार माध्यमों, सांस्कृतिक-साहित्यिक-सामाजिक आयोजनों और सोशल मीडिया पर आपकी किस स्वाभाविक सी टिप्पणी का कैसा अर्थ निकाल लिया जाए और कब आप जेल की सलाखों के पीछे पहुँच जाएँ। जाहिर है, यह वह भविष्य नहीं है जिसका सपना हमारे राष्ट्र की स्थापना करने वाले महापुरुषों ने देखा होगा, जिन्होंने सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सत्ता को हिलाने में अपने विचारों की शक्ति का बेहतरीन इस्तेमाल किया था। लेकिन किसे फर्क पड़ता है!

मौजूदा हालात लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं हैं। व्यवस्था आपकी अभिव्यक्ति को संरक्षण देने के अपने बुनियादी दायित्व को निभाने में नाकाम है। उल्टे, कई बार वह उन तत्वों के साथ खड़ी दिखाई देती है जो आपकी अभिव्यक्ति को बलपूर्वक दबाने की कोशिश करते हैं। ऐसी हालत में यह अस्वाभाविक नहीं है कि 'रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर्स' के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2013 में भारत को 179 देशों के बीच 140वें स्थान पर रखा गया है।

सलमान रश्दीः यह सांस्कृतिक इमरजेंसी है।
भारत जैसे स्थापित लोकतंत्र में स्वतंत्र वचन के बरक्स असुरक्षा बोध और अपने दायित्वों को पहचानने में नाकामी गैरजरूरी और निराशाजनक है। जहाँ एक तरफ वह सिनेमा, किताब, भाषणों आदि के संदर्भ में जरूरत से ज्यादा कड़ाई दिखाने लगा है, वहीं सोशल मीडिया के मामले में उसकी प्रतिक्रियाएँ दिखाती हैं कि उसे अहसास ही नहीं है कि यह हो क्या रहा है! युवा वर्ग के लिए सोशल मीडिया हवा-पानी और भोजन जैसा बनता जा रहा है। उस युवा वर्ग के लिए जो भारत की आबादी में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी रखता है। लेकिन उसकी सहज अभिव्यक्ति के माध्यम से सरकार पूरी तरह कटी हुई, बल्कि अनभिज्ञ है।

सोशल मीडिया से कपिल सिब्बल जैसे उम्रदराज नेताओं का 'डिसकनेक्ट' तो समझ आता है, लेकिन राहुल गांधी और उनके युवा साथियों की मौजूदगी के बावजूद सरकार के समक्ष अगर सोशल मीडिया की अवधारणा स्पष्ट नहीं है तो वह आश्चर्य ही नहीं, अफसोस की बात भी है। शशि थरूर ने सामाजिक माध्यमों का अच्छा इस्तेमाल किया है। यूपीए के घटक दल के नेता उमर अब्दुल्ला भी कुछ हद तक इसे समझने में कामयाब रहे हैं। कहने को तो प्रधानमंत्री और कई दूसरे नेता भी सोशल मीडिया पर हैं लेकिन उन्होंने उसे अपनी बात कहने का जरिया नहीं बनाया है। सरकारी कार्यक्रमों के अपडेट देने के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल में कोई हर्ज नहीं है लेकिन सरकार को यह भान होना चाहिए कि यह डॉक्यूमेंटेशन का जरिया भर नहीं, अनौपचारिक किंतु शक्तिशाली निजी समाचार माध्यम भी है, जिस पर जिम्मेदारी के साथ अपनी बात कही जा सकती है और अपने पाठकों के साथ 'कनेक्शन' जोड़ा जा सकता है। इसे समझे बिना सरकार दूसरों की टिप्पणियों पर अतिशय प्रतिक्रिया करती रहे तो इसमें क्या आश्चर्य!

आशीष नंदीः अपने विचार रखने का हक नहीं?
आशीष नंदी ने जो कुछ कहा, उससे आप असहमत हो सकते हैं, उनकी निंदा भी कर सकते हैं लेकिन उनकी गिरफ्तारी की मांग किस आधार पर की जा सकती है। उनके विरुद्ध मुकदमा किस आधार पर दर्ज किया जा सकता है। क्या विचारकों के इस देश में किसी को अपने शोध और चिंतन का मर्म प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है, सिर्फ इसलिए कि वह कुछ लोगों की विचारधारा के अनुकूल नहीं है? उन्होंने किसी के विरुद्ध मानहानिकारक टिप्पणी नहीं की, किसी का अपमान नहीं किया, बस अपनी बात कही और वह बात भी वे तुरंत दिखी प्रतिक्रिया की वजह से ढंग से नहीं कह सके जो बहुत दुखद है। क्या अब विचारकों और बुद्धिजीवियों को अपने विचारों को रखने से पहले राजनैतिक दलों और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों की मंजूरी लेनी होगी? क्या यह लोकतांत्रिक राष्ट्र सुकरात के युग में पहुँचने का जोखिम ले सकता है? लोग सुकरात को भूल गए हैं और वाल्तेयर को भी जिन्होंने कहा था कि भले ही मैं तुम्हारे विचारों से सहमत न होऊं, लेकिन विचार प्रकट करने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा करूँगा।

आज अगर यह कहा जा रहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ अपराधियों, सांप्रदायिक तत्वों, अतिवादियों, उग्रवादियों, कट्टरपंथियों आदि के लिए ही बच गई है तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं है। वे किसी भी फिल्म का प्रदर्शन रोक सकते हैं, किसी भी प्रदर्शनी को बाधित कर सकते हैं, किसी भी वक्ता को अपने शहर में घुसने से रोक सकते हैं।

सलमान रश्दी ने जिसे सांस्कृतिक इमरजेंसी कहा है उसे कुछ लोगों ने सांस्कृतिक आतंकवाद कहा है और दुर्भाग्य से हमारी सरकारें, भले ही वे केंद्र में हों या राज्यों में, ऐसे तत्वों के सामने विवश नजर आती हैं। विश्वरूपम विवाद पर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने जो कहा, वह उनकी प्रशासनिक क्षमताओं पर तो सवालिया निशान लगाता है ही, यह भी साफ कर देता है कि पब्लिसिटी पाने के इच्छुक या वोटों पर नजर रखे कुछ लोगों का समूह अगर चाहे तो आपकी रचनात्मकता पर हमेशा के लिए ताला लगा सकता है। उन्होंने कहा कि कई संगठनों ने सिनेमाघरों पर प्रदर्शनों की धमकी दी थी और राज्य सरकार के पास ऐसे प्रदर्शनों को रोकने लायक पुलिस बल नहीं है। क्या यह किसी फिल्म को प्रदर्शन से रोकने का आधार बन सकता है?

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