Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 17 मार्च 2013
श्रेणीः  न्यू मीडिया
प्रकाशनः राष्ट्रीय सहारा
टैगः  सोशल मीडिया

लब्बोलुआबः

क्या सोशल मीडिया में सब कुछ ठीकठाक है? क्या बंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों में उसकी बदौलत बड़े पैमाने पर हुआ लोगों का पलायन और सामाजिक असुरक्षा का माहौल एक हकीकत नहीं है? क्या सरकार की उठाई सभी आपत्तियाँ नाजायज हैं और सोशल मीडिया में मौजूद हर शख्स, हर कन्टेन्ट इतना पवित्र कि छूने से मैला हो जाए?

Summary:

Is everything just fine with new media? Are all the objections raised by various government department regarding its misuse are incorrect? We cannot escape the reality that new media is also being used as a platform where anyone can say anything against anyone and vanish! Not just ordinary citizens, new media has empowered criminals and anti-social elements as well.
जायज है सोशल मीडिया में असामाजिक तत्वों के दखल की चिंता

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

भारत में सामाजिक विभाजनों को पैदा करने वाले कारकों की कभी कमी नहीं रही- जातिवाद, पंथवाद, क्षेत्रीयता, आर्थिक असमानता और ऊपर से राजनीति। ऐसे में, सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर लोगों के बीच संदेह और नफरत का माहौल पैदा करने वालों ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को विकृत करने के लिए एक और मोर्चा खोल दिया है। सन् 2012 के अंत में कॉस्मोपॉलिटन माने जाने वाले दक्षिण भारतीय शहरों में सोशल नेटवर्किंग साइटों और मोबाइल फोन के जरिए किए गए दुष्प्रचार के बीच पूर्वोत्तर के लोगों को अचानक महसूस हुआ कि वे अपने ही देश में अकेले और असुरक्षित हैं। आशंका और भय की राष्ट्रव्यापी लहर कौंध गई और हजारों-हजार लोग पलायन पर मजबूर हो गए।

कश्मीर से पंडितों के पलायन के बाद भारत में इस तरह की परिघटना देखी नहीं गई थी। लेकिन कश्मीर के हालात तो कुछ और थे। वहाँ असुरक्षा बोध के मजबूत कारण थे। जबकि यहाँ बंगलुरु, पुणे और हैदराबाद में तो न आतंकवाद था और न ही सांप्रदायिक दंगों जैसी बात! इसके बावजूद अगर बिना किसी ठोस कारण के लोग सिर्फ दुष्प्रचार के आधार पर इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन के लिए मजबूर हो जाते हैं तो सोशल मीडिया की अपिरिमित शक्ति से सिर्फ प्रभावित ही नहीं, आशंकित होने की भी जरूरत है।

बहरहाल, पूर्वोत्तर के लोगों के पलायन ने सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों का अहसास तो कराया है लेकिन न जाने क्यों टेलीविजन की बहसों, अखबारो के लेखों-संपादकीयों और खुद न्यू मीडिया के मंचों पर जो एक बात बार-बार छूट जा रही है, वह यह है कि इस मीडिया की कोई सामाजिक जिम्मेदारी भी बनती है या नहीं? इतना विशाल माध्यम, जिसका हर सदस्य अपने आप में मीडिया की भूमिका निभा रहा है, क्या भूत-भविष्य-वर्तमान में किसी भी तरह की निगरानी या रेगुलेशन से मुक्त रहने का नैसर्गिक अधिकार लेकर आया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि मीडिया के अधिकारों का सवाल उठाते हुए हम परोक्ष रूप से ऐसे तत्वों के हक़ में बोल रहे हैं जो इसका किसी न किसी रूप में गलत और अनैतिक इस्तेमाल कर रहे हैं!

वाजिब आशंकाओं पर आधारित एक जरूरी बहस पटरी से उतर गई लगती है। एक तरफ ऑनलाइन विश्व के नागरिकों का ओवर-रिएक्शन है तो दूसरी ओर केंद्र सरकार की अदूरदर्शिता, जिसने हड़बड़ाहट में कई अव्यावहारिक और सवाल उठाने लायक कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने और सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करने वाले तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई के नाम पर जिन तीन सौ इंटरनेट ठिकानों की सूची तैयार हुई, उनमें कई ऐसे पत्रकार, नेता, संगठन और प्रकाशन संस्थान भी शामिल हैं जिनकी राष्ट्रभक्ति और उत्तरदायित्व बोध पर संदेह नहीं किया जा सकता। इनका असम की घटनाओं या फिर दक्षिण भारतीय शहरों के उत्तर-पूर्वी भारतीयों में फैली दहशत से कोई संबंध नहीं है।

सरकारी कार्रवाई से यह संदेश गया है कि वह एक समस्या का इस्तेमाल राजनैतिक हिसाब-किताब चुकता करने में कर रही है। इसकी उग्र प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी लेकिन दुर्भाग्य से हमने सोशल मीडिया की कमियों और सीमाओं पर सर्वानुमति बनाने और उनके समाधान का अच्छा मौका खो दिया है। गलत मंसूबों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल के विरुद्ध अंकुश लगाने की जिस मुहिम का स्वागत होना चाहिए था, वह खुद ही भटककर संदेह के घेरे में आ गई है। न सिर्फ मीडिया, न सिर्फ विपक्षी दल बल्कि खुद सत्तारूढ़ दल के शशि थरूर जैसे लोग और यहाँ तक कि जुलियन असांजे के पीछे हाथ धोकर पड़ा अमेरिका तक भारत सरकार के रुख से इत्तफाक नहीं रखता जिसने उसे ऑनलाइन माध्यमों की स्वायत्तता सुनिश्चित करने की ‘सलाह’ दी है।

तो क्या सोशल मीडिया में सब कुछ ठीकठाक है? क्या बंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों में उसकी बदौलत बड़े पैमाने पर हुआ लोगों का पलायन और सामाजिक असुरक्षा का माहौल एक हकीकत नहीं है? क्या सरकार की उठाई सभी आपत्तियाँ नाजायज हैं और सोशल मीडिया में मौजूद हर शख्स, हर कन्टेन्ट इतना पवित्र कि छूने से मैला हो जाए?

ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया के बारे में हमारी धारणाओं को लेकर काफी भ्रम की स्थिति है। एक भ्रम सरकार के स्तर पर है जिसे लगता है कि आम लोगों के कन्टेन्ट को होस्ट करने वाला हर प्लेटफॉर्म हर एक सामग्री को नेट पर डाले जाने से पहले उसे पढ़ कर उचित-अनुचित का फैसला करने में सक्षम है। दूसरी तरफ एक्टीविस्ट, पारंपरिक मीडिया और राजनैतिक दल हैं जिन्हें यह लगता है कि सरकार नए मीडिया के विनियमन की कोई भी कोशिश अगर करती है तो वह आज नहीं तो कल वेब-सेंसरशिप में बदलने वाली है। मुझे लगता है कि सोशल मीडिया से उपजे खतरों की ताजा बहस में दोनों ही पक्ष थोड़े सही, थोड़े गलत और थोड़े भ्रमित हैं।

न्यू मीडिया और खास तौर पर सोशल मीडिया के उपयोग, दुरुपयोग, आचरण, अधिकारों और दायित्वों का मुद्दा अब तक अनसुलझा है। इस मीडिया ने इंटरनेट की मुक्त प्रकृति का लाभ तो उठाया है लेकिन उसके अनुरूप जिस किस्म का दायित्वबोध होना चाहिए वह नदारद है।

भारत के लिए इस मीडिया के नकारात्मक पहलुओं को महसूस करने का यह पहला बड़ा मौका था। लेकिन दूसरे देशों में ऐसी घटनाएँ होती रही हैं। चीन में फौजी बगावत की अफवाहें फैलाने में सोशल मीडिया पर सक्रिय तत्वों का हाथ रहा। उधर इंग्लैंड के दंगों के दौरान ब्लैकबेरी संदेशों, फेसबुक और एसएमएस के जरिए ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि फलाँ जगह पर 50 नकाबपोश हमलावर युवक पहुँचे हैं। अभी-अभी ओमान सरकार ने भी बेबुनियाद अफवाहें फैलाने के लिए सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को चेतावनी दी है। और अपने ही देश में ईद के दिन फैली इस अफवाह में भी आधुनिक संचार माध्यमों का ही हाथ है कि महिलाओं द्वारा लगाई जाने वाली मेहंदी में जहर मिला हुआ है। यह संदेश मिलने के बाद हजारों भयभीत मुस्लिम महिलाएँ अस्पताल पहुँची थीं। जाहिर है, कोई है जो सोशल मीडिया का इस्तेमाल उस मकसद के लिए कर रहा है जिसके लिए यह मीडिया बनाया नहीं गया था। ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के नाम पर ऐसे लोगों को सुरक्षा नहीं दी जा सकती।

सोशल मीडिया के संदर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी का तर्क देते समय कई अहम पहलुओं पर विचार करना ज़रूरी है। यह प्रिंट मीडिया या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसा माध्यम नहीं है जहाँ संपादकीय नियंत्रणों, नैतिकताओं, आत्मानुशासन और आत्म विवेक जैसी चीजों के साथ-साथ कारोबारी स्तर पर भी कुछ सीमाएँ मौजूद हैं। देश का कानून तो उस पर लागू होता ही है। इस किस्म के परोक्ष नियंत्रण या आचरण आधारित सीमाएँ पारंपरिक मीडिया को जिम्मेदार बनाती हैं। लगभग हर मीडिया संस्थान के भीतर मौजूद आंतरिक व्यवस्था उसे काफी हद तक अफवाहों पर आधारित, वैमनस्य फैलाने वाले, अश्लील, अनैतिक, कृत्रिम और दुर्भावनापूर्ण कन्टेन्ट के प्रकाशन से मुक्त कर देती है। न्यू मीडिया और सोशल मीडिया की स्थिति इससे अलग है।

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