Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 17 मार्च 2013
श्रेणीः  न्यू मीडिया
प्रकाशनः पुस्तक की प्रस्तावना
टैगः  मीडिया

लब्बोलुआबः

भारत में न्यू मीडिया की आंतरिक शक्तियाँ, पहुँच और विस्तार तो बहुत है, मगर राजनैतिक-सामाजिक हालात पर वैसा प्रभाव नहीं है जैसा प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का है। यह स्थिति पश्चिमी ट्रेंड्स के बिल्कुल विपरीत है लेकिन यह एक खालिस हिंदुस्तानी असलियत है। हालात बदलेंगे जरूर, लेकिन कब− इसका सिर्फ कयास लगाया जा सकता है।

Summary:

New media, equipped with a collective power of web, telecommunication and other digital tools, has expanded its reach to a phenomenal level. However, compared to print and electronic media, new media is yet to be taken seriously by the establishment and socio-political influencers.
व्यवस्था पर न्यू मीडिया का असरः दिल्ली अभी दूर है!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

न्यू मीडिया के बारे में भारत में, खासकर हिंदी में प्रकाशित सामग्री की कमी है। उसी के लिहाज से इस बारे में जागरूकता भी कम है। तेज गति से बढ़ते इस मीडिया की महत्ता और भूमिका के मद्देनजर यह कमी खटकती है। डिजिटल माध्यमों की अपार लोकप्रियता और उन पर बढ़ती निर्भरता के मद्देनजर ऐसे प्रकाशनों की झड़ी लग जानी चाहिए जो उपयोक्ताओं तथा पेशेवरों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी हों।

विकसित देशों के अखबारों और पत्रिकाओं में न्यू मीडिया के प्रभाव, विस्तार और क्षमताओं को लेकर आशंकाओं का माहौल है। अमेरिका और यूरोप में प्रिंट मीडिया लगातार आर्थिक दबाव में है। न सिर्फ मंदी के प्रभाव से बल्कि विज्ञापनों और सबस्क्रप्शिन में कमी के कारण भी। वहां कई प्रमुख अखबार बंद हो गए हैं और बहुत से इंटरनेट पर चले गए हैं। दूसरी ओर, अनेक न्यू मीडिया संस्थान सन 2000 के डॉट काम ध्वंस से मुक्त होकर मजबूती से स्थापित हो चुके हैं। विज्ञापनों के साथ−साथ वे ई−कामर्स के जरिए भी पर्याप्त राजस्व अर्जित कर रहे हैं।

प्रिंट और न्यू मीडिया के बीच पिछले पांच−छह साल से चल रहे द्वंद्व में धीरे−धीरे बाजी न्यू मीडिया के हाथ में आती जा रही है। मौजूदा परिस्थितियों का संदेश स्पष्ट है। पुरानी कहावत है कि जब आप अपने प्रतिद्वंद्वी को हरा न सकें तो उससे हाथ मिला लेना बेहतर है। पश्चिमी मीडिया को बदली परिस्थितियों का अहसास है और उसने वेबसाइटों, पोर्टलों, एप्लीकेशनों, सेवाओं और ई−कामर्स के जरिए नए मीडिया को अपनाना शुरू कर दिया है। अगर मीडिया की दुनिया और दुनिया के मीडिया में सचमुच कोई हवा चल रही है तो वह प्रिंट से न्यू मीडिया की ओर चल रही है।

लेकिन भारत में आज भी हालात अलग दिखाई देते हैं। यहां प्रिंट का दबदबा न सिर्फ कायम है, बल्कि बढ़ रहा है। टेलीविजन और रेडियो की भी यही स्थित हिै। लेकिन गौर करने लायक तथ्य यह है कि बढ़ न्यू मीडिया भी रहा है। हालांकि उसकी रफ्तार फिलहाल औरों जैसी नहीं है। तहलका और कोबरापोस्ट जैसे उदाहरणों को छोड़ दें तो यहां न्यू मीडिया ने सामाजिक या राजनैतिक स्तर पर कोई बहुत बड़ा ज़लज़ला खड़ा नहीं किया। लेकिन इनकी तुलना आप विकीलीक्स जैसे विश्वव्यापी भूचाल से नहीं कर सकते।

यूं भी, भारत में न्यू मीडिया को अब तक मीडिया की मुख्यधारा में वैसा महत्व नहीं मिला है जैसा उसे कुछ अन्य देशों में प्राप्त है। सत्ता तंत्र, कारोबार जगत और समग्र मीडिया विश्व की दृष्टि में आज भी वेबसाइटों और पोर्टलों को अनौपचारिक किस्म के मास मीडिया संस्थानों के रूप में देखा जाता है। उसकी मौजूदा स्थित किी तुलना कुछ हद तक भाषायी पत्रकारिता से की जा सकती है, जिसके विस्तार और लोकप्रियता को तो सब मानते हैं किंतु महत्व अंग्रेजी पत्रकारिता को ही देते हैं। प्रश्न उठता है कि इस स्थित किे लिए हमारी पारंपरिक सोच और पूर्वाग्रह जिम्मेदार हैं या फिर कमी भारतीय न्यू मीडिया की ओर से ही है, जो खुद को बहुत आक्रामक, सनसनीखेज या नाटकीय अंदाज में पेश करने की जरूरत नहीं समझता (संदर्भ विकीलीक्स)?

मुझे लगता है कि भारत में न्यू मीडिया की प्रकृति सूचनात्मक और संदर्भात्मक अधिक बन गई है। इसने उसे यह क्षमता तो दी है कि वह छोटी से छोटी बात को भारत के दूरदराज के क्षेत्र में मौजूद इंटरनेट उपयोक्ता तक पहुंचा दे, लेकिन वह राजनैतिक शक्ति नहीं दी जो यथास्थिति के सन्नाटे में कौंध और धमक पैदा करे। उसे अपरिहार्य और अनुपेक्षणीय बनाए। जो हमें क्षण भर रुककर उसके हस्तक्षेप का नोटिस लेने के लिए मजबूर करे। उसकी आंतरिक शक्तियाँ, पहुँच और विस्तार तो बहुत है, मगर राजनैतिक-सामाजिक हालात पर वैसा प्रभाव नहीं है जैसा प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया का है। यह स्थिति पश्चिमी ट्रेंड्स के बिल्कुल विपरीत है लेकिन यह एक खालिस हिंदुस्तानी असलियत है। हालात बदलेंगे जरूर, लेकिन कब− इसका सिर्फ कयास लगाया जा सकता है।

इन हालात के कई सकारात्मक पहलू भी हैं। न्यू मीडिया ने भले ही सामाजिक−राजनैतिक दबदबा न बनाया हो लेकिन हर कंप्यूटर, लैपटाप, स्मार्ट फोन और मोबाइल फोन के भीतर उसकी मौन क्रांति घटित हो रही है। इस रूप में या उस रूप में, वह हर व्यक्ति के जीवन से जुड़ा है। भौगोलिक सीमाओं से मुक्त होने के साथ−साथ वह राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सीमाओं से भी मुक्त करने वाले लोकतांत्रिक हस्तक्षेप के रूप में उभरा है। वास्तविक भूमंडलीकरण, वास्तविक लोकतंत्र, वास्तविक समावेशीकरण, वास्तविक पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाला जरिया बन रहा है। किसी न किसी फॉरमैट में वह हर समय आपके साथ है, आपको अधिक सक्षम, समर्थ, अपडेट, इंटर−एक्टिव और कनेक्टेड बना रहा है। इस असीमित विस्तार में विकास और सफलता की असीमित संभावनाएं भी निहित हैं। क्या यह एक आदर्श स्थित निहीं? अंततः मास मीडिया की असली भूमिका, जिम्मेदारी और सार्थकता आम आदमी के लिए उपयोगी बनने में ही तो निहित है!

जब तक विकसित दुनिया के मीडिया ट्रेंड्स हम तक पहुंचते हैं, यह सार्थकता और उपयोगिता न्यू मीडिया को प्रासंगिक बनाए रखेगी।
(यह आलेख इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'न्यू मीडिया : चुनौतियाँ और संभावनाएं' की प्रस्तावना के तौर पर लिखा गया था)

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