Balendu Sharma Dadhich
रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 14 मार्च 2013
श्रेणीः  विदेश संबंध
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  पाकिस्तान

लब्बोलुआबः

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ को विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के दोपहर भोज का विवाद निरर्थक है। विदेश नीति से जुड़े फैसले सरकार पर ही छोड़ दिए जाने चाहिए जो उत्तेजना या भावुकता में बहने का जोखिम नहीं ले सकती।

Summary:

Some people have objected to External Affairs Minister Salman Khurshid hosting a lunch for Pakistan premier Raja Pervez Ashraf in Jaipur citing the present bad phase of relations between the two countries as a reason. A government is better fit to take care of such decisions keeping in mind the needs of the country and its foreign policy, and it should be allowed to carry out its duty as no one else but the government itself is accountable for such decisions. There is little scope for media or the opposition in forcing the government to take decisions based on peoples' emotions which may not always be suitable to a country's long term policy directions.
राजा परवेज़ अशरफ के दोपहर भोज की थाली में तूफान!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

कुछ हिंदी टेलीविजन चैनलों को ऐतराज है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज़ अशरफ की निजी अजमेर शरीफ यात्रा के दौरान विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की तरफ से दोपहर भोजन का आयोजन क्यों किया गया। उन्होंने अजमेर शरीफ के लोगों की नाराजगी का भी अच्छा-खासा कवरेज किया है। चैनलों का यह रुख सनसनीखेज ब्रेकिंग न्यूज की अनवरत जरूरत का नतीजा है या अजमेर में इस यात्रा के विरोध में बने माहौल का परिणाम, यह किसी की भी कल्पना का विषय है। लेकिन स्वयँ को भारतीय लोकतंत्र का एक जिम्मेदार स्तंभ मानने वाले मीडिया और हमारे राजनैतिक दलों को विदेश नीति तथा डिप्लोमेसी के मुद्दे सरकार पर ही छोड़ देने चाहिए। सरकार चलाने, विदेश नीति या कूटनीतिक फैसले करने का काम आम लोगों या मीडिया का नहीं है, जिनकी प्रतिक्रिया प्रायः फौरी और भावुकतापूर्ण होती है। देश के लिए फैसले करने का जिम्मा सरकार का है और वही अच्छे-बुरे फैसलों के लिए जवाबदेह भी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास के दौर में, एक-एक मुद्दे को लेकर व्यवस्था पर दबाव बनाने और उसे हल्केपन में लिए जाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती चली गई है। मीडिया और लोगों का दबाव ऐसे मुद्दों पर होने वाले फैसलों, सरकारी प्रक्रियाओं, जाँच प्रक्रियाओं और यहाँ तक कि अदालती प्रक्रियाओं पर भी सीधा नहीं तो परोक्ष असर अवश्य डालता है।

हालाँकि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मौजूदा यात्रा उनकी निजी धार्मिक श्रद्धा पर आधारित है लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों का इतिहास राजनीति से अलग हटकर की जाने वाली इस तरह की यात्राओं के महत्व को बखूबी रेखांकित करता है। जब-जब दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर था, सीमा के इस या उस पार से तनाव दूर करने की हल्की-फुल्की, लेकिन कूटनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण कोशिशें की जाती रही हैं। संयोगवश, पाकिस्तान की तरफ से ऐसी कोशिशें ज्यादा हुई हैं।

जनरल जिया उल हक से लेकर जनरल परवेज मुशर्रफ और बेनजीर भुट्टो से लेकर आसिफ अली जरदारी तक कभी क्रिकेट मैच देखने तो कभी धार्मिक यात्राओं के लिए भारत आते रहे हैं। सन 2011 में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ही अपने पाकिस्तानी समकक्ष यूसुफ रजा गिलानी को क्रिकेट विश्व कप का सेमीफाइनल मैच देखने के लिए आमंत्रित किया था। तब भी राजनैतिक-सामाजिक माहौल में उत्तेजना महसूस की गई थी लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि इन यात्राओं ने बिगड़े भारत-पाक संबंधों को संभालने में मदद की। आज फिर दोतरफा तनाव के दौर में एक 'निजी' यात्रा सम्पन्न हुई है। अब यह बात अलग है कि हम तनाव घटाने में दिलचस्पी रखते भी हैं या नहीं।

पाक प्रधानमंत्री परवेज अशरफ विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के साथ जयपुर में।
राजा परवेज अशरफ की यात्रा के संदर्भ में कुछ हिंदी मीडिया संस्थानों ने न सिर्फ दोपहर भोजन दिए जाने को मुद्दा बनाया बल्कि ऐसे प्रश्न तक उठाए कि श्री अशरफ भारत का नमक खाकर लौटने के बाद क्या इस नमक के साथ इंसाफ करेंगे? उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के प्रतिनिधिमंडल के आकार पर भी सवाल उठाए और पाकिस्तान के नेताओं और प्रमुख लोगों तक से सवाल किए कि भारत में इस दोपहर भोजन को मुद्दा बनाए जाने पर उनकी क्या प्रतिक्रिया है। यह सामान्य शिष्टाचार के अनुकूल नहीं है। पहले इस यात्रा को मुद्दा बनाना, फिर उसमें राजनैतिक दलों को शामिल करना और उसके बाद पाकिस्तानियों से भी सवाल-जवाब कर एक नया विवाद खड़ा करने की कोशिश अफसोसनाक है। बेहतर होता कि इस यात्रा को उतना न्यूनतम महत्व ही दिया जाता, जिसकी एक निजी यात्रा के नाते वह हकदार है।
भारत सरकार की उलझन

राजा परवेज अशरफ की निजी अजमेर शरीफ यात्रा का भारत के लिए विशेष महत्व नहीं है, बल्कि इसने भारत सरकार की उलझनों में इजाफा ही किया है। एक तो यह दोनों देशों के बीच तनाव के एक और दौर की पृष्ठभूमि में आई है, दूसरे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कह चुके हैं कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पाक फौज की शर्मनाक हरकतों के बाद दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध बनाए रखना संभव नहीं रह गया है। सरकार इस यात्रा को लेकर कई दिन से पसोपेश में थी। वह श्री अशरफ को पूरी तरह अनदेखा कर गलत कूटनीतिक संकेत नहीं भेज सकती थी लेकिन साथ ही साथ आपसी संबंधों में तनाव के मौजूदा दौर में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह या राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ उनकी मुलाकात तय कर बहुत 'नरम' भी नहीं पड़ सकती थी। उसने दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच किसी तरह की बैठक से परहेज करना उचित समझा लेकिन कूटनीतिक परंपराओं का सम्मान करते हुए न्यूनतम शिष्टाचार निभाने के लिए विदेश मंत्री के स्तर पर दोपहर भोज के आयोजन का फैसला किया। यह बीच का रास्ता था, जिसे पाकिस्तान के प्रति नरम रुख के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

इधर कुछ हल्कों में यह तर्क दिया गया है कि श्री अशरफ चूँकि 16 मार्च तक ही प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले हैं इसलिए उन्हें दोपहर भोजन देकर महत्व दिए जाने की जरूरत नहीं थी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि डिप्लोमेसी अपनी परिपाटियों, परंपराओं और विदेश नीति की वर्तमान तथा भावी जरूरतों के लिहाज से चलती है। सरकारों के बीच कई स्तरों पर कूटनीतिक संपर्क होते हैं जिनमें से सभी सार्वजनिक रूप से जाहिर किए जाएँ यह आवश्यक नहीं है। दूसरे, विदेश संबंधों में व्यक्ति के बदल जाने से फर्क नहीं पड़ता, देश अधिक महत्वपूर्ण होता है।

राजा परवेज अशरफ पाकिस्तान के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं और अगर भारत सरकार उनके सम्मान में कोई कार्यक्रम करती है तो वास्तव में वह उस राष्ट्र के सम्मान में है। ऐसे में, अशरफ का कार्यकाल कितना बड़ा या सीमित है, चुनावों के बाद वहाँ तसवीर क्या होगी, उससे विशेष फर्क नहीं पड़ता। और यदि सरकार के कूटनीतिक समीकरणों में किसी बदलाव की जरूरत है भी तो इसे विदेश मंत्री और उनके दक्ष तथा अनुभवी कूटनीतिज्ञों की टीम को तय करना है, मीडिया या आम लोगों को नहीं।
विदेश नीति और जनभावनाएँ

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दो भारतीय सैनिकों की हत्या और उनमें से एक का सिर काट कर ले जाए जाने की नृशंष घटना को भारत शायद ही कभी भूल सके। इसकी प्रतिक्रिया में सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह ने सही कहा है कि हम पाकिस्तानियों की हरकत का बदला अपने चुने हुए समय और स्थान पर लेंगे। भारत ने इस शर्मनाक हरकत के लिए पाकिस्तान के साथ हर स्तर पर बात की है और गहरा विरोध भी जताया है। अगर यह कहा जाए कि सरकार या सेना इस घटना के साथ जुड़ी जन भावनाओं के प्रति बेपरवाह है, तो वह उन दोनों के साथ नाइंसाफी होगी। इस घटना ने दोनों देशों के संबंधों पर स्पष्ट नकारात्मक प्रभाव भी डाला है लेकिन क्या उनके संबंधों को हमेशा के लिए उसी बिंदु पर रोक दिया जाना चाहिए?

विदेश नीति के मामले में इस तरह के भावुकतापूर्ण फैसले प्रायः नहीं लिए जाते। अगर ऐसा होता तो अतीत में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्धों के बाद दोनों के बीच राजनैतिक संबंध शुरू ही नहीं होते। लेकिन युद्धोन्माद और उत्तेजनापूर्ण माहौल से ऊपर उठकर ठंडे दिमाग से काम करने वाले दूरन्देशी लोग ही कूटनीतिज्ञ कहलाते हैं।

एक उदाहरण देखिए। अफगानिस्तान में किसी समय तालिबान की सरकार थी। उद्दंडता और निरंकुशता के मामले में तालिबान की सरकार का तो कोई जवाब हो ही नहीं सकता, लेकिन भारत के साथ तमाम दुश्मनी के बावजूद किसी न किसी स्तर पर तालिबान ने हमसे कूटनीतिक संपर्क बनाए रखे थे। तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह जब आईसी 814 विमान के अपहरण के समय कंधार पहुँचे तो उनकी बातचीत वहाँ के तालिबानी विदेश मंत्री वकील अहमद मुतवाकिल से हुई थी। कूटनीति में हमेशा के लिए दरवाजे बंद करने की गलती नहीं की जाती।

जहाँ तक अजमेर का सवाल है, वहाँ के नागरिकों की स्वतः स्फूर्त नाराजगी अपनी जगह पर सही है। आम लोगों को अपना गुस्सा और अपनी तीव्र प्रतिक्रिया दिखाने का हक है। राजा परवेज अशरफ की यात्रा के विरोध में अजमेर का दरगाह बाजार बंद रहा और ख्वाजा की दरगाह के दीवान ने यात्रा का बायकाट किया। यह लोगों का निजी फैसला है, जो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के मानस पर असर जरूर भी डालेगा। लेकिन सरकार के स्तर पर स्थितियाँ भिन्न हैं। उससे आम लोगों जैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए।

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