रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 14 मार्च 2013
श्रेणीः  सांप्रदायिकता
प्रकाशनः प्रभासाक्षी.कॉम
टैगः  आंध्र प्रदेश

लब्बोलुआबः

आंध्र प्रदेश के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने एक समुदाय के विरुद्ध अपमानजनक और आपत्तिजनक टिप्पणियों का सिलसिला लगाया हुआ है। अगर अकबरुद्दीन और असदुद्दीन जैसे लोग आसानी से छूट जाते हैं तो यह सिलसिला और भी आगे बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, इसकी प्रतिक्रिया और भी ज्यादा विध्वंसक ढंग से सामने आ सकती है।

Summary:

People like Akabaruddin Owaisi are out to harm the social fabric that keeps India together, for their narrow political objectives. If they are allowed to carry out their agenda of spteading hatread against a particular community with impunity, it is bound to encourage other opportunistic and fundamental elements as well. It is important to bring such people to the justice sending a clear message that law exists in this country.
अकबरे आज़म की सरजमीन पर क्यों होते हैं अकबरुद्दीन!

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

अकबर को 'अकबरे आज़म' बेवजह नहीं कहा गया। भारत में दो धर्मों के बीच सद्भाव और सहिष्णुता स्थापित करने की जो दृष्टि सोलहवीं सदी में बादशाह अकबर के पास थी वह अपने समय से बहुत आगे थी। कायदे से चार दशकों के बाद हम अकबर के दौर से बहुत आगे आ चुके होने चाहिए थे। लेकिन विडंबना देखिए कि अकबर के पाँच सौ से भी ज्यादा साल बाद एक और 'अकबर' दूसरे धर्म के खिलाफ जहर फैलाने, उसके देवी-देवताओं का अनादर करने और आम लोगों को हिंसा के लिए उकसाने के लिए गिरफ़्तार हो चुका है।

यह अकबर है आंध्र प्रदेश के धार्मिक-राजनैतिक संगठन मजलिसे इत्तहादुल मुसलमीन का विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी जिसने 24 दिसंबर को आदिलाबाद जिले में हजारों लोगों को संबोधित करते हुए हिंदुओं के विरुद्ध अपमानजनक, हिंसक और सांप्रदायिक मानसिकता से भरी बातें कहीं। इसी किस्म की बातें उसने दूसरे स्थानों पर आठ और 22 दिसंबर को भी कही थीं। भारत में मुसलमानों की 'तकलीफों' का बयान करते हुए अकबरुद्दीन ने ऐलान किया कि अगर पंद्रह मिनट के लिए इस देश की पुलिस को अलग हटा लिया जाए तो भारत के पच्चीस करोड़ मुसलमान सौ करोड़ हिंदुओं को सबक सिखाने में सक्षम हैं।

लीजिए, इस देश के दक्षिण में एक और मोहम्मद अली जिन्ना पैदा होने की कोशिश कर रहा है। या भिंडराँवाले? ये वही लोग हैं जो अपनी ओछी राजनीति के लिए देश के धर्मभीरू लोगों को बहकाने, भड़काने और समाज को बाँटने की कोशिश करते हैं। ये वही लोग हैं जो न इतिहास से सबक लेते हैं और न वर्तमान से। और ये वही लोग हैं जो हमारी व्यवस्था, राजनैतिक अवसरवादिता और समाज की सहिष्णुता का बेज़ा फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। हालाँकि वे भूल जाते हैं कि इस मानसिकता का नतीजा सिर्फ तबाही के रूप में सामने आता है और वह तबाही किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होती। वह सर्वग्राही होती है। वह दूसरों का भी नुकसान पहुँचाती है लेकिन सबसे बड़ा खतरा खुद उसी वर्ग के लिए बन जाती है जिसके साथ तथाकथित अन्याय की बात उठाते हुए ऐसे अवसरवादी लोग अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करते हैं। इस देश में अन्याय बहुतों के साथ हो रहा है।

हिंदुओं में ही बहुत सारे वर्ग खुद को शोषित मानते हैं। अल्पसंख्यकों में भी ऐसी आवाजें उठाई जाती हैं। उनकी कई शिकायतें जायज हो सकती हैं। लेकिन यहाँ आवाज उठाने के लिए लोकतंत्र का मंच मौजूद है। हिसाब-किताब साफ करने के लिए हिंसा कोई विकल्प नहीं है। भिंडराँवाले हों या बाबू बजरंगी, सैयद सलाहुद्दीन हों या फिर अकबरुद्दीन.. ऐसे लोग भूल जाते हैं कि आखिर में एक हिसाब-किताब देश भी करता है। मोहम्मद अली जिन्ना को जीवन के अंतिम दिनों में अपनी गलती का अहसास हो गया था जो पछतावे की मनःस्थिति में विदा हुए। लेकिन लगता है कि उन्हीं की तर्ज पर 'अल्लाहो अकबर' और 'नारा ए तकबीर' की आवाज बुलंद करने वाले अकबरुद्दीन को सद्बुद्धि आने में थोड़ा वक्त लगेगा।

कारण? इकतालीस साल का यह इंसान अब तक मनचाही हरकतें करके साफ बचता रहा है। सन 2011 में उसने कुरनूल में एक लैरी में एक विधायक को 'काफिर' कहकर संबोधित किया था और पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को कातिल, दरिन्दा, बेईमान, धोखेबाज और चोर कहकर अपमानित किया था। उसने कहा था कि अगर स्व. राव का निधन न हुआ होता तो वह उन्हें अपने हाथों से मार डालता। अप्रैल 2013 में इसी शख्स ने भगवान राम और उनकी माँ कौशल्या पर अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं।

पिछली नवंबर में हैदराबाद में आंध्र प्रदेश पुलिस को 'नामर्दों की फौज' करार देते हुए मुख्यमंत्री किरन रेड्डी को चुनौती दी कि वह एक बार पुलिस को हटाकर देखे, तब हम दिखाएँगे कि कौन ताकतवर है। बारह दिसंबर को देवी भाग्यलक्ष्मी की ओर अपमानजनक इशारेबाजी करते हुए उसने वहाँ मौजूद भीड़ से कहा कि इतने जोर से नारे लगाओ कि भाग्य हिल जाए और लक्ष्मी धरती पर आ गिरे। इस पर भीड़ ने अल्लाहो अकबर के नारे लगाए। चौबीस दिसंबर की रैली में उसने हिंदुओं, हिंदू देवी-देवताओं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, नरेंद्र मोदी, अमेरिका, भारत सरकार आदि के खिलाफ जहर उगला। हिंदुओं को कायर और नपुंसक करार देते हुए उसने कहा- तुम्हारे हिंदुस्तान की आबादी एक अरब है और हम मुसलमान 25 करोड़ हैं। मुसलमानों को हिंदुओं को यह दिखाने के लिए महज पंद्रह मिनट की जरूरत है कि कौन ज्यादा ताकतवर है। उसने कहा कि अगर मेरी बात नहीं सुनी गई तो हिंदुस्तान का हश्र बर्बादी में होगा। ऐसी भाषा, ऐसी मानसिकता और ऐसे आचरण की सभ्य समाज में कोई जगह नहीं है। कड़ी कानूनी कार्रवाई करके सख्त सजा नहीं दी गई तो यह मानसिकता और आगे बढ़ेगी।
अकबरुद्दीन अकेला नहीं

मजलिसे इत्तहादुल मुसलमीन का नेतृत्व जब तक सलाहुद्दीन ओवैसी के हाथ में था, वह कमोबेश कानून के दायरे में रहने वाला संगठन था। सलाहुद्दीन ओवैसी भी मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों पर प्रखर विचारो के लिए जाने जाते हैं लेकिन इस किस्म की विध्वंसक बयानबाजी उन्होंने तब भी नहीं की थी जब 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था। बहरहाल, उनके बाद मजलिस की दिशा में स्पष्ट नकारात्मक बदलाव आता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव उसे राजनैतिक लिहाज से थोड़ा सा फायदा भले ही दिला दे, उस समुदाय को अलग-थलग कर देगा जिसके हितों की दुहाई ये नेता दे रहे हैं।

कुछ महीने पहले जब असम में बांग्लादेशियों और स्थानीय आदिवासियों के बीच दंगे हुए थे, तब अकबरुद्दीन के बड़े भाई असदुद्दीन ओवैसी ने भी उसी जैसी आक्रामक सांप्रदायिक मानसिकता का परिचय दिया था, जिसने कहा था कि अगर मुसलमानों के प्रति नजरिया नहीं बदलता तो देश को मुस्लिम युवकों के बीच कट्टरपंथ के तीसरे दौर के लिए तैयार रहना चाहिए। असदुद्दीन ओवैसी ने दंगापीड़ितों के बीच जो भड़काऊ भाषण दिए थे उन्हीं के बाद मुंबई में एक सभा के लिए जमा हुई मुस्लिमों की भीड़ ने जबरदस्त हिंसा की थी। असदुद्दीन के बयानों की जमकर निंदा हुई थी लेकिन कार्रवाई कोई नहीं हुई। लेकिन मजलिसे इत्तहादुल मुसलमीन का यह सांसद जिन लोगों तक अपना संदेश पहुँचाना चाहता था, वह पहुँचा चुका है। प्रतिक्रिया-स्वरूप देश के कई शहरों में हुई पूर्वोत्तरवासियों विरोधी हिंसा हो, मुंबई कांड हो या अकबरुद्दीन जैसे लोगों के भड़काऊ भाषण, सांप्रदायिक संक्रमण की खतरनाक शुरूआत हो चुकी है।

सरकार और कानून स्थापित करने वाली एजेंसियों को अंदाजा होना चाहिए कि अगर अकबरुद्दीन और असदुद्दीन जैसे लोग आसानी से छूट जाते हैं तो यह सिलसिला और भी आगे बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, इसकी प्रतिक्रिया और भी ज्यादा विध्वंसक ढंग से सामने आ सकती है।

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