रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 14 मार्च 2013
श्रेणीः  विदेश संबंध
प्रकाशनः प्रभासाक्षी.कॉम
टैगः  चीन

लब्बोलुआबः

चीन में सन बासठ की लड़ाई का कोई जिक्र नहीं हो रहा। पचास साल पूरे होने के मौके पर चीन में अपनी पीठ थपथपाते हुए कोई बड़े भारी समारोह नहीं हो रहे। इसका क्या रहस्य है? शायद वह 1962 के युद्ध की छाया से आगे बढ़ गया है? या फिर यह सब सुनियोजित है? हमारे लिए इसका क्या संदेश है?

Summary:

Has the time come for India to get over the China syndrome? If the signals coming from China are to be believed, the country is not giving the war of 1962 as much importance as we do. Is there a hidden agenda behind this or the Chinese dragon is trying to send a positive message to us?
भारत को अब चीन-फोबिया से बाहर निकल आना चाहिए

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

सन 62 की शर्मनाक हार की पचासवीं बरसी पर भारत में छिद्रान्वेषण, बहस-मुबाहिसों और आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया है। इस शर्मनाक पराजय से कैसे बचा जा सकता था और भविष्य में टकराव की स्थिति में चीन की तुलना में हमारी ताकत कहाँ ठहरती है, यह गहन विश्लेषण का विषय है और व्यावहारिकता की सीमा में रहते हुए ऐसा करना भी चाहिए। बासठ की पराजय 'ऐतिहासिक अपमान' के रूप में हर भारतीय की दुखती हुई रग बन चुकी है। उन पीढ़ियों की भी, जो सन बासठ के बहुत बाद इस दुनिया में आईं। हमने आज तक उन यादों को विस्मृत नहीं होने दिया। आज भी भारतीयों की नजर में चीन सबसे बड़ा शत्रु है और ईमानदारी से कहा जाए तो अधिकांश भारतीय उस अपमान का हिसाब-किताब साफ करने की आकांक्षा रखते हैं।

यह अकारण नहीं है। चीन ने हमारे गौरवबोध और श्रेष्ठताभाव को निर्णायक चोट पहुँचाई थी। आाम भारतीय नागरिक की दृष्टि में उसने भारत की सदाशयता और मैत्रीभाव को भी चोट पहुँचाई थी और ऐसा विश्वासघात किया था, जिसकी 'हिंदी चीनी भाई-भाई' की रट लगाने वाले भारत को सपने में भी उम्मीद नहीं रही होगी। वह विश्वास ऐसा टूटा कि आज तक वापस बहाल नहीं हो पाया।

दूसरी तरफ चीन से खबर है कि वहाँ बासठ की लड़ाई का कोई जिक्र नहीं हो रहा। पचास साल पूरे होने के मौके पर चीन में अपनी पीठ थपथपाते हुए कोई बड़े भारी समारोह नहीं हो रहे, अपने वीरों की याद में कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जा रहे। शायद चीन भारत के घाव में नमक छिड़कने से बच रहा है। या फिर शायद उसके लिए पचास साल पहले की उस घटना का कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है। यह भी हो सकता है कि चीन हमें अपनी सदाशयता का संदेश देना चाहता हो। या फिर शायद वह 1962 के युद्ध की छाया से आगे बढ़ गया है? कुछ भी संभव है। क्या यह सब सुनियोजित है? पेईचिंग से आने वाली खबरों के मुताबिक ऐसा नहीं लगता क्योंकि सिर्फ सरकारी तौर पर ही नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी के स्तर पर भी और गैर-सरकारी स्तर पर भी वहाँ सन बासठ की लड़ाई पर कोई उल्लेखनीय चर्चा नहीं हो रही। मीडिया में भी यह प्रसंग लगभग अनुपस्थित है, हालाँकि किसी युद्ध में विजय के पचास साल का मौका ऐतिहासिक, सैनिक और राजनैतिक महत्व तो रखता ही है। किसी भी राष्ट्र के लिए, विशेषकर एक बंद समाज के लिए, ऐसी विजय की स्वर्ण जयंती अपनी पीठ ठोंकने का उत्तम अवसर होती है। फिर चीन की चुप्पी का क्या रहस्य है? या फिर यह नए चीन के नजरिए का संकेत देती है?

चीन में बासठ की लड़ाई को एक 'छोटे युद्ध' के रूप में देखा जा रहा है जिसकी परिणति उनकी शर्तों पर हुई। बस। अब तक चीन सरकार की तरफ से सिर्फ एक बयान सामने आया है- चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग ली का, जिन्होंने कहा है कि चीन शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहा है और वह भारत के साथ पूरे दिल के साथ दोस्ताना और सहयोगी संबंध विकसित करना चाहता है। वह पूरे दिल के साथ सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए करना चाहता है। चीन का यह रुख पिछले चार-पाँच साल के उसके नजरिए की तुलना में आश्चर्यजनक लगता है।

विवादों की कमी नहीं

चीनी सैनिकों ने इस दौरान कई बार वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया, चीनी वायु सेना के विमानों ने भारतीय वायु सीमा में उड़ानें भरी, कश्मीर के नागरिकों को स्टेपल किए गए वीजा देकर एक नया विवाद खड़ा किया गया। चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को मंजूरी दिए जाने का जीतोड़ विरोध किया था और हाल ही में उस पर ब्रह्मपुत्र नदी का मार्ग मोड़ने का आरोप लग रहा है जो भारत के उत्तरपूर्वी राज्यों में खेती के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है। पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी सैन्य संबंध, हमारे उत्तरपूर्वी बागियों को उसके परोक्ष समर्थन और भारत को घेरने के लिए हमारे पड़ोसियों से करीबी संबंध बनाने की रणनीति एकदम स्पष्ट है। चीनी सैनिक शक्ति में निरंतर विस्तार और भारत के साथ सीमा के करीब सड़कों, रेल लाइनों और हवाई अड्डों का जाल बिछाने की परियोजनाएँ, तिब्बत में भारत की दिशा में मिसाइलों की तैनाती जैसे तथ्य उसकी किसी आकस्मिक सदाशयता के प्रति आश्वस्त नहीं करते।

तब बासठ की लड़ाई, जो भारत में इतिहास की पुस्तकों का एक अहम अध्याय रही है, को लगभग अनदेखा करने की क्या वजह है? आम भारतीय नागरिक के लिए चीन पिछले कई दशकों में सबसे बड़ा शत्रु रहा है। मीडिया घरानों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों का भी यही परिणाम रहा है। दूसरी तरफ चीन के लिए हो सकता है कि भारत सबसे बड़ा शत्रु न हो, लेकिन शत्रु तो वह है ही। असल में चीन के पास शत्रुओं की कमी नहीं है। रूस के साथ उसका सीमा विवाद हल हो गया है लेकिन बाकी सभी पड़ोसियों के साथ कोई न कोई समस्या कायम है- जापान, मलेशिया, वियतनाम, बर्मा, दक्षिण कोरिया, ताईवान और भारत.. महीने दो महीने में इस तरह के विवाद किसी न किसी पड़ोसी के साथ खड़े होते ही रहते हैं। तब क्या चीन भारत को अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण सैनिक चुनौती के रूप में ले रहा है? या चीन के प्रतिद्वंद्वियों तक पहुँचने की भारत की रणनीति कारगर होने लगी है? या फिर भारत के साथ आर्थिक तथा राजनैतिक संबंध बनाने के पीछे छिपी संभावनाओं को लेकर चीन सकारात्मक हो गया है?

चीनी नागरिकों का नजरिया

सवाल और भी हो सकते हैं, लेकिन इंटरनेट पर आम चीनी नागरिकों की टिप्पणियों पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि वे अपने देश की आर्थिक तरक्की का उपभोग करने में ही व्यस्त हैं। ज्यादातर चीनियों के लिए भारत के साथ संबंधों का अच्छा या बुरा होना विशेष महत्व नहीं रखता। यह एक किस्म का प्रोफेशनल नजरिया है, जो आर्थिक सुधारों की राह पर चल रहे हमारे पड़ोसियों के रुख में दिखाई देता है। संभवतः वे अमेरिका और जापान के साथ प्रतिद्वंद्विता को अधिक महत्व देते हैं। हम भारतीय जहाँ स्वयं को चीन का बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, वहीं चीनी फिलहाल हमें किसी बड़ी आर्थिक चुनौती के रूप में नहीं देख रहे। वे अपना वर्तमान बनाने और भविष्य सुरक्षित करने में ही मशरूफ हैं। लेकिन ऐसे में हमारा रुख क्या होना चाहिए? क्या हमें चीन के प्रति अपने नजरिए में कोई बदलाव करने की जरूरत है या उसे अपना एकमात्र शक्तिशाली शत्रु मानते हुए अपनी मानसिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा उसी की चिंता में खर्च करते रहना चाहिए? बासठ की लड़ाई के प्रति चीन का उपेक्षा भाव यदि कोई संदेश देता है तो वह व्यावहारिकता का संदेश है। संभवतः हमें भी बासठ की दुखद यादों से उबरकर आगे बढ़ना चाहिए। अपनी सैन्य तैयारियों, राजनैतिक तथा कूटनीतिक रणनीतियों और सीमा क्षेत्र के ढाँचागत विकास से कोई भी समझौता किए बिना हमें अधिक सकारात्मक, व्यावहारिक और भविष्योन्मुख बनने की जरूरत है।

जब चीन ऐसा कर सकता है तो हम भी कर सकते हैं। आखिर क्यों चौबीसों घंटे उसी अपमान-बोध और शत्रुभाव को लेकर जीते रहें हम। अमेरिका वियतनाम में मुँह की खाने के बाद उसका मित्र बन सकता है, जर्मनी अपने अस्तित्व के समक्ष पैदा हुए खतरों के बावजूद आज यूरोप का हिस्सा और अमेरिका का मित्र है, रूस और अमेरिका दशकों लंबी प्रतिद्वंद्विता को भूलकर साथ आगे बढ़ रहे हैं तो हम भी चीन के साथ दोस्ती के रास्ते पर आगे क्यों नहीं बढ़ सकते? माना कि उस पर विश्वास करने के लिए आम भारतीय मानस आज भी तैयार नहीं है लेकिन कभी न कभी तो शुरूआत करनी ही होगी। भविष्य में कभी होने वाले उस काल्पनिक युद्ध के इंतजार में, जिसमें हम चीन को उसके विश्वासघात का सबक सिखाएँगे, हम और कितने बहुमूल्य दशक और संसाधन खर्च करेंगे? संभवतः भारत के लिए अपने चीन फोबिया से आगे बढ़ने का समय आ गया है। ठीक उसी तरह, जैसे हम पाकिस्तान से कहते हैं कि वह कश्मीर को एक तरफ रखते हुए बाकी मामलों में हमारे साथ संबंध विकसित करने पर ध्यान दे।

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