रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 14 मार्च 2013
श्रेणीः  अर्थव्यवस्था
प्रकाशनः प्रभासाक्षी.कॉम
टैगः  आर्थिक सुधार

लब्बोलुआबः

रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और आर्थिक व कारोबारी मंत्रालयों से जुड़े दूसरे मंत्री क्या कुछ कर दिखाते हैं, इस पर देश की नजर है।

Summary:

Now that the UPA government has got rid of a ever-disturbing and unpredictable 'associate' and succeeded in getting parliamentary approval to some crucial reforms, it is high time it stepped up the gas as time for economic reforms is running out.
सुधारों की सुध लेने का आखिरी मौका भी न निकल जाए

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के मुद्दे पर लोकसभा में हुई बहस के दौरान जब भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने पूछा था कि कुछ साल पहले एफडीआई का विरोध करने वाली कांग्रेस अब इसके समर्थन में कैसे आ गई? जवाब देते समय केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री आनंद शर्मा के मुँह से निकल गया था कि 'तब हम अपोजीशन में थे।' आज देश में आर्थिक सुधारों के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच हो रही भिड़ंत का यही मर्म है। जो विपक्ष में है उसे विरोध करना है, और जो सत्ता में है उसके कंधों पर कहानी आगे बढ़ाने का जिम्मा। भले ही इसके लिए साम, दाम, दंड, भेद जो कुछ भी करना पड़े।

आपको याद होगा, अभी आठ साल पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन रिटेल में एफडीआई के हक में था और भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में भी इसके लिए बाकायदा वायदा किया था। भाजपा और कांग्रेस की भूमिकाएँ बदलीं तो नजरिए भी बदल गए। बढ़ते हुए भारत के रास्ते में राजनीति सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है, और हाल-फिलहाल हालात में बदलाव की कोई सूरत नजर नहीं आती। कई बार सवाल उठता है कि जब तमाम राजनैतिक और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद भारत विश्वव्यापी मंदी का सामना करने और अपनी आर्थिक वृद्धि दर को सम्मानजनक स्तर पर बनाए रखने में सफल रहा है, तो उन हालात में क्या होता यदि हमारे यहाँ भी आर्थिक सुधारों के मुद्दे पर चीन, रूस या अमेरिका की तरह आम राय होती!

किसी जमाने में जो बात विदेश नीति और सुरक्षा के मामले में कही जाती थी, वह आज अर्थव्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो गई है। और वह है- इस क्षेत्र में देश के राष्ट्रीय हितों को राजनीति के विवादों और मतभेदों से दूर रखा जाए। चाहे यह दल सत्ता में आए या वह, लगभग डेढ़ दशक पहले देश ने जिस आर्थिक दिशा में आगे बढ़ने का सोचा-समझा फैसला किया था, वह जारी रहना चाहिए। क्योंकि यह ऐसा सफर है, जिसमें बीच से लौट जाने का विकल्प उपलब्ध नहीं है। कारण भले ही सत्ताधारियों में राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी हो, नीतिगत पक्षाघात हो या फिर विपक्ष का अवरोधक रवैया, आधा रास्ता तय करने के बाद अगर हम झिझक जाते हैं तो न इधर के रहेंगे और न उधर के। आजादी के बाद पाँच दशक तक जिस मिश्रित अर्थव्यवस्था को हमने संजीदगी से और लगभग सफलता से लागू किया, उससे आगे बढ़कर हम बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के रास्ते पर काफी आगे आ चुके हैं। सुधारों के नतीजे भी दिखने लगे हैं और जैसा कि स्वाभाविक है, अस्थायी दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। लेकिन लक्ष्य तक पहुँचे बिना नफे-नुकसान का सही आकलन संभव नहीं है। गंतव्य पर पहुँचने से पहले ही ड्राइवर से झगड़ा करने, सही और गलत रास्ते की बहस करने तथा उसे बार-बार रोकने से न ड्राइवर का भला होने वाला है और न ही सवारियों का। कम से कम आर्थिक मामले में उसे इत्मीनान से कदम उठाने दीजिए, क्योंकि इससे यदि किसी का नुकसान हो रहा है तो पूरे देश और उसकी महत्वाकांक्षाओं का। सरकार को जापान और चीन से सबक लेते हुए आर्थिक सुधारों का सिलसिला तेज गति से आगे बढ़ाने की जरूरत है तो विपक्ष को रक्षा और विदेश नीतियों की तरह आर्थिक सुधारों के मुद्दे को एक तरफ रख देना चाहिए। राजनीति के लिए मुद्दे और भी हैं।

सबसे बड़ा कसूर खुद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार का है, जिसे सुधारों की रफ्तार तेज करने का ख्याल तब आया है जब अगले लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं और दुनिया भर में भारत के नकारात्मक आर्थिक माहौल की जमकर छीछालेदर हो चुकी है। मुद्रास्फीति का दंश पिछले कई वर्षों से आम आदमी को प्रताड़ित कर रहा है और नीतिगत पक्षाघात की वजह से विभिन्न सेक्टरों में विकास की दर कुंद हो चुकी है। ब्याज दरें आसमान छू रही हैं और जैसा कि रतन टाटा ने संकेत दिया है उद्योगों और कारोबारियों के लिए बाधाएँ बरकरार हैं और सरकारी विभागों के बीच कोई तालमेल नहीं है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने भारत की रेटिंग स्थिर से घटाकर नकारात्मक (बीबीबी) कर दी थी जो आज भी वहीं है। हालात यहाँ तक पहुँचे कि 'टाइम' ने संप्रग-2 के कामकाज का विश्लेषण करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को 'अंडर-एचीवर' करार दिया। भले ही सरकार और कांग्रेस ने टाइम की टिप्पणी को महत्वहीन करार देने की भरपूर कोशिश की, लेकिन वास्तव में उसने वहीं चोट की थी, जहाँ दर्द बहुत अधिक होता है। सन 2009 के चुनावों में जीतकर आने के बाद डॉ. सिंह और उनकी सरकार ने इस बहुमूल्य जनमत का महत्व नहीं समझा। जनता ने सरकार को आर्थिक सुधार जारी रखने का लाइसेंस थमाया था। भीतर और बाहर के हालात भारत की आर्थिक उड़ान के अनुकूल थे। सरकार को चाहिए था कि सब कुछ छोड़कर अहम सुधार लागू करने में जुट जाती, क्योंकि संप्रग-2 का आगमन ऐसे समय पर हुआ था जब भारत में आर्थिक सुधारों की यात्रा अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव में आ चुकी थी। यह कार्यकाल हमारे विकास या विनाश के लिए निर्णायक सिद्ध हो सकता था। लेकिन सरकार खुद ही ढीली पड़ गई। उसने वह 'अनिवार्यता' नहीं दिखाई जिसकी उससे अपेक्षा थी। आगे चलकर राजनीति ने अपना रंग दिखाया और तमाम किस्म की बाधाएँ सामने आ खड़ी हुईं।

अब भी वक्त है

बहरहाल, देर आयद, दुरुस्त आयद। सरकारी ढिलाई और विपक्षी प्रतिरोधों के नकारात्मक माहौल के बाद अब जब अगले चुनावों में दो साल से कम समय रह गया है तब सरकार को फिर से सुधारों की सुध आई है। रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री पी चिदंबरम और आर्थिक व कारोबारी मंत्रालयों से जुड़े दूसरे मंत्री कुछ कर दिखाने के मूड में दिख रहे हैं। भगवान न करे, यह जोश फिर किसी बाधा का शिकार होकर ठंडा पड़ जाए। क्योंकि सुधारों के आधे रास्ते पर इंतजार में खड़ा यह देश आगे बढ़ने के सिग्नल की प्रतीक्षा में है। जब हमने पश्चिमी दुनिया का रास्ता अपनाने का फैसला किया है तो अपने यहाँ के हालात से तालमेल बिठाते हुए, अपनी सीमाओं को समझते हुए ही सही, लेकिन वह सब करना ही होगा जो विकसित देशों ने किया था। इस लिहाज से प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनाई गई निवेश पर मंत्रिमंडलीय समिति एक सकारात्मक कदम है। इससे दुनिया को यह संदेश जाएगा कि भारत निवेश को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है। और यह भी कि इसके लिए जरूरी प्रक्रियाएँ अब आसान होंगी। चूँकि प्रधानमंत्री खुद समिति के अध्यक्ष हैं इसलिए इस या उस मंत्रालय के पास निवेश के महत्वपूर्ण प्रस्तावों को किसी न किसी कारण से लटका देने का बहाना मौजूद नहीं होगा। लेकिन बात यहीं नहीं रुक जानी चाहिए।

डॉ. मनमोहन सिंह ने यह बयान देकर अपनी ढीली-ढाली छवि से छुटकारा पाने का प्रयास किया है कि एफडीआई के मुद्दे पर सरकार पीछे नहीं हटेगी और अगर इसकी वजह से सरकार गिर भी जाए तो वे संघर्ष करते हुए हट जाना पसंद करेंगे। उनका यह संदेश भारत के विपक्षी दलों के लिए ही नहीं बल्कि वैश्विक ऑडियंस के लिए भी था। यह उनकी 'अंडर-एचीवर' की छवि की मरम्मत करने की कोशिश थी। लेकिन आज हमारी अर्थव्यवस्था को वास्तव में एक 'बलिदानी भावना' की जरूरत है। एक अर्थशास्त्री के नेतृत्व में चल रही मौजूदा सरकार को हर राजनैतिक जोखिम मोल लेते हुए भी अगले डेढ़-दो साल में आर्थिक सुधारों के लिए जरूरी वे सभी बड़े फैसले कर लेने चाहिए जो मौजूदा परिस्थितियों में अनिवार्य हैं। संप्रग की सरकार लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी है। यदि अगले चुनाव में सरकार बदलती है तो हो सकता है कि नया गठबंधन (जो कि मौजूदा सरकार की आर्थिक नीतियों और प्रदर्शन का विरोध करते हुए ही सत्ता में आ सकता है) तुरत-फुरत अलोकप्रिय आर्थिक फैसले करने की स्थिति में न हो। अगर डॉ. मनमोहन सिंह को देश की चिंता है और वे सचमुच आर्थिक तरक्की के रास्ते पर अपनी सरकार कुर्बान करने को तैयार हैं तो अपने बयानों को हकीकत में बदलने के लिए जुट जाना चाहिए।

आधे रास्ते में खड़ी अर्थव्यवस्था

रिटेल में एफडीआई पहला और निवेश पर मंत्रिमंडलीय समिति दूसरा अहम कदम माना जा सकता है। अब भूमि अधिग्रहण, बैंकिंग सुधार, कंपनी, पेंशन सुधार, बीमा, शिक्षा पंचाट, अनफेयर प्रेक्टिसेज निवारण जैसे तमाम जैसे लटके पड़े तमाम विधेयकों को संसद की मंजूरी दिलवाने में जुटने की जरूरत है। विपक्षी दलों से टकराव का रास्ता अपनाने पर राह मुश्किल होती चली जाएगी। बेहतर हो कि सरकार विपक्ष की आशंकाओं का निवारण करते हुए उसका सहयोग लेने का प्रयास करे। इस सिलसिले में वित्त मंत्री पी चिदंबरम की वरिष्ठ भाजपा नेताओं से हुई हालिया मुलाकात एक सकारात्मक घटना है। इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि श्री चिदंबरम के वित्त मंत्री बनने के बाद सुधारों की प्रक्रिया में फिर से जान पड़ी है। विपक्ष को भी अहसास होना चाहिए कि जहाँ विश्व में प्रधानमंत्री की छवि अंडर-एचीवर की बन रही है, वहीं खुद उसकी छवि सुधार-विरोधी और नीति-अवरोधक की बन रही है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के संयोजक शरद यादव के इस बयान ने कि राजग सत्ता में आया तो रिटेल में एफडीआई की अनुमति वापस ले लेगा, विश्व स्तर पर अच्छा संकेत नहीं भेजा है। जब विदेशी कंपनियाँ भारत में अपनी दीर्घकालीन मौजूदगी के बारे में ही आश्वस्त नहीं होंगी तो अरबों-खरबों का निवेश करके यहाँ कदम रखने की कैसे सोचेंगी? रतन टाटा ने जब देश में 'नीतिगत रुकावट' की बात कही तो विपक्षी दलों ने सरकार की आलोचना के लिए उनके बयान का इस्तेमाल किया। लेकिन उन्हें इस बात का भी अहसास होना चाहिए कि इस नीतिगत रुकावट में खुद उनका योगदान कम नहीं है।

सारे फैसले सिर्फ संसदीय प्रक्रियाओं की वजह से ही लटके पड़े हों, ऐसा नहीं है। रिजर्व बैंक, योजना आयोग और वित्त मंत्रालय के स्तर पर भी कई जरूरी नीतिगत फैसले होने बाकी हैं। राजस्व घाटा बढ़ने की आशंका निरंतर खबरों में बनी हुई है। रिजर्व बैंक का बेहद सतर्कतापूर्ण रुख ब्याज दरों को उद्योगों और आम लोगों की पहुँच से दूर बनाए हुए है, जिसका नतीजा निवेश में कमी और कारोबारी गतिविधियों में मंदी के रूप में सामने आया है। वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के कदमों के बीच तालमेल दिखना चाहिए। अगर मंत्रालय निवेश बढ़ाने की जरूरत महसूस करता है तो रिजर्व बैंक को मौद्रिक नीतियों में जरूरी समायोजन क्यों नहीं करने चाहिए, खास तौर पर अब, जबकि नकारात्मक आर्थिक माहौल के बीच कुछ अच्छी खबरें भी दिखाई देने लगी हैं? मिसाल के तौर पर वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने कहा है कि सरकार के उठाए आर्थिक कदम ‘कारगर सिद्ध हो रहे है।‘ राजस्व और बाहरी घाटे के स्तर पर दीर्घकालीन जोखिम घटे हैं और कारोबारी माहौल सकारात्मक हुआ है। एजेंसी के मुताबिक, सन 2013 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा वर्ष सिद्ध होना चाहिए। उधर औद्योगिक विकास के ताजा तिमाही आंकड़ों में आठ फीसदी की आशातीत छलांग ने उद्योग जगत और अर्थशास्त्रियों को हैरत में डाला है और नए मासिक आँकड़ों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर में पिछली तिमाही की तुलना में कमी आई है। शेयर बाजार की सेहत ठीकठाक है और रुपया भी मजबूत होने लगा है।

हालात इन दिनों
पिछले आलेखः
फ़ेसबुक पर लाइक करें