रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 14 मार्च 2013
श्रेणीः  अध्यात्म
प्रकाशनः राष्ट्रीय सहारा
टैगः  विवेकानंद

लब्बोलुआबः

विवेकानंद अकेले आध्यात्मिक महापुरुष हैं जो यह मानने पर मजबूर करते हैं कि परंपरा और आधुनिकता के बीच तालमेल संभव है। धर्म-संस्कार और तरक्की के बीच वैसा विरोधाभास नहीं है, जैसा बहुत से लोग मानते हैं। "अच्छे बनो और अच्छा करो, यही धर्म है।"

Summary:

Swami Vivekananda is also special because his preachings are not in complete negation of everything modern. He teaches us how to strike a balance between the new and the traditional.
लीडरशिप, मैनेजमेंट, इनोवेशनः चौंकाती है स्वामी विवेकानंद की सोच

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

"उठो! जागो! और तब तक मत रुको जब तक कि लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।"

स्वामी विवेकानंद का सर्वाधिक प्रसिद्ध उद्धरण है यह। जितनी बार भी पढ़ें, दस-बारह शब्दों का यह छोटा सा वाक्य हर बार आपको जोश और ऊर्जा से भर देता है और इसीलिए युवाओं के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय उद्धरणों में शामिल है यह। वैसे ही, जैसे गांधीजी का 'स्वयं ही वह परिवर्तन बनो जो तुम देखना चाहते हो' है। विवेकानंद भारत की धार्मिक परंपरा के उन चुनिंदा महापुरुषों में से एक हैं, जो समाज के लिए श्रद्धा के पात्र होने के साथ-साथ युवाओं के लिए 'रोल मॉडल' बन गए। धर्म और परंपरा के बारे में गहरी अंतरदृष्टि रखने वाले स्वामीजी किस तरह अपने समय, परिवेश और पृष्ठभूमि से बहुत दूर, बहुत आगे तक सोच सके वह कौतूहल का विषय तो है ही, उनकी बेमिसाल मेधा और दूरदृष्टि को भी जाहिर करता है।

विवेकानंद अकेले आध्यात्मिक महापुरुष हैं जो यह मानने पर मजबूर करते हैं कि परंपरा और आधुनिकता के बीच तालमेल संभव है। धर्म-संस्कार और तरक्की के बीच वैसा विरोधाभास नहीं है, जैसा बहुत से लोग मानते हैं। संभव है यह धारणा रखने वालों ने धर्म के मर्म को न समझा हो। "अच्छे बनो और अच्छा करो, यही धर्म है।"

डेढ़ सौ साल पहले कोलकाता में नरेंद्र नाथ दत्त के रूप में जन्म लेने वाले स्वामी विवेकानंद की सोच, उनका दर्शन और धार्मिक व्याख्याएँ चौंकाने की हद तक आधुनिक और स्पष्ट हैं। इक्कीसवीं सदी के भौतिकतावादी, अर्थ-प्रधान, पेशेवराना माहौल में उनको पढ़ना उस तरह असहज नहीं लगता जैसे सौ-दो साल पुराने दौर के दूसरे धार्मिक व्यक्तित्वों का अध्ययन लगता है। पृष्ठभूमि धार्मिक होते हुए भी उनकी सोच प्रगतिशील और भविष्य की ओर देखने वाली है। प्रासंगिक तो वे हैं ही, सूचना प्रौद्योगिकी से लेकर राजनीति और कारोबार से लेकर विज्ञान के क्षेत्र में सक्रिय युवा को भी वे पंक्तियाँ बहुत कुछ सिखाएंगी जिन्हें स्वामी जी ने सौ या सवा सौ साल पहले लिखा था। स्वामी विवेकानंद के धार्मिक और सामाजिक पक्ष पर बहुत लिखा गया है। लेकिन अपने व्याख्यानों, धार्मिक चर्चाओं और लेखन के दौरान जिस तरह वे नेतृत्व क्षमता, नवाचार (इनोवेशन), प्रबंधन, सफलता और वैज्ञानिक सोच के पाठ पढ़ा गए, उन्हें जानना जरूरी है। स्वामी जी की कई शिक्षाएँ बड़े बिजनेस स्कूलों में पढ़ाने वाले आधुनिक मैनेजमेंट गुरुओं की याद दिला देती हैं। किसी आध्यात्मिक, दार्शनिक व्यक्तित्व में इस तरह का पहलू अद्भुत ही नहीं, दुर्लभ भी है। अन्यथा कौनसा धार्मिक नेता कहता है कि "जब अंधविश्वास प्रवेश करता है तो बुद्धि विदा हो जाती है।"

युवाओं की राजनीति करने वाले राहुल गांधी, अखिलेश यादव और दूसरे नेताओं को भारत की जमीनी हकीकतों को जानने के लिए विवेकानंद की जीवन दृष्टि को समझना चाहिए। जून 1894 में मैसूर के महाराजा को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था कि "भारत में बुराइयों की जड़ गरीबों की हालत में निहित है। हमारे निम्न वर्गों को ऊपर उठाने के लिए सबसे ज़रूरी है उन्हें शिक्षित करना और उनकी खोई हुई निजता को बहाल करना। धार्मिक-राजनैतिक ताकतों और विदेशी राजसत्ता ने सदियों से उनका इतना दमन किया है कि भारत के गरीब भूल गए हैं कि वे भी इंसान हैं।" जार्ज बर्नार्ड शॉ ने भी तो निर्धनता को "सबसे बड़ी बुराई और सबसे बड़ा अपराध" करार दिया था। अब जरा देखिए, अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अमर्त्य सेन क्या कहते हैं- "इसे अनुभव करना मुश्किल नहीं है कि असमानता का अन्याय असहिष्णुता को जन्म दे सकता है और गरीबी का कष्ट क्रोध तथा हिंसा को।" सेन शिक्षा के बारे में भी स्वामीजी के विचार से परोक्ष सहमति जताते हैं- "भारतीय अर्थव्यवस्था छह-सात, यहाँ तक कि 8-9 फीसदी की सालाना दर से भी विकसित हो सकती है। लेकिन उदारीकरण का लाभ तब तक आम लोगों से दूर ही रहेगा जब तक कि उन्हें बुनियादी शिक्षा मुहैया नहीं कराई जाती। आधारभूत स्तर पर मजबूत शिक्षा तंत्र के बिना भारत के लिए उदारीकरण की रफ्तार के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल होगा।" दोनों बयानों की तारीखों में सौ साल से भी अधिक का अंतर है। दोनों के संदर्भ अलग-अलग हैं, लेकिन संदेश एक।

नेतृत्व क्या है? उसकी सार्थकता क्या है यदि वह आम आदमी के जीवन को बेहतर न बना सके? स्वामी जी का हर शब्द समाज में दिखती विषम परिस्थितियों का प्रतिकार करता प्रतीत होता है- "जब तक करोड़ों लोग गरीबी और असहाय स्थिति में हैं, मैं ऐसे हर शख्स को गद्दार मानकर चलता हूँ जिसने उनकी कीमत पर शिक्षा पाई लेकिन उनकी न्यूनतम सुध भी नहीं ली।" इतने प्रबल विचारों वाला व्यक्ति संन्यासी न होता तो क्या होता? शायद एक महान क्रांतिकारी, अद्भुत नेता, विलक्षण स्टेट्समैन! नए दौर के नेता उनसे नेतृत्व का ककहरा सीख सकते हैं।

अपने समय की वास्तविकताओं की समझ रखे बिना कोई नेतृत्व सार्थकता प्राप्त नहीं कर सकता। भारत की आधी आबादी युवाओं की है और इतनी बड़ी शक्ति की बदौलत किसी भी देश का कायाकल्प संभव है। लेकिन तभी जब इन युवाओं के सामने स्पष्ट उद्देश्य तथा दिशा मौजूद हो और उन्हें अपने दायित्वों का अहसास हो। स्वामी जी युवकों के आदर्श इसलिए बने क्योंकि उन्होंने उन्हें यही उद्देश्यपरकता प्रदान की। व्यक्ति, राष्ट्र, विश्व और धर्म के संदर्भ में उनकी प्राथमिकताएँ इतनी स्पष्ट थीं कि लगता है वे कोई समाजशास्त्री हों। स्वामी जी ने कहा- "व्यावहारिक देशभक्ति सिर्फ एक भावना या मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है अपने साथी देशवासियों की सेवा करने का जज्बा।" किंतु वे मन से एक विश्व मानव थे, जिनकी आकांक्षा पूरे विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की थी। यह स्वामी जी की यात्राओं से भी स्पष्ट है जो हिंदुत्व के प्रति समझबूझ का प्रसार करने के लिए तो थी हीं, वैश्विकता के अन्वेषक के रूप में भी थीं। देशभक्ति और वैश्विकता के बीच भी उनके विचारों में कहीं कोई भ्रम नहीं दिखता- "आवश्यकता पड़े तो उस एक भावना के लिए हर चीज का बलिदान कर देना चाहिए, जिसे वैश्विकता कहते हैं।" राष्ट्र और विश्व के संदर्भ में उनके अलग-अलग, किंतु बहुत स्पष्ट विचार थे।

सूचना प्रौद्योगिकी की प्रधानता के युग में भौगोलिक सीमाएँ धूमिल होती चली जा रही हैं। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में एक-दूसरे की आवश्यकताओं को समझना, सहयोग करना और लाभ उठाना अलिखित सिद्धांत के समान है। भारत ने इस प्रक्रिया में देर से प्रवेश किया लेकिन स्वामी विवेकानंद तो प्रकृति से ही अन्वेषक थे और दूसरों के प्रति खुले विचार रखते थे। आईटी, सेवा उद्योग, आयात-निर्यात और पर्यटन जैसे क्षेत्रों के ध्यान में रखिए तो उनका यह कथन कितना प्रासंगिक लगता है- "हमें यात्रा अवश्य करनी चाहिए, हमें विदेशी भूमियों पर जाना चाहिए। हमें देखना चाहिए कि दूसरे देशों में सामाजिक तौरतरीके और परिपाटियाँ क्या हैं। दूसरे देश किस दिशा में सोच रहे हैं, यह जानने के लिए हमें उनके साथ मुक्त और खुले संवाद से झिझकना नहीं चाहिए।" आपको याद होगा कि जब गांधीजी विदेश जा रहे थे तो परिवार में इसका विरोध हुआ था। जयपुर के महाराजा तो जब लंदन गए तब गंगा जल से भरे चांदी के दो विशाल कलश साथ लेकर गए थे ताकि विदेशी पानी पीकर भ्रष्ट न हों। लेकिन अपने समय की सोच से कितने आगे थे स्वामी विवेकानंद!

नए दौर के युवकों को शायद विश्वास न हो कि विज्ञान से कोई सीधा संबंध न रखने वाला यह साधु युवकों से कहा करता था कि- "कोई विचार (आइडिया) लो और फिर उसी को अपने जीवन का मकसद बना लो। उसी का सपना देखो, उसी को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नाड़ियों और शरीर के हर भाग को उस विचार से भर लो। दूसरे सभी विचारों को अलग छोड़ दो। सफलता का यही रास्ता है और इसी रास्ते ने महान आध्यात्मिक विभूतियों को जन्म दिया है। बाकी सब तो बात करती हुई मशीनें मात्र हैं।" कितने शक्तिशाली और अद्भुत विचार हैं! क्या ऐसे विचारों की प्रासंगिकता कभी भी समाप्त हो सकती है? हर सफल इंसान, हर कामयाब हस्ती इसकी सार्थकता की निशानदेही करेगी। मानव मस्तिष्क अपरिमित शक्तियों से भरा है और उससे उद्भूत एक अनूठा विचार, एक नई अवधारणा कालविभाजक परिवर्तनों का माध्यम बन सकती है। आखिरकार गांधी जी का 'भारत छोड़ो' एक विचार ही तो था और 'स्वदेशी' भी। 'चांद पर मानव' को भेजने का जॉन एफ कैनेडी का सपना हो या फिर मिस्र की जनक्रांति, सब एक विचार से ही शुरू होते हैं। एक अन्ना हजारे न जाने कहाँ से 'जन लोकपाल' के शक्तिशाली विचार को लेकर आते हैं और छा जाते हैं।

आध्यात्मिक व्यक्तित्वों के संदर्भ में विचार की जिस शक्ति की ओर स्वामी विवेकानंद इशारा करते हैं वह विज्ञान, कारोबार, मनोरंजन, रचनाकर्म और राजनीति जैसे क्षेत्रों का भी कायाकल्प करने में सक्षम है। लेकिन तभी, जब उसके प्रति एकमेव समर्पण मौजूद हो। नैपोलियन ने कहा था- विजयश्री उसी को मिलती है जो डटा रहता है। स्वामी जी तो कहते ही हैं कि "महान उपलब्धियों का मार्ग सदा ही काँटों से भरा होता है।" लेकिन इन कष्टों से जूझना सार्थक है क्योंकि दुनिया में सफल ही अपनी छाप छोड़ पाते हैं और यही लोग याद रखे जाते हैं। स्वामी जी ने एक स्थान पर लिखा है कि "विश्व का उपभोग नायक ही करते हैं- यह एक अडिग सत्य है। एक नायक बनो और हमेशा कहो- मुझे कोई डर नहीं है।" कड़ी मेहनत और संकल्प से ही सफलता प्राप्त होती है। तो क्या यदि सफलता की राह में आप बार-बार नाकाम हो जाएँ। "अपने लक्ष्य को एक हजार बार सामने रखकर चलो। अगर तुम एक हजार बार परास्त हो जाते हो तो एक बार फिर प्रयास करो।" एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व होकर भी वे समाज से कटे हुए नहीं थे। उसके प्रति अपने दायित्वों से विमुख नहीं थे। उसकी विसंगतियाँ, पिछड़ापन और चारों तरफ फैले दुःख-दर्द उन्हें व्यथित करते थे लेकिन यह व्यथा हताशा नहीं थी। देश के समाज-राजनैतिक हालात में बदलाव ज़रूरी है, यह वे जानते थे और इसके लिए युवाओं में आवश्यक संकल्प भरने के लिए उन्होंने अपने प्रबल विचारों का प्रयोग किया। चाहे आप देश के लिए कुछ करना चाहते हों, अपने संगठन के लिए या फिर खुद ही तरक्की के फॉरमूले की तलाश में हों, स्वामी विवेकानंद के शब्द आपका मार्गदर्शन अवश्य करेंगे।

विवेकानंद युवाओं को अपील करते हैं क्योंकि वे धर्म का पुरातनपंथी चेहरा सामने नहीं रखते बल्कि उसमें एक प्रगतिशील उद्वेलन पैदा करने वाली शक्ति के रूप में सामने आते हैं। प्रबंधन से जुड़े अहम सिद्धांत वे बातों ही बातों में सिखा जाते हैं, जैसे- "अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक है।" या "विश्व का इतिहास उन चंद लोगों का इतिहास है, जिन्हें अपने आप में विश्वास था।"

धर्म को उन्होंने संस्कारों से जोड़कर देखा और उसके बारे में फैले भ्रमों को दूर करने में अपने जीवन का बड़ा भाग लगा दिया। वे नहीं चाहते थे कि आँख मूंदकर कोई भी बात स्वीकार कर ली जाए, भले ही वह धार्मिक ग्रंथों में ही क्यों न लिखी हो। उन्होंने आध्यात्मिक अवधारणाओं की व्याख्याएँ उन प्रबल, सरल किंतु तर्कपूर्ण शब्दों में की जो वैज्ञानिक दृष्टि से सोचने वालों को समझ में आते थे। वे एक वैज्ञानिक की तरह तर्क-वितर्क, शोध, मनन और विश्लेषण के बाद तथ्यों को स्वीकार करने वाले थे और यह नियम दूसरों पर भी लागू करते थे- "चाहो तो नास्तिक बन जाओ, किंतु किसी भी बात को आँख मूंदकर पत्थर की लकीर मत मान लो।" स्वामी जी का हिंदुत्व उदार और समावेशी था किंतु उसमें अस्पष्टता की गुंजाइश नहीं थी। उनकी वैचारिक शक्ति, मूल्यों की सार्थकता में अडिग आस्था, आत्मविश्वास और गहन अंतरदृष्टि उनकी आध्यात्मिक विदेश यात्राओं की सफलता के पीछे थी। शिकागो में उनकी तर्कशक्ति ने विश्व को अचंभे में डाल दिया था तो इसलिए कि हिंदुत्व के प्रति उनकी विषद दृष्टि दूसरे धर्मों तथा संस्कृतियों के प्रति सम्मान पर आधारित थी, अपनी ही आस्था को सर्वश्रेष्ठ मानने के मिथ्या अहंकार से नहीं। वे तो धार्मिक स्तर पर भी संस्कृतियों के तालमेल के पक्षधर थे। ऐसे धर्म-प्रचारक को अनदेखा करना कैसे संभव हो सकता था?

स्वामी जी अमेरिका गए तो दिल जीत कर लौटे। “मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो..” से शुरू किया गया उनका व्याख्यान तो अमर है। वे विदेशों के लिए भी उतने ही प्रासंगिक थे, जितने कि भारत के लिए। और वे सदियों बाद भी उतने ही प्रासंगिक रहेंगे, जितने कि आज हैं, या कल थे।

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