रचनाः बालेन्दु शर्मा दाधीच
तिथिः 14 फरवरी 2013
श्रेणीः  विदेश संबंध
प्रकाशनः दैनिक जागरण
टैगः  पाकिस्तान

लब्बोलुआबः

पाकिस्तानी अधिकारियों ने एलओसी पर हुई शर्मनाक घटनाओं में पाक सेना का हाथ होने से साफ इंकार किया है और इनकी जाँच कश्मीर में दोनों तरफ सक्रिय संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक समूह से कराने की पेशकश की है। इसमें किसका हित सधता है?

Summary:

After the shameful acts of Pakistani army are exposed on the LOC, India's arch rival has again offered to involve United Nations in a mutual issue as internationalisation is at the core of its strategy on Kashmir.
कश्मीर की बात चली तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र याद आया

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

वास्तविक नियंत्रण रेखा पर इस और उस पार से होने वाली फायरिंग कोई नई बात नहीं है। शायद ही कोई महीना जाता हो जब भारत और पाकिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा या एलओसी पर कहीं न कहीं फायरिंग न हुई हो। ऐसी घटनाओं में यदा-कदा दोनों पक्षों को जानी नुकसान भी होता रहा है। ऐसी खबरें प्रायः अखबारों में पहले पन्ने पर ही सही लेकिन छोटे शीर्षकों के साथ प्रकाशित होती रही हैं। लेकिन इस बार बात अलग है। न सिर्फ इसलिए कि पाकिस्तानी आक्रांता दो भारतीय जवानों को शहीद करने के बाद उनमें से एक का सिर कलम कर साथ ले गए बल्कि संयुक्त राष्ट्र से लेकर पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर जम्मू-कश्मीर तक घटित हुए कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के कारण भी। यह टकराव सिद्ध करता है कि 'अमन की आशा', 'आपसी विश्वास बहाली' या 'शांति प्रक्रिया' जैसी बातें कितनी भंगुर हैं। दोनों देशों की सरकारें भले ही महीनों या बरसों तक अमन और आपसी विश्वास बहाल करने की कोशिशें करती रहें, पाकिस्तानी फौज और आतंकवादी तत्व चाहें तो चुटकियों में उनकी कोशिशों पर पानी फेर सकते हैं। दुर्भाग्य से, दोनों के हित इसी बात में निर्भर करते हैं कि दोनों देश स्थायी रूप से एक दूसरे के खिलाफ डटे रहें।

लांसनायक हेमराज की बर्बर हत्या पर भारत में जबरदस्त गमो-गुस्से का माहौल है और आज नहीं तो कल राजपूताना राइफल्स या सेना की कोई और टुकड़ी अपनी शर्तों पर, अपनी चुनी हुई जगह और हालात में इसका बदला जरूर ले लेगी। लेकिन इस मामले की संवेदनशीलता और व्यापक प्रभावों के मद्देनजर नेताओं तथा मीडिया को अपनी प्रतिक्रिया में परिपक्वता से काम लेने की जरूरत है। कई विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि सरकार को पाकिस्तानी फौजियों के खिलाफ सभी सबूत इकट्ठे कर इस मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहिए। गनीमत है कि सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया जो अपने पांवों पर खुद कुल्हाड़ी मारने के समान होता। एलओसी पर टकराव के अंतरराष्ट्रीयकरण से अगर किसी का हित सधता है तो सिर्फ पाकिस्तान का, जो खुद भी कश्मीर और वास्तविक नियंत्रण रेखा के हालात को अंतरराष्ट्रीय मुद्दे में बदलने के लिए पारंपरिक तौर पर बेताब है। हालाँकि विश्व राजनीति में भारत की मौजूदा स्थिति और बड़ी वैश्विक ताकतों के रुख को देखते हुए इस विवाद के अंतरराष्ट्रीयकरण का कोई खास नुकसान नहीं होने वाला लेकिन सवाल उठता है कि भारत ऐसा क्यों होने दे? कश्मीर के हालात जब बेहतर हो चुके हैं और देश के भीतर-बाहर ज्यादातर लोगों को अहसास हो चुका है कि कश्मीर में सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण लगभग असंभव है तब क्यों हम अपनी सारी ऊर्जा और आने वाले कई साल इस मुद्दे के हवाले कर दें। पाकिस्तान की बात और है, जहाँ घरेलू राजनीति में सेना का दबदबा ही अफगानिस्तान और कश्मीर जैसे संकटों के जारी रहने पर निर्भर करता है।

पाकिस्तान ने कुछ दिन पहले भी आरोप लगाया था कि एलओसी पर भारत की तथाकथित फायरिंग में उसके एक सैनिक की मौत हुई है। फिर दो भारतीय जवानों की शहादत के दो दिन बाद उसने एक और सैनिक के मारे जाने का आरोप लगाते हुए न सिर्फ भारतीय उच्चायुक्त शरत सभरवाल को विदेश मंत्रालय तलब किया बल्कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वाहनों की आवाजाही भी रोक दी। इतना ही नहीं, पाकिस्तानी अधिकारियों ने कुछ पश्चिमी देशों के राजनयिकों को इस मुद्दे पर ब्रीफ किया है और आग्रह किया है कि वे एलओसी पर तनाव घटाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करें। उसने सीमा पर हिंसा की जाँच कश्मीर में दोनों तरफ सक्रिय संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक समूह से कराने की पेशकश भी की है। इसे कहते हैं, उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे। बहरहाल, इस घटना के आगे-पीछे देखेंगे तो महसूस होगा कि पाकिस्तान की राजनयिक मुहिम के अर्थ उससे कहीं अधिक गहरे हैं, जितने कि दिखते हैं।
संयुक्त राष्ट्र-संयुक्त राष्ट्र

भारत के साथ टकराव के दौर में पाकिस्तान के लिए दो चीजें कभी नहीं बदलतीं। पहला है चीन की शरण में जाना और दूसरा संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता की मांग करना। यह रुख उसके राजनैतिक और कूटनीतिक असुरक्षा बोध को प्रकट करता है, जो पाँच छोटे-बड़े युद्धों, भारत के विरुद्ध आतंकवाद का सहारा लेने की सरकारी नीति और आपसी विवादों को बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की पृष्ठभूमि के बावजूद बरकरार है। विश्व कूटनीति पर नजर रखने वालों के लिए यह एक दिलचस्प समय है, क्योंकि इस समय पाकिस्तान रोटेशन के आधार पर एक महीने के लिए सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष है। यह कोई संयोग नहीं होगा कि पिछली एक जनवरी को उसने यह पद संभाला और अगले कुछ ही दिनों में कश्मीर में टकराव के हालात बन गए। अध्यक्ष होने के नाते सुरक्षा परिषद का एजेंडा तैयार करने में पाकिस्तान की स्वाभाविक भूमिका है। वह इस अनुकूल स्थिति का प्रयोग अपने कूटनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए करना चाहेगा। खासकर तब जब वहाँ कश्मीर से जुड़े मामलों में फौज की बात ज़्यादा वज़न रखती है। सीमा पर टकराव बढ़ना पाकिस्तान को मौका देगा कि वह किसी न किसी बहाने से सुरक्षा परिषद की चर्चाओं में कश्मीर का मुद्दा शामिल करवा सके। हालाँकि अतीत में उसे जब भी ऐसी कोशिशों में कामयाबी मिली, अंतिम नतीजा सिफर ही रहा।

न जाने क्यों पाकिस्तानी सरकारों को लगता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र, इस्लामी सम्मेलन संगठन, अमेरिका, ब्रिटेन या कोई और बाहरी ताकत भारत पर दबाव डालकर उसे कश्मीर मसले पर अपना रुख बदलने के लिए मजबूर कर सकती है। लेकिन जो भारत वैश्विक प्रतिबंधों और निंदा की स्पष्ट आशंका के बावजूद राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में परमाणु परीक्षण कर सकता है और संयुक्त राष्ट्र के अप्रासंगिक हो चुके प्रस्तावों पर अमल से इंकार कर सकता है, वह ऐसे किसी भी दबाव में कैसे आ जाएगा? ऐसी कोशिशें उसके लिए थोड़ी बहुत असुविधा अवश्य पैदा कर सकती हैं लेकिन वह आर्थिक-राजनैतिक और सैनिक दृष्टि से जितना मजबूत होता चला जाएगा, ऐसे दबाव अर्थहीन होते चले जाएँगे। चीन का उदाहरण आपके सामने है। दुनिया की बड़ी शक्तियों- अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस ने कब अपने मामलों में संयुक्त राष्ट्र या दूसरी विदेशी शक्तियों को दखल करने का मौका दिया है? बदलते हुए वैश्विक राजनैतिक परिदृश्य में भारत की स्थिति इराक या अफगानिस्तान जैसी तो है नहीं! हाँ, भारत एक लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में संयुक्त राष्ट्र के प्रति सम्मान का भाव रखता है और उसके कार्यों में सक्रिय भागीदारी भी करता है, लेकिन अपने आंतरिक मामलों में दखल का दूसरा मौका वह कभी नहीं दे सकता। भारत का कोई भी सत्ताधारी राजनैतिक गठबंधन यह जोखिम कहाँ मोल ले सकता है?
फौज, हुर्रियत और सईद

सीमा पर ताजा टकराव कुछ और कारणों से भी चिंता पैदा करता है। भारत के दुश्मन नंबर एक, लश्करे तैयबा के आतंकवादी सरगना हाफिज मोहम्मद सईद ने खुलेआम कहा है कि आने वाले दिनों में कश्मीर में आतंकवादी हिंसा और बढ़ेगी। वास्तव में पिछले कुछ महीनों से सीमा पार बैठे आतंकवादी नेता हताशा की स्थिति में हैं। उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के बाद से जम्मू-कश्मीर के जमीनी हालात में काफी बदलाव आया है। आतंकवाद की समस्या लगभग नियंत्रण में है और कारोबारी गतिविधियों तथा विकास के कामों ने रफ्तार पकड़ी है। आम लोग भी बार-बार आतंकवादियों और कट्टरपंथियों का साथ देते-देते आजिज आ चुके हैं क्योंकि ऐसे तत्वों की हरकतों का नुकसान वे दशकों से भोगते आए हैं। जैशे मोहम्मद और हिज्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन जर्जर हो चुके हैं और हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े हाशिए की ओर बढ़ रहे हैं। मोहभंग की इस स्थिति में हाफिज मोहम्मद सईद के लिए यह मजबूरी भी है और अवसर भी कि वह जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ढाँचे को किसी तरह पुनर्जीवित करे। वह इस मुहिम में जुटा हुआ भी है और एलओसी के इस तथा उस पार युवाओं की भर्ती की कोशिश कर रहा है। कुछ हफ्ते पहले वह उसी सेक्टर में था जहाँ पिछले दिनों दो भारतीय जवानों को शहीद किया गया। सीमा पर अगर भावनाएँ और भड़कती हैं तो युवकों को बरगलाने तथा धन इकट्ठा करने के लगातार मुश्किल होते काम में उसे थोड़ी आसानी हो जाएगी।

कश्मीर में जमीनी हालात किस तरह भारत के पक्ष में मुड़ रहे हैं उसका अंदाजा अलगाववादी हुर्रियत कांफ्रेंस के उमर फारूक के नेतृत्व वाले धड़े के ताजा पाकिस्तान दौरे से हो जाता है जब उसने वहाँ के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और दूसरे नेताओं के साथ-साथ हाफिज मोहम्मद सईद से भी मुलाकात की थी। हुर्रियत नेता हाफिज के साथ हुई बातचीत पर चुप्पी साधे हुए हैं लेकिन यह किसी की भी कल्पना का विषय है कि आखिर किस वजह से वे उसके साथ मुलाकात के लिए प्रेरित हुए होंगे। सारी घटनाओं को पाकिस्तान सेना की ताजा मोबिलाइजेशन एक्सरसाइज की रोशनी में भी देखे जाने की जरूरत है जब सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक परवेज कयानी घूम-घूमकर सीमावर्ती स्थानों पर फौजियों को संबोधित कर रहे हैं। इस नई रणनीति के तहत पाकिस्तान की कोशिश है कि वह जरूरत पड़ने पर भारत की तुलना में बहुत जल्दी अपनी सैनिक टुकड़ियों को सीमा पर तैनात कर सके और पहले हमला करने की स्थिति में आ जाए।

हालात इन दिनों
पिछले आलेखः
फ़ेसबुक पर लाइक करें